मैंने कल आपको बताया था कि जब हम मोनिका या उसकी रूममेट की तरह बुरी तरह ज़ख़्मी या परेशान व्यक्ति देखें तो हमारे भीतर कैसे विचार आने चाहिए और हमें क्या महसूस होना चाहिए। हमें खुश होना चाहिए कि हम स्वस्थ और सुखी हैं, अपने शरीर की बनावट को लेकर, उसकी सुंदरता को लेकर हमें संतुष्ट होना चाहिए। लेकिन यहाँ मैं एक और बात कहना चाहता हूँ! अपने आस-पास को, देश-दुनिया के माहौल को देखते हुए न सिर्फ आपको अपने शरीर के लिए खुश होना चाहिए बल्कि उन आर्थिक, सामाजिक, भौतिक और भावनात्मक बातों के लिए भी खुश और संतुष्ट होना चाहिए जो आपको प्राप्त हैं और जो जीवन आपको मिला है, उसके लिए खुश होना चाहिए!
पिछले कुछ हफ्तों में मैंने यह भी आपको बताया था कि पूर्णेन्दु और रमोना हमेशा नए भर्ती हुए बच्चों के घरों का दौरा करते हैं। जो कुछ वहाँ वे देखते हैं, जिन परिस्थितियों में वे बच्चे रहते हैं, उसे देखना भी जीवन को देखने का एक बिल्कुल अलग नजरिया देते हैं। जो भी उनके साथ वहाँ जाएगा, अपने जीवन की परेशानियों के लिए रोना छोड़ देगा!
भीषण गर्मी से बचने के लिए वे सुबह सबेरे उनके घर जाते हैं लेकिन वापस लौटते हैं तो पसीने में सराबोर, गर्मी से हलाकान लौटते हैं। जिस घर में भी वे जाते हैं, कहीं भी ए सी या सामान्य कूलर तक नहीं होते! कुछ घरों में बाहर के दरवाज़े तक नहीं होते या होते हैं तो सिर्फ एक कमरे का दरवाज़ा बंद किया जा सकता है, उस जगह नहीं, जहाँ जीवन का अधिकांश हिस्सा वे गुज़ारते हैं! अधिकतर घरों में बिजली होती है मगर सब घरों में नहीं। बिजली नहीं तो फिर पंखा वगैरह भी नहीं कि थोड़ी-बहुत ठंडी हवा मिल सके! जिनके यहाँ बिजली है भी तो वहाँ हमारे यहाँ जैसा बैटरी वाला पॉवर बैक-अप इन्वर्टर नहीं होता कि बिजली चली जाए तो कम से कम पंखा चालू रह सके। और बिजली हरदम जाती ही रहती है, विशेष रूप से जब तापमान 45 डिग्री या उससे ऊपर पहुँच जाता है, जैसा कि पिछले कुछ दिनों से हो रहा है।
अधिकतर बच्चों के पिता और कुछ बच्चों की माँएँ भी दैनिक मजदूरी करती हैं। वे सब बाहर, अधिकतर खुली धूप में, विभिन्न निर्माण-स्थलों में काम करते हैं और निश्चित ही उनके काम का वातावरण और परिस्थितियाँ मनुष्यों के काम करने के लिए उपयुक्त या सुरक्षित नहीं होतीं! उन्हें नंगे हाथों से फावड़ा पकड़कर सीमेंट और रेत का मिश्रण तैयार करना होता। वे निर्माण स्थलों पर हर जगह नंगे पाँव घूमते-फिरते रहते हैं या ज़्यादा से ज़्यादा रबर की चप्पलों में। कुछ साल इन्ही परिस्थितियों में काम करने के कारण मिस्त्रियों के हाथ फट जाते हैं।
माँएँ एक या दो छोटे-छोटे कमरों में एक साथ छह-छह बच्चों की और घर की देखभाल करती हैं और ऊपर से घर को सुव्यवस्थित रखने की ज़िम्मेदारी भी उसी की होती है। आमदनी कम होने के कारण बहुत कम खर्च में उन्हें पूरे परिवार के भोजन की व्यवस्था करनी होती है, ज़्यादातर रोटी-सब्ज़ी या चावल-दाल जैसे मूलभूत अनाजों और खाद्य पदार्थों से ही काम चलाना पड़ता है।
फटे-पुराने कपड़ों में बच्चे दिन भर गंदी, धूल भरी सड़कों पर खेलते रहते हैं। उनमें से कई वास्तव में बीमार होते हैं लेकिन इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं होते। दस-दस साल के बच्चे अपना नाम तक नहीं लिख पाते और कई किशोर बच्चों को यही पता नहीं होता कि उनकी उम्र ठीक-ठीक क्या है। लगभग सभी खेतों में पाखाना करने जाते हैं या सड़क के किनारे बैठकर पाखाना करते हैं-बहुत कम घरों में संडास उपलब्ध होता है।
और भारत का यह सबसे बुरा चित्र नहीं है और न ही दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई है-भारत में इससे भी बुरी हालतों में लोग रहते हैं! और आपका जीवन कितना भी बुरा क्यों न दिखाई दे, अगर आप ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं तो निश्चित ही समझ जाएँगे कि आपके देश में आपसे भी बुरी हालत में रहने वाले और उसमें सारा-सारा जीवन गुज़ार देने वाले लोग भी मौजूद हैं! जब भी आप अवसादग्रस्त हों, इस विषय में सोचिए और सिर्फ सोचते ही मत रहिए बल्कि यह समझने की कोशिश कीजिए कि वास्तव में आपका जीवन इससे कितना बेहतर है!
अर्थात, शिकायत मत कीजिए! और सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति के संदर्भ में ही नहीं-अपनी सामाजिक हैसियत के संदर्भ में भी, अपने प्रेमसंबंधों को लेकर, किसी से प्रेमसंबंध न हो पाने या प्रेमसम्बन्धों में आ गई खटास को लेकर भी!
दुनिया की बुरी हालत पर अवसादग्रस्त न हों बल्कि कुछ ऐसा करें कि वह आपकी आँखें खोल दे और आपको पता चले कि आपका जीवन कितना सुखद और सम्पन्न है और तब आप उसमें सकारात्मक परिवर्तन ला सकेंगे और साथ ही उनकी मदद भी कर सकेंगे, जो आपसे अधिक बुरी परिस्थितियों में जीवन गुज़ार रहे हैं!
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