सन 2004 और 2014 में हुई शल्यक्रिया के बीच तुलना – 30 अप्रैल 2014

अब जबकि दस साल बाद मैंने अपने बाएँ घुटने की शल्यक्रिया दोबारा करवा ली है, मैं आपको उन दोनों शल्यक्रियाओं के बीच अंतर और उन शल्यक्रियाओं के दौरान मुझे हुए अनुभवों के बारे में आपको बताना चाहता हूँ:

1) सम्पूर्ण एनीस्थीशिया और एपिड्यूरल एनीस्थीशिया

सन 2004 में मुझे डॉक्टरों ने बताया कि मुझे एनीस्थीशिया दिया जाएगा और मैं शल्यक्रिया के दौरान सोता रहूँगा। मैं मानता हूँ कि शल्यक्रिया के दौरान मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ था मगर जब जगा तो दर्द बेहद तकलीफदेह था।

2014 में मैं सोचता था कि शायद वही एनीस्थीशिया मुझे फिर लेना पड़ेगा। मैंने रमोना से कहा भी कि शल्यक्रिया के वक़्त जाग्रत रहने की अपेक्षा मैं अचेत रहना पसंद करूंगा। मुझे लगता था कि घुटने पर डॉक्टर छुरियाँ चला रहे होंगे और उसे अपनी आँखों से देखने की तुलना में अचेत रहना कम तकलीफदेह होगा! लेकिन आखिर मैंने एपिड्यूराल एनीस्थीशिया ही लिया और मैं कह सकता हूँ कि वाकई मुझे बड़ा आनंद आया! एनीस्थीशिया देने वाले डॉक्टर ने कहा था कि आजकल यह शल्यक्रिया इसी तरह की जाती है और इसमें शरीर पर दूसरे दुष्प्रभाव भी कम होते हैं। सारी प्रक्रिया पूरी तरह पीड़ा-रहित थी और हालांकि बाद में, जब मेरे पैरों में चेतना लौटी तो दर्द हुआ लेकिन कुल मिलाकर सचेत रहकर शल्यक्रिया कराना मुझे अच्छा लगा!

2) धातु के स्क्रू और घुलनशील स्क्रू

पिछली बार यानी 2004 में उन्होंने लिगामेंट को जोड़ने के लिए मेरे घुटने में धातु के स्क्रू लगाए थे। मैं अक्सर शरीर में किसी बाहरी वस्तु की उपस्थिति के कारण हल्की सी असुविधा महसूस करता था।

इस बार मुझे अधातु के, स्वतः-क्षरणशील यानि कि प्राकृतिक रूप से घुल जाने वाले स्क्रू लगाए गए हैं और अब तक तो उनका ज़रा सा भी एहसास मुझे नहीं होता। यह जानकर मुझे बड़ा अच्छा लगता है कि वे स्क्रू घुलकर मेरे शरीर का हिस्सा बन जाएंगे और किसी खास जगह पर ज़ोर पड़ने पर मुझे कोई दिक्कत नहीं हुआ करेगी!

3) दर्द!

इस मामले में बहुत अधिक अंतर नज़र आता है। इस बार के मुक़ाबले 2004 में मुझे बहुत ज़्यादा दर्द हुआ करता था और दर्द काफी समय तक बना भी रहा। पता नहीं किस कारण से: शल्यचिकित्सकों के बेहतर काम की वजह से या आधुनिक तकनीक और आधुनिक पद्धतियाँ अपनाए जाने के कारण या कि बेहतर दर्दनिवारकों के चलते! मुझे तो इतना पता है कि इस बार तकलीफ कम हो रही है!

4) कम दवाएं

दर्दनिवारकों की बात बताते हुए मुझे ध्यान आया कि पिछली बार की अपेक्षा इस बार मुझे कम गोलियां खानी पड़ रही हैं। वैसे भी अपने दैनिक जीवन में मैं दवाइयाँ खाने से बचता हूँ इसलिए यह परिवर्तन मुझे बहुत रास आ रहा है!

5) अस्पताल में कितने समय रहना पड़ा?

मुझे ठीक याद नहीं है कि 2004 में मैं अस्पताल में कितने समय रहा लेकिन मुझे लगता है चार या पाँच दिन तो अवश्य रहा होऊंगा। इस बार मैं शुक्रवार को सबेरे भर्ती हुआ और मुझे बताया गया कि शल्यक्रिया के बाद 24 घंटे के भीतर मैं घर वापस जा सकता हूँ! आश्चर्य! स्वाभाविक ही अस्पताल में पड़े रहने की अपेक्षा घर जाकर स्वास्थ्यलाभ करना हर कोई पसंद करेगा!

6) मैं अपने पैरों को कब हिला-डुला सकूँगा? और चलना-फिरना?

2004 में मैं कई हफ्ते बिस्तर पर पड़ा रहा था और पैरों को थोड़ा सा हिलाना-डुलाना भी मना था। फिजिओथेरपी भी शल्यक्रिया के कुछ सप्ताह बाद ही शुरू हो पाई थी। वह मेरे लिए काफी मुश्किल समय था क्योंकि मैं आम तौर पर बहुत सक्रिय और घूमने-फिरने वाला व्यक्ति था और योगाभ्यास भी रोज़ किया करता था। मेरा वह समय बहुत उबाऊ और शरीर और मस्तिष्क को थका देने वाला सिद्ध हुआ था!

सन 2014 में फिजिओथेरपिस्ट के साथ मेरा पहला सत्र 24 घंटे के भीतर ही शुरू हो चुका था। और व्यायामों में मुझे अपने पैर को हिलाना-डुलाना था, पैर को ऊपर उठाने की कोशिश करनी थी, मांसपेशियों को सक्रिय करना था और सबसे बड़ी बात, खड़ा भी होना था और चलना भी था! निश्चय ही, फिजिओथेरपिस्ट की देखरेख में ही लेकिन अब वह दिन प्रतिदिन आसान होता जा रहा है!

चलने-फिरने की क्षमता का सबसे मुख्य लाभ: पहले दिन से ही मैं खुद चलकर शौचालय तक जा पा रहा हूँ! जी हाँ, यह शल्यक्रिया दोबारा करानी पड़ेगी यह पता चलने पर सबसे बुरा खयाल यही आता था। इसके साथ ही मैं यह तुलना यहीं समाप्त करता हूँ। आधुनिक समय बेहतर प्रविधियाँ लेकर आता है: दर्द कम, फटाफट स्वास्थ्य-लाभ और मान-मर्यादा के साथ शौच!

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