आँखों के डॉक्टर के यहाँ का तमाशा – 6 अगस्त 2013

स्वास्थ्य

मैंने आपको कल बताया था कि मैंने जर्मन भाषा की कक्षा में प्रवेश ले रखा है और उनके लिए मुझे दिल्ली स्थित गेटे इंस्टीट्यूट जाना पड़ता है। अब तक मैंने सिर्फ तीन रविवार इन कक्षाओं में भागीदारी की है और अभी से मुझे एक समस्या ने घेर लिया है: ब्लैकबोर्ड पर लिखा ठीक से पढ़ने के लिए मुझे आँखों पर ज़ोर देना पड़ता है। लगातार कई घंटे ऐसा करते रहना आँखों के लिए बहुत श्रमसाध्य हो जाता है और मुझे लगा कि तुरंत आखों के डॉक्टर को दिखाकर चश्मा बनवा लेना चाहिए। तो मैं अपने नेत्र-विशेषज्ञ के पास गया-लेकिन मुझे इस कोशिश में जो अनुभव हुआ, वह मैं आज आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।

मैं डॉक्टर के यहाँ गया जिसने मेरी नानी का मोतियाबिंद का ऑपरेशन किया था और जहां रमोना ने भी अपनी आँखों की जांच करवाई थी। उसने देखा और जैसी कि मुझे अपेक्षा थी, मुझसे कहा कि चश्मा लगेगा। फिर उसने मुझे कोने में रखे एक स्ट्रेचर पर लेटने के लिए कहा। वह दूसरे मरीज देखने लगी और कुछ देर बाद उसका सहायक आया और अपने अनुभवी हाथों से जल्दी-जल्दी मेरी दोनों आँखों में दो-दो बूंद आई-ड्रॉप डाल दिए। तुरंत ही मेरी आखों में जलन होने लगी और कुछ देर में ही ऐसा लगने लगा जैसे किसी ने आखों में लाल मिर्ची छिड़क दी हो!

उस व्यक्ति ने पूछा, “क्या आप आँख खोल सकते हैं?” और मैंने तुरंत मना कर दिया। फिर मैं जलन कम होने का इंतज़ार करने लगा और मन ही मन सोचने लगा कि इन्हें ऐसी भयानक चीज़ आँखों में डालने से पहले मरीज को सावधान तो करना चाहिए कि जलन हो सकती है! उसने मुझसे बैठने को कहा और बैठते ही एक या दो मिनट में ही मेरी आंखो में आराम महसूस होने लगा और अब मैं आँखे खोल भी पा रहा था। सहायक ने मुझे फिर से लेटने के लिए कहा। अब तक मैं तय कर चुका था कि जाने से पहले मैं इन्हें अच्छे से, नम्रता पूर्वक इतना तो अवश्य कहूँगा कि भाई, अपने मरीजों से थोड़ी बहुत बात भी कर लिया करो, उन्हें बताया तो करो कि आप उनकी आँखों के साथ क्या करने जा रहे हैं।

खैर, स्ट्रेचर पर पड़े-पड़े मैंने ऊपर देखा तो मुझे डॉक्टर का सहायक एक सुई जैसी कोई चीज़ लिए मेरी आँखों पर झुका दिखाई दिया। शायद उसका इरादा मेरी आँखों में सुई घुसेड़ने का था! मुझे लगा यह तो अति है और मैं तुरंत उठकर बैठ गया और वह सब कह दिया जो मैं इतनी देर से कहने की योजना बना रहा था, मगर अब शालीनता पूर्वक नहीं बल्कि गुस्से में भर कर, चिल्लाते हुए: क्या कर रहे हो यार? तुम मुझे कुछ बताते क्यों नहीं भाई कि मेरे साथ क्या किया जा रहा है। पहले तुम कोई दवा आँख में डालते हो जिससे मेरी आँखों में ऐसी जलन होती है कि मैं आँख खोल भी नहीं पाता, फिर अब तुम मेरे सामने एक सुई लेकर खड़े हो और मुझे पता नहीं है कि तुम मेरी आँख खुरचने वाले हो या क्या करने वाले हो! यही आप लोगों का तरीका है बीमारी के इलाज का? तुम एक डॉक्टर हो, तुम्हारे गले में यह आला पड़ा है, आपकी ज़िम्मेदारी यह है कि आपके मरीज को आराम मिले और आप इसका बिलकुल उल्टा कर रहे हैं! इससे तो आपका मरीज उठकर भाग जाएगा। मैं बहुत देर से संयम बनाए रखने की कोशिश कर रहा था और अगर तुमने मुझे समझाते हुए एक शब्द भी कहा होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती!

