धार्मिक परम्पराएँ शिष्यों को गुरुओं के अपराधों पर पर्दा डालने पर मजबूर करती हैं-12 सितंबर 2013

गुरू

आसाराम प्रकरण में सबसे बड़ी समस्या उनके शिष्यों की धार्मिक पृष्ठभूमि है। हिन्दू धर्म मनुष्य-पूजा (व्यक्ति पूजा) को प्रोत्साहित करता है! यह धार्मिक पृष्ठभूमि और संस्कार ही वे कारक हैं जो लोगों को अपने गुरु के विरुद्ध कुछ भी बोलने से रोकते हैं, भले ही उन्होंने गुरु को अपराध करते हुए देख लिया हो। यही कारण है कि गुरु द्वारा प्रताड़ित होने पर भी उनके शिष्य उसका प्रतिवाद नहीं करते और उसके अपराधों को किसी से कहते हुए सकुचाते हैं। ऐसे अपराध हो रहे हैं तो इनके पीछे सबसे मुख्य कारण यही है!

जिन धर्म-ग्रन्थों पर गुरु बनाने की परंपरा आधारित है, वे बताते हैं कि गुरु ईश्वर के समान या उससे भी बड़ा है। अर्थात, यह कि किसी दूसरे के मुंह से गुरु की आलोचना सुनना भी पाप है। जो भी गुरु करता है, ठीक करता है, इसलिए या तो आप उस व्यक्ति का मुंह बंद कर दें या अपने कान बंद कर लें, जिससे गुरु के विरुद्ध उच्चारे गए ऐसे कटु शब्द आपके दिमाग तक न पहुँचें।

हिन्दू धर्म कहता है कि गुरु के माध्यम से ही आपको मुक्ति प्राप्त हो सकती है-इसलिए हर मनुष्य के पास एक ऐसा व्यक्ति होना ही चाहिए जिसके बारे में वे कोई भी बुरी बात न सुनें। जैसे वे भगवान की मूर्ति के पाँव धोते हैं वैसे ही वे उसके भी पाँव पखारेंगे। भगवान के सामने नतमस्तक होते हैं उसी तरह गुरु के सामने भी होंगे। अपने गुरु के लिए उनका सम्पूर्ण समर्पण होगा।

हिन्दू धर्म की कुछ परम्पराओं में शिष्यों से अपने तन, मन और धन को गुरु के चरणों में समर्पित करने का आदेश है। कुछ गुरु जानबूझकर इसका शब्दशः अर्थ ग्रहण करते हैं और अपने शिष्यों से यथार्थ में अपने शरीर का समर्पण करने की अपेक्षा करते हैं। आसाराम के कुछ पूर्व शिष्य अब यह बता रहे हैं कि कैसे वह अश्लील बातें किया करता था और चाहता था कि वे धर्म-ग्रन्थों में लिखे आदेशानुसार अपने शरीर को उसे समर्पित करें!

ऐसी अपेक्षा रखने वाला अकेला आसाराम ही नहीं है। मैंने कई सम्प्रदायों के बारे में सुना है कि उनमें विवाह के तुरंत बाद घर की नई नवेली दुल्हिन को पहले परिवार के गुरु के पास जाना पड़ता है और उसके बाद ही वह अपने पति के साथ हमबिस्तर हो सकती है। उसे गुरु को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है जैसे देवताओं को चढ़ाया जाता है! जब गुरु उसके साथ सो लेगा, उसे आशीर्वाद देगा तभी उसका पति और परिवार वाले उसका स्वागत करेंगे! भारत में आज भी यह सब चल रहा है, मगर क्यों? क्योंकि उनके लिए गुरु ईश्वर जैसा ही है!

काफी समय पहले, मेरा एक दोस्त था जो मेरी तरह ही प्रवचन इत्यादि किया करता था और उसने गुरु का चोला भी पहन लिया था। वह शादीशुदा था और लगभग 40 वर्ष का था लेकिन जब वह एक गाँव में गया तो उसके आयोजक ने अपनी 17 वर्षीय लड़की उसे दान कर दी! उसने क्या किया? उसने अपनी पत्नी को छोड़ दिया और उस लड़की से विवाह कर लिया और अब उनके कई बच्चे हैं!

विश्वास ने ऐसे रीति-रिवाजों को जन्म दिया है। धर्म ही गुरुओं द्वारा किए जा रहे सारे अपराधों की जड़ है। बचपन से ही लोगों को सिखाया जाता है कि गुरु ही ईश्वर है। वह कोई गलत काम कर ही नहीं सकता और तुमसे अपेक्षा की जाती है कि गुरु की हर आज्ञा का पालन करोगे। अगर कोई कहता है कि यह गलत है तो उसका मुंह बंद कर दो या उसकी बात सुनो ही मत। उसके कथन की उपेक्षा करो या आलोचना से बचो, मन में आ रहे अपने विचारों का त्याग करो।

आसाराम का प्रकरण एक युवा लड़की की बहादुरी के चलते सामने आया। भारत भर में ऐसी बहुत सी दुखद कहानियाँ पीड़ितों के दिलोदिमाग में वाबस्ता हैं। डर, अपराध और दमन-धर्म और उसके ग्रंथ हमें सिर्फ और सिर्फ यही दे सकते हैं।

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