जबरदस्ती अपने आपको झूठी ख़ुशी के हवाले न करें- 17 अक्तूबर 2013

हमारी प्रिय मित्र सिल्विया ने पिछले किसी दिन के ब्लॉग पर टिप्पणी करते हुए एक और विचार का ज़िक्र किया है, जो अपने आपको आध्यात्मिक मानने वाले लोगों में व्यापक रूप से प्रचलित है। इस पर पूरी तरह अमल करने पर यह भी, पिछले ब्लॉगों में चर्चित विचारों की तरह ही आपके लिए सरदर्द पैदा करने वाला सिद्ध होगा। काफी सोच-विचार के बाद और कुछ सीमा तक ही इस विचार को जीवन में उतारा जा सकता है: "आप स्वयं अपने आपको प्रसन्न कर सकते हैं!"

सिल्विया ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि इस कथन में कुछ औचित्य तो है मगर वह नहीं समझती कि उसे हर विपरीत परिस्थिति का इलाज मानते हुए हर कहीं लागू किया जा सकता है। इस विश्वास के चलते कि "आपको स्वयं अपनी खुशी प्राप्त करनी है" आप बहुत सी परेशानियों को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। मैं उसकी बात से सहमत हूँ और इस पर कुछ विस्तार से कहना चाहता हूँ।

इस सलाह के पीछे का विचार गलत नहीं है। आपका मूड कैसा हो इस बारे में आप सोच-समझकर स्वयं ही निर्णय लेते हैं। आप स्वयं ही यह निर्णय लेते हैं कि आप चीजों और परिस्थितियों को किस तरह ग्रहण करना चाहते हैं। आप स्वयं यह निर्णय ले सकते हैं कि आप किसी व्यक्ति के साथ, उसके प्रति दिल में पूर्वाग्रह रखते हुए मिलना चाहते हैं या खुले दिल से। आप खुद यह निर्णय लेते हैं कि मौसम आपका मूड खराब कर दे। यह आप पर निर्भर है कि आपकी सास की कोई टिप्पणी आपको परेशान और क्रोधित कर दे या न करे।

फिर भी मुझे यह बात माननी पड़ेगी कि इस नियम की कुछ सीमाएं भी है। उसका अर्थ यह नहीं है कि कितनी भी बुरी परिस्थिति में आप फंसे हों, अपनी मनःस्थिति को बदलकर खुश हो जाएँ! इसके विपरीत, इस तरह का सोच और रवैया आपके लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हो सकता है!

इसका अर्थ तो यह होगा कि मान लीजिए अपने साथी के साथ आपके सम्बन्ध ठीक नहीं है और वह आपको लगातार गालियाँ बकता रहता है और आपको बुरा लगता है कि उसे आपकी भावनाओं की कद्र नहीं है और इसके बावजूद आप इस परिस्थिति को बदलने का प्रयत्न नहीं करते बल्कि सोचकर बैठे रहते हैं कि इस परिस्थिति के लिए आप ही जिम्मेदार हैं। समझ बैठे हैं कि इसमें आपकी ही कुछ गलती रही होगी। आपको आत्मग्लानि हो रही है क्योंकि आपको बुरा लग रहा है और परिस्थिति से आप खुश नहीं हैं। आपको लग रहा है कि आपको अपनी आध्यात्मिकता का स्तर ऊंचा उठाना होगा, कि आपको पर्याप्त आत्मज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता है, जिससे समझ सकें कि ये विपरीत परिस्थितियाँ आपको और ऊंचा उठाती हैं। अगर आप इस हालत में भी खुश रह लेते हैं तो आपको लगेगा कि आप आध्यात्मिकता की एक सीढ़ी ऊपर उठ गए।

नहीं, नहीं, नहीं। इस वाक्य का यह अर्थ कदापि नहीं है! मैं अब भी उसे गलत नहीं कहूँगा बल्कि आप ही उसे ठीक तरह से समझ नहीं पाए कि अपने आपको खुश करने के लिए आपको क्या करना चाहिए! आपको इस परिस्थिति से अपने आपको निकालना होगा! इस बात को स्वीकार कीजिए कि जिसे आप चाहते हैं, जब वह आपका अपमान करता है तो आपको दुख होता है। यह बिल्कुल स्वाभाविक बात है कि आप ऐसा महसूस करते हैं! इसे स्वीकार करें कि आपको गुस्सा आता है, जब किसी काम पर आप हफ्तों मेहनत करते हैं और उसका सारा श्रेय आपका सहकर्मी उड़ा ले जाता है! स्वीकार करें कि आपकी भी कुछ आवश्यकताएँ हैं और जब वे पूरी नहीं होती तो आप दुखी होते हैं।

ये सभी भावनाएँ पूरी तरह उचित हैं। वे होती ही हैं और आवश्यक नहीं कि वे ‘नकारात्मक’ ही होती हों। वे इशारा करती हैं कि आप परिवर्तन चाहते हैं लेकिन उस परिवर्तन का अर्थ यह भी हो सकता है कि आप गाली-गलौज करने वाले लोगों से किनारा कर लें, अपना पक्ष किसी के सामने दृढ़ता के साथ रखें और कुछ समय अपने लिए भी बचाकर रखें, इत्यादि। जब तक आपको भीतर से खुशी न महसूस हो, नकली खुशी को जबर्दस्ती न ओढ़ लें। वह बिन्दु तलाश करें जहां आप खुश होते हैं-और उसके साथ आने वाली दूसरी भावनाओं का भी स्वागत करें!

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