कल के ब्लॉग में मैंने आपको बताया था कि हमारी एक कम पढ़ी-लिखी कर्मचारी के लिए अपना गर्भपात कराना कितना कठिन हो गया था। रमोना भी उस स्त्री-रोग विशेषज्ञ के यहाँ उसके साथ गई थी। इतने साधारण से काम के लिए उस कर्मचारी को जो परेशानियाँ झेलनी पड़ीं उन्हें देखकर रमोना को बहुत दुख और आश्चर्य हुआ। लेकिन इस पूरे मामले में एक और बात उसने मुझे बताई, जिसने उसे और भी ज़्यादा परेशान कर दिया था: कर्मचारी के साथ उस डॉक्टर का बात करने का ढंग!
बात को और स्पष्ट करने के लिए बता दूँ कि वह कोई गाँव की नातजुर्बेकार डॉक्टर नहीं थी। हम एक ऐसी महिला की बात कर रहे हैं जिसका स्वयं का नर्सिंग होम है और जिसने चिकित्सा की पढ़ाई की है और भारत के कई बड़े शहरों के बड़े-बड़े अस्पतालों में अपने काम का अनुभव प्राप्त किया है। वह रमोना से अंग्रेज़ी में अच्छी तरह बात कर रही थी और उतनी ही वाकपटुता और स्पष्टता के साथ हिन्दी में भी। पर जब तक वह रमोना से बात करती थी तब तक उसका लहजा ठीक होता था लेकिन जैसे ही वह उस कर्मचारी की ओर मुड़ती, जो दरअसल उसकी मरीज भी थी, उसका लहजा बदल जाता था।
बहुत समय नहीं हुआ जब मैंने एक नेत्र-चिकित्सक के यहाँ का अपना हाल आपको बताया था। वे मेरे साथ क्या कर रहे हैं या क्या करने वाले हैं, यह बताना उस नेत्र-चिकित्सक ने कतई आवश्यक नहीं समझा था। मैंने यह भी बताया था कि कैसे भारत में डॉक्टर मरीज को उसकी बीमारी, जांच और इलाज के बारे में बताना बिल्कुल ज़रूरी नहीं समझते और अपने इस व्यवहार के लिए यह बहाना बनाते हैं कि उनके पास आने वाले ज़्यादातर मरीज अपढ़ होते हैं, जो न तो अपने शरीर के बारे में कुछ जानते हैं न ही इस बात की कोई परवाह करते हैं। वे सिर्फ जल्द से जल्द ठीक होना चाहते हैं। लेकिन इस बार रमोना ने एक और बात भी नोट की।
डॉक्टर जानती थी कि हमारी कर्मचारी अधिक पढ़ी-लिखी नहीं है और उसे गर्भाधान, गर्भनिरोधक, चिकित्सा और इससे संबन्धित दूसरी बातों की कोई जानकारी नहीं है। वह जानती थी कि डॉक्टरों द्वारा प्रयुक्त बहुत से चिकित्सकीय शब्द और बहुत सी सामान्य चिकित्सकीय बातें भी वह महिला समझ नहीं पाएगी। फिर भी वह महिला उसके सामने बैठी है, पैसा खर्च करके अपना इलाज कराने आई है और सबसे बड़ी बात एक इंसान है, जिसके साथ सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार करना आवश्यक है! कोई मरीज कितना भी अनपढ़ क्यों न हो, वह आपको किसी प्रोफेसर से कम फीस नहीं देता और आपने शपथ ली हुई है कि जो भी आपके पास इलाज के लिए आएगा आप उसकी मदद करेंगे!
आपसे सिर्फ यही अपेक्षा नहीं होती कि आप उनके शरीर का इलाज करेंगे बल्कि बीमारी के चलते पैदा होने वाली मानसिक तकलीफ से भी उन्हें बाहर निकालेंगे! ये औरतें आपके पास ऐसे मामले लेकर आती हैं, जो उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं! बात मामूली बुखार, फ्लू या मोच की नहीं है! जीवन-मरण का प्रश्न है, एक नई जिंदगी का प्रश्न है, संतान का प्रश्न है, जो कुछ लोगों के लिए जीवन का एकमात्र उद्देश्य होता है! उनकी अपनी कुछ धारणाएँ, भावनाएँ और विचार होते हैं और भले ही आपको और आपके सभ्य समाज को वे अजीबोगरीब लगते हैं, उनके पास उनके अपने तर्क और औचित्य होते हैं। आप उन्हें समझा सकते हैं बल्कि आपको संयम के साथ समझाना चाहिए कि आप क्या कह रहे हैं। फिर उन पर अपनी इच्छा आरोपित करने के स्थान पर उन्हें अपना निर्णय स्वयं लेने की आज़ादी देनी चाहिए जो आम तौर पर दूसरे मरीजों को दी जाती है। आपको सलाह देने का पूरा अधिकार है लेकिन आपको उनकी भावनाओं का ख्याल भी रखना चाहिए!
अपने साथ आई महिला के मुक़ाबले अपने साथ डॉक्टर का अच्छा रवैया रमोना को सचमुच बहुत नागवार गुज़रा। उसने मुझे बताया कि कैसे वह बार-बार डॉक्टर का ध्यान मरीज की तरफ खींचने की कोशिश करती थी। पूरे समय बराबरी के स्तर पर रहते हुए वह बहुत संयत स्वर में अपनी कर्मचारी मरीज से बात करती, उसे बताती कि डॉक्टर क्या कह रही हैं, उसकी समस्या का हल क्या हो सकता है, आगे क्या किया जाना है। अतिरिक्त कोशिश करते हुए कि कहीं भी ऐसा न लगे कि वह किसी तरह भी उससे ऊंचे स्तर की महिला है। उसे लगा कि शायद उसके व्यवहार को देखकर ही डॉक्टर उसके साथ बेहतर व्यवहार करे! मगर अफसोस, ऐसा आखिर तक नहीं हो सका।
प्रिय डॉक्टरों, आपके पास ज्ञान और अनुभव है इसलिए लोग आपके पास आते हैं। उनके दिल में आपके लिए बहुत आदर भाव होता है लेकिन क्या आप उस आदर का ठीक सिला उन्हें दे रहे हैं? उनके आदर का दुरुपयोग मत कीजिए और इस बात को समझिये कि जो भी आपके पास आता है वह एक मनुष्य है और उसकी भी अपनी कुछ इच्छाएँ, भावनाएँ और स्वप्न होते हैं!
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