बात करते हुए मैं खड़ा हो गया और अब डॉक्टर मेरे पास आ गई थी कि आखिर क्या हो गया। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि उसने वाकई सारी परिस्थिति को बहुत कुशलता के साथ संभाल लिया। दोनों ने मेरी बात ध्यान से सुनी और माफी मांगी। मैंने उन्हें बताया कि मैंने दुनिया भर में अपना चेकअप कराया है और जानता हूँ कि डॉक्टर और मरीज के बीच कैसा संबंध होना चाहिए! डॉक्टर ने माना कि वास्तव में ऐसा ही होना चाहिए और अपने सहायक से कहा कि यह घटना उसके लिए एक तरह से सीख है और भविष्य में उसे इन बातों का ख्याल रखना चाहिए।

फिर उसने मुझे सब कुछ समझाया कि उसका सहायक उसके साथ क्या कर रहा था। आँख में डाली गई दवा एक तरह का लोकल एनिस्थीशिया था जो आँख की पुतलियों में और उसके आसपास का प्रैशर जानने के लिए ज़रूरी है। एक उम्र के बाद मरीजों की आँखों में यह प्रक्रिया किया जाना सामान्य बात है। अब वास्तविक परीक्षण उस सुई जैसी चीज़ की सहायता से किया जाएगा। मैंने उससे कहा कि मुझे किसी भी चीज़ से कोई परेशानी नहीं है मगर जो भी किया जाना है और उनसे होने वाले प्रभावों के बारे में मुझे जानकारी होना आवश्यक है जिससे मैं पहले से उसके लिए तैयार रहूँ।

मैंने डॉक्टर और उसके सहायक से अपने विचार निसंकोच कह दिये। मैंने कहा कि वह हमारी पारिवारिक डॉक्टर है जिस पर हम पूरी तरह भरोसा करते हैं मगर उसे अपने सहयोगियों को समझाना चाहिए कि वे अपने मरीजों के साथ मानवीय व्यवहार करें, उन्हें कोई निर्जीव वस्तु न समझें जिन्हें कोई दर्द नहीं होता और जिन्हें एक के बाद एक निपटाते चले जाना है, चाहे इससे उनकी आँखें जल जाएँ या छिन्न-भिन्न हो जाएँ और उन्हें पता भी न चले! मुझे डॉक्टर की आँखों में अफसोस की छाया दिखाई दी। मैं नहीं जानता कि अगले मरीज के साथ उनका व्यवहार कैसा रहा होगा मगर आशा करता हूँ कि मेरी इस बात से दोनों ने थोड़ा बहुत सबक अवश्य हासिल किया होगा।

खैर, मेरा काम हो गया और मैं वहाँ से चश्मा बनवाने ओप्टीशियन के पास चल दिया। कभी कभी एक सामान्य सी बात इतनी उत्तेजक हो जाती है-लेकिन अंत भला तो सब भला। अब मैं चश्में की सहायता से ठीक तरह से देख पा रहा हूँ और भविष्य में ब्लॅकबोर्ड पर लिखे अपने जर्मन सबक ठीक से पढ़ और लिख सकूँगा।

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