आप अपने लिए और अपनी ख़ुशी के लिए खुद ज़िम्मेदार हैं – 20 नवम्बर 2014

प्रसन्नता

कल मैंने बताया था कि क्यों मेरा मानना है कि अपनी गलतियों और त्रुटियों के लिए अपने अभिभावकों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए बल्कि अपने निर्णयों और अपनी ख़ुशी-नाखुशी की ज़िम्मेदारी खुद वहन करनी चाहिए। अंग्रेजी में एक कहावत है: ‘Every man is the architect of his own fortune’ जिसका सीधा सा अर्थ यह है कि हर व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है-और चाहे वह कितनी भी पुरानी क्यों न हो, कितना भी आप क्यों न कहें कि यह तो पुराने ज़माने की एक कहावत है, मैं मानता हूँ कि वह आज भी उतनी ही सच है। आप ही हैं, जो अपनी ख़ुशी के लिए ज़िम्मेदार हैं।

यह सही है कि जब आप अपने दुःख पर नज़र डालते हैं तो आपको लगता है कि आपने खुद ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो आपको यह दुःख उठाना पड़ रहा है। दूसरों ने आपके साथ बुरा बर्ताव किया या फिर यही नियति थी कि आपके साथ बुरा हो, भले ही उसका कारण आप न हों। आप इच्छित सफलता अर्जित नहीं कर पाए, जिसके साथ आप डेटिंग कर रहे हैं, वह लड़की या लड़का ठीक नहीं हैं, आपके परिवार वाले आपकी उपेक्षा करते हैं और आपके सहकर्मी या अधिकारी आपके काम से हमेशा नाखुश रहते हैं। अब बताइए, इसमें आपका क्या दोष?

अब मेरी आपसे गुज़ारिश है कि मन में चल रहे इन तर्क-वितर्कों को कुछ देर के लिए विश्राम दें। उन्हें भूलकर एक दिन के लिए सुबह की शुरुआत इस तरह करें कि आज कुछ भी आपके साथ होता रहे, आप हर बात से खुश ही होंगे, हर हाल में खुश रहेंगे।

एक सामान्य दिन गुज़ारते हुए आप अपने आपसे विलग होने की कोशिश कीजिए। ऐसी स्थितियों को, जब आम तौर पर आप गमगीन हो जाते हैं, नोट कर लीजिए कि ऐसा क्यों हुआ। ऐसा क्या हुआ था? किस बात ने आपकी ख़ुशी छीन ली? लिख लीजिए और फिर भूल जाइए और फिर उसी तरह खुश रहने की कोशिश करते हुए दिन बिताइए।

शाम को उस सूची पर नज़र दौड़ाइए और देखिए कि एक सामान्य निष्पक्ष व्यक्ति इस बारे में क्या सोचेगा। जिस बात ने आपको दुखी किया है उसे ऊँची आवाज़ में कहना भी उपयोगी हो सकता है- और फिर जानने की कोशिश कीजिए कि क्या बाहरी स्थितियाँ आपकी नाखुशी का कारण थीं?

क्या आप किसी दूसरे तरीके से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर सकते थे? क्या आप कुछ कम चिड़चिड़ापन नहीं दिखा सकते थे, उसकी जगह थोड़ा संयम नहीं रख सकते थे? क्या वास्तव में आप अपने ही भीतर की किसी बात के चलते नाराज़ नहीं हुए थे, किसी दूसरे के कारण नहीं?

इसे स्पष्ट करने के लिए मैं एक उदाहरण दूँगा। एक सहकर्मी आपसे बार-बार अपने छोटे-छोटे काम करने के लिए कहता रहता है। कभी कहता है, यह काम कर दो तो कभी कहेगा बस, इतनी मदद कर दो! ये काम इतने छोटे हैं कि उन्हें न करना, उसके अनुरोध को ठुकराना या उसकी अनदेखी करना बदतमीज़ी होगी-लेकिन यह आपको नाराज़ करता है क्योंकि इससे आपका समय बरबाद होता है। उसके प्रति आपको कोफ़्त होती है कि यह व्यक्ति न तो आपका सम्मान करता है और न ही आपके समय की ही इसे कद्र है। इससे आप यह नतीजा निकालते हैं कि आपकी नाखुशी या दुःख का कारण वह व्यक्ति है। ठीक?

लेकिन, नहीं। वास्तव में ऐसा नहीं है। वह आपके समय की कद्र नहीं करता क्योंकि आप खुद अपने समय की कद्र नहीं करते, वह व्यक्ति भी नहीं करता। वास्तविकता यह है कि आप खुद अपनी इच्छाशक्ति की कमी पर, ऐसी स्थिति में उसे नकारने की अपनी अक्षमता पर नाराज़ हो रहे हैं। जब एक बार आपको यह बात समझ में आ जाए तो उसे बदलने की कोशिश कीजिए। उसे समझाइए कि इस वक़्त आप काफी व्यस्त हैं और फिर भी अगर वह व्यक्ति वह काम नहीं कर पा रहा है तो उसे दिखाइए और उसे बताइए कि इस बार मैं यह काम इसलिए किए दे रहा हूँ कि अगली बार तुम खुद उसे कर सको! आप देख रहे होंगे कि उस पहली स्थिति में अपनी नाखुशी के लिए आप खुद ही ज़िम्मेदार थे!

कभी-कभी अपने आपसे पर्याप्त दूरी बनाकर यह देख पाना काफी कठिन होता है कि वास्तव में गलती कहाँ हो रही है। आपको समय निकालकर अपनी ख़ुशी के लिए काम करना चाहिए। यह टीवी के सामने बैठकर नहीं हो पाएगा। घर के बाहर निकलिए, प्रकृति के पास जाइए, थोडा अवकाश लीजिए, कहीं घूमने निकल जाइए, जिससे दूरी बना सकें और उस गलती को जान सके।

आप खुद ज़िम्मेदार हैं और किसी दूसरे पर आप यह ज़िम्मेदारी नहीं थोप सकते। आप खुद अपनी ख़ुशी के निर्माता हैं। तो अगली बार किसी दूसरे की शिकायत करते वक़्त इस बात का विशेष ध्यान रखिएगा।

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