चार हफ्ते पहले एक सड़क दुर्घटना में घायल होने के बाद मेरे दोस्त गोविंद की आगरा के एक अस्पताल में टांग की सर्जरी हुई थी। जनवरी में मथुरा के एक अस्पताल में मेरी नानी की बाईं आंख में मोतियाबिंद की सर्जरी हुई थी। जब डॉक्टर इन दोनों को इस प्रक्रिया के बारे में समझा रहे थे दोनों से ही एक सवाल पूछा उन्होंने "स्वदेशी चाहते हैं या विदेशी?" आज मैं इसी विषय पर चर्चा करूंगा।
मेरी नानी से उन्होंने पूछा कि वह अपनी आंख में भारत में बने लेंस लगवाना चाहती हैं या विदेश में बने हुए। गोविंद से पूछा कि उसके पैर की टूटी हुई हड्डी को जोड़ने के लिए वह देश में निर्मित पेंच इत्यादि लगवाना चाहता है या विदेशी। इससे पहले कि डॉक्टर इस बारे में तफसील से समझाता, मरीज ने अपने दिमाग में अंदाजा लगा लिया थाः जो कुछ भी विदेशों से आयातित होता है, वह महंगा तो जरूर होता है लेकिन क्वालिटी बढ़िया होती है।
इन दो मामलों के अलावा भी मैं कई ऐसे मामलों के बारे में जानता हूं और अब ऐसा लगता है कि प्रत्येक केस में डॉक्टर मरीज से ऐसा ही सवाल पूछते हैं। आखिर क्यों? क्या औरों को मेरी तरह इस प्रश्न पर हैरानी नहीं होती? क्या उन्हें भी यह नहीं लगता कि ऐसा कुछ किया जाना चाहिए ताकि मरीजों को इस प्रश्न का जवाब ही न देना पड़े?
बात साफ है कि हर कोई महंगा विकल्प चुनना चाहेगा क्योंकि यह शरीर का मामला है । लेकिन जो व्यक्ति इतना पैसा खर्च करने की ताकत नही रखता, उसे अवश्य दिक्कत पेश आती होगी। वह सोचता होगा किसी भी तरह से पैसा इकठ्ठा कर लूं या किसी से उधार ले लूं ताकि शरीर इलाज करवा सकूं।
उन लोगों का क्या होता होगा जो वास्तव में इतना महंगा इलाज करवाने की क्षमता नहीं रखते? वे अपना ‘विदेशी’ उपचार नहीं करवा सकते क्योंकि यह उनकी पहुंच से बिलकुल बाहर होता है। आंख के सर्जन ने नानी जी को बताया था कि स्वदेशी लेंस की कीमत है 4 से 8 हजार रुपए । जबकि विदेशी लेंस की कीमत 12 से 16 हजार तक है। डॉक्टर ने यह भी बताया कि विदेशी लेंस जिंदगीभर खराब होंगें वहीं देसी लेंस की गारंटी नहीं है।
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस व्यक्ति के पास सर्जरी करवाने तक के पैसे नहीं हैं वह इस बारे में कोई निर्णय ले सकता है? और अगर आप भारतीय विकल्प अपनाते हैं तो इसका अभिप्राय हुआ कि आपने सोचा है, "मैं ठीक तो हो जाऊंगा, लेकिन पूरी तरह नहीं या जो भी वस्तु डॉक्टर भीतर डालेगा वह कुछ समय बाद खराब हो जाएगी और मुझे वह दोबारा लगवानी पड़ेगी|"
सवाल उठता है कि क्यों भारतीय उत्पाद इतनी घटिया क्वालिटी के होते हैं? क्या भारत में भी ऊंची गुणवत्ता के चिकित्सा उत्पाद नहीं बनाए जा सकते? यदि नहीं तो क्यों नहीं सरकार ऐसी योजनाएं बनाती जिससे मरीजों को इलाज की स्तरीय सुविधा मिल सके?
जब हम अपनी बेटी अपरा के टीकाकरण के लिए गए थे तब भी ऐसा ही हुआ था। डॉक्टर ने बताया कि उसके पास देशी और विदेशी दो प्रकार की वैक्सीन उपलब्ध हैं। भारतीय वैक्सीन थोड़ी सस्ती है। लेकिन देशी वैक्सीन से बच्चे को दर्द होगा और थोड़ा बुखार भी हो सकता है। जबकि विदेशी वैक्सीन के साथ ऐसी कोई दिक्कत नहीं आती। जाहिर है कि हमने अपरा के लिए विदेशी वैक्सीन ही चुनी। हमने देखा कि अन्य सभी अविभावकों ने भी यही चुनाव किया था। कौन अपने बच्चे के लिए बुखार और दर्द खरीदना चाहेगा? लेकिन ऐसे लाखों लोग हैं जो ऐसे दर्दरहित विकल्प की कीमत चुकाने की ताकत नहीं रखते।
मुख्य मुद्दा यह है कि स्थितियां ऐसी हों कि डॉक्टर को मरीज से यह सब पूछना न पड़े या मरीज को इस बारे में निर्णय लेने की चिंता न करनी पड़े। मेरे विचार से यह नैतिक तौर पर गलत है और पहले से ही पीड़ा भुगत रहे मरीज की पीड़ा में इज़ाफा होता है इससे।
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