मैंने पिछले हफ्ते बताया था कि हमारे आश्रम में इन दिनों बहुत से लोग आए हुए हैं। सारे कमरे भरे हुए थे और हमने बहुत खुशगवार वक़्त गुज़ारा, खासकर होली के कुछ दिन। ज़्यादा लोग, ज़्यादा मज़ा! लेकिन इसके साथ ही काम भी बहुत बढ़ गया था। ज़ाहिर है, ज़्यादा लोगों को ज़्यादा भोजन की और ज़्यादा पानी की ज़रूरत होगी। उनके अगले कार्यक्रमों के बारे में, यहाँ तक कि होली के त्योहार के बारे में भी, ज़्यादा लोगों को, ज़्यादा बार जानकारियाँ हमें देनी होंगी। कोई शक नहीं कि हमारे आश्रम में ऐसी व्यवस्था है कि एक साथ ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का खयाल रखा जा सकता है इसलिए हम लोग निश्चिंत थे कि हर कोई यहाँ बहुत अच्छा वक़्त गुजरेगा। लेकिन क्या पहले हम ऐसी गारंटी दे सकते थे? क्या हम यह ज़िम्मेदारी ले सकते थे कि आश्रम में हर व्यक्ति खुश रहे? नहीं, बिल्कुल नहीं! यह न सिर्फ हमारे बारे में सच है बल्कि दुनिया के हर व्यक्ति के लिए भी सच है। आप हर किसी की खुशी की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते। क्यों? मुझे समझाने दीजिये।
हमारे आश्रम के उदाहरण को ही आगे ले जाएँ तो ज़ाहिर है, हम चाहते हैं कि यहाँ निवास करने वाला हर व्यक्ति, जब तक हमारे साथ है, खुश रहे। जब लोग आश्रम में अपने प्रवास से प्रसन्न होते हैं तो हमें भी खुशी होती है और इसलिए हमें उनके लिए उत्सवों, पार्टियों और दूसरे कई प्रकार के आयोजन करना अच्छा लगता है, जिससे वे अधिक से अधिक आनंद प्राप्त कर सकें। इससे वे भारतीय संस्कृति को भी बेहतर तरीके से जान पाते हैं।
यही कारण है कि आश्रम में होली के इतने बड़े आयोजन की तैयारी काफी पहले से ही शुरू कर दी जाती है और हम नए और पुराने मित्रों के साथ भविष्य में होने वाली मौज-मस्ती की कल्पना करने लगते हैं। जब नए, अनजान मेहमान हमारे यहाँ पहली बार आते हैं तो हमें पता नहीं होता कि वे गुलाल और रंगों से सराबोर होकर खुश होंगे या नहीं। पहले से यह यह जान पाना असंभव ही है! अगर वे वाकई पूरा मज़ा लेना चाहते हैं तो वे पार्टी में शामिल होते हैं और एक भी समारोह मिस नहीं करते। हमारे साथ बाहर निकलकर वे खुशी और मस्ती में पागल हो उठते हैं और एक दूसरे पर रंग, गुलाल, पानी और फूलों की बौछार करते हुए होली के रंग में रंग जाते हैं।
अगर उन्हें होली का यह अति पागलपन अधिक पसंद नहीं है तो भी कोई बात नहीं। वे थोड़ा सा परे हट जाएँ और सारे हुड़दंग के बीच फँसने से बचें जिससे वे रंगों से भी और हुल्लड़ से भी काफी हद तक बचे रह सकते हैं। अगर वे चाहें तो वे आश्रम में स्थित ‘रंगों की पाबंदी’ वाले इलाके में जाकर दूर से देखते हुए होली की सारी मस्ती का मज़ा ले सकते हैं।
कहने का अर्थ यह है कि हम एक सीमा तक ही ज़िम्मेदारी उठा सकते हैं। हम रंग, पानी और स्थान का इंतज़ाम कर सकते हैं। गानों के रेकॉर्ड चला सकते हैं और हम खुद आनंद को द्विगुणित करने के लिए हँसते, खिलखिलाते, नाचते-गाते, धूम मचाते उसमें शामिल हो सकते हैं। हम ऐसा करते ही हैं! यहाँ तक कि सुनहरे बालों वाली महिलाओं से हमने इस साल वादा किया था कि उनके बालों को नुकसान न पहुंचे इसके लिए हमने उपाय किए हैं और उन्हें तेल और मिट्टी का लेप और मोटे कपड़े की टोपियाँ उपलब्ध कराए गए जिससे वे चेहरे और बालों की सुरक्षा करते हुए होली खेल सकें।
किसी एक बिन्दु पर आकर उत्सव में शरीक व्यक्तियों को स्वयं अपने लिए ज़िम्मेदार होना ही पड़ता है और वही करना होता है जो उन्हें खुशी पहुंचाए क्योंकि कोई भी दूसरा यह ठीक ठीक नहीं जान सकता कि आपको क्या पसंद है। अगर आप अपने आसपास के सभी लोगों को प्रसन्न करने की कोशिश करेंगे तो आप इसमे कभी सफल नहीं हो सकते। आप अच्छा से अच्छा करेंगे लेकिन कोई न कोई ऐसा होगा जो खुश नहीं होगा। और फिर यही सोचते हुए आप स्वयं अपनी खुशी को जोखिम में डालेंगे।
यह सच है कि आप सबको खुश रखना चाहते हैं। लेकिन दूसरों की खुशी को अपनी खुशी से ज़्यादा महत्वपूर्ण न मानें अन्यथा आप स्वयं खुश नहीं होंगे और फिर दूसरों को भी खुश नहीं कर पाएंगे!
तो हम प्रसन्न हैं कि हमने होली का आनंद उठाया और वास्तव में आश्रम में उपस्थित सभी ने इस उत्सव में शिरकत करके होली का मज़ा प्राप्त किया! हर व्यक्ति जानता था कि उसकी खुशी का ज़िम्मेदार वह स्वयं है और जब तक उसे मज़ा आ रहा है तभी तक वह उसमें सहभागी है। इस तरह हम सब कह सकते हैं कि हमने बेहद सुखद समय साथ-साथ व्यतीत किया।
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