जब भी मैं ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह व्यक्त करते हुए या ईश्वर पर अपने अविश्वास को ज़ाहिर करते हुए कोई ब्लॉग लिखता हूँ कुछ लोग मुझे गलत सिद्ध करने की कोशिश में लग जाते हैं. कभी-कभी ईश्वर पर विश्वास करने वालों और नास्तिकों में यह चर्चा शुरू हो जाती है कि ईश्वर है या नहीं. विशेषकर जब विश्वासु एक हिन्दू होता है तो मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि वह इस वाद-विवाद में क्यों उलझ रहा है क्योंकि यह धर्म तो साफ़-साफ कहता है कि आप तर्क की सहायता से ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण प्राप्त नहीं कर सकते.
वेदों में कई जगह यह कहा गया है कि ईश्वर बुद्धि और तर्क से परे की चीज़ है और आप विचार-विमर्श करके या किसी से बात करके उसे नहीं जान सकते. निश्चित रूप से हिन्दू धर्म इस मामले में अकेला नहीं है जो अपने अनुयायियों को ऐसी अक्लमंदी प्रदान करने की कोशिश करता है. ईश्वर बुद्धि से परे है, आप उसका प्रमाण नहीं खोज सकते, इसलिए आप उस प्रमाण को खोजने की कोशिश भी मत कीजिए!
ईश्वर विश्वास का मामला है. आप अवश्य ही ईश्वर पर विश्वास कर सकते हैं; ईमानदारी से कहता हूँ, मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन आप इस प्रश्न पर बहस क्यों करना चाहते हैं कि वह है या नहीं! आपका धर्म ही आपसे कहता है कि आप इसकी कोशिश भी मत कीजिए! आप अपने ईश्वर को किसी सिद्धांत या दर्शन में सीमाबद्ध क्यों करना चाहते हैं?
अगर आप ईश्वर पर भरोसा करना चाहते हैं तो कीजिए, आपको ऐसा करने का पूरा अधिकार है. लेकिन इस बात का ध्यान रखिये कि यह आपका सिर्फ विश्वास है, आपका निजी विश्वास. किसी दूसरे को उसका प्रमाण देने की आपको कोई ज़रुरत ही नहीं है. किसी को अपने विश्वास का कायल करने की आपको क्या आवश्यकता है? यह सिद्ध करने की आपको क्या ज़रुरत है कि आप सही हैं और वह गलत! आपको ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए, आपका धर्म ही बताता है कि उस दूसरे व्यक्ति को ईश्वर का अनुभव करना होगा, उसे स्वयं महसूस करना होगा तभी वह ईश्वर पर विश्वास कर सकेगा.
सबसे बड़ी बात यह कि अपने विश्वास को प्रमाण की तरह इस्तेमाल न करें. आपका विश्वास प्रमाण नहीं है और वह हो भी नहीं सकता. विश्वास सिर्फ विश्वास है और विश्वास ही रहेगा. वह सच हो सकता है मगर यह आवश्यक नहीं है कि हो ही. बहुत से लोग भूत-प्रेत पर विश्वास करते हैं मगर वे नहीं होते. वे जोर देकर कहते हैं कि उनके पास प्रमाण है, वे प्रमाण खोजने की कोशिश करते हैं लेकिन उनका विश्वास सिर्फ विश्वास ही होता है! इसका मतलब यह नहीं कि वह सचमुच है! पुराने ज़माने में लोग और भी कई बातों पर विश्वास करते थे- कि धरती समतल है और आप बहुत दूर तक चलते जाएँगे तो किसी विशाल कुएं में गिर जाएँगे, कि सूर्य, चन्द्र और तारे सिर्फ हमारे लिए अस्तित्व में आए हैं और सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है. उनके लिए वही सच था, भले ही हम आज जान गए हैं कि उनकी बात गलत थी. आपको अपना विश्वास दूसरों पर लादना नहीं चाहिए.
मैं यह मानने के लिए तैयार हूँ कि आपका विश्वास आपको शांति प्रदान करता है, कि आप दुनिया में होने वाली बहुत सी बातों के लिए इस विश्वास को उत्तरदायी मानते हैं. यह विश्वास कि कोई है जो आपके हित-अहित का ख्याल रखता है, जिसने इस संसार को बनाया है और जो संसार में होने वाली एक-एक बात जानता है, आपके ह्रदय को आश्वस्ति और प्रेम से भर देता है. यह विश्वास आपके जीवन में आने वाली परेशानियों में आपको ढाढ़स बंधा सकता है, आपकी सहायता कर सकता है.
लेकिन अंततः यह आपका अपना विश्वास ही है और इसका यह मतलब नहीं है कि वह सही भी है. विश्वास प्रमाण नहीं है और इसलिए आपके धर्मग्रंथों के बहुत ही विवेकशील और ज्ञानी लेखकों ने शुरू में ही आपको सलाह दी है कि आप उसे सिद्ध करने की कोशिश भी न करें और न ही उसके बारे में कोई तर्क करें. इससे कोई लाभ नहीं होगा, उससे कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकेगा. आप अपने ईश्वर को अपने तर्कों की सीमा में बाँध देंगे और सामने वाले को उसका कायल भी नहीं कर पाएँगे. इस बात को स्वीकार करें कि यह आपका विश्वास है; उसी विश्वास के साथ जिएँ और दूसरों को भी उनके अपने विश्वासों या अविश्वासों के साथ जीने दें!
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