कल की डायरी पर मुझे बहुत सी दिलचस्प प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुई हैं। उनमें से एक प्रतिक्रिया एक ऐसे विचार के बारे में है जो अब काफी लोकप्रिय होता जा रहा है और मैं आज उसी पर अपने कुछ विचार रखता हूँ। किसी ने लिखा कि वह ईश्वर पर विश्वास तो करता है पर किसी व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि एक प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा के रूप में जो हर इंसान (प्राणिमात्र) के अंदर विद्यमान रहती है। यह व्यक्ति-और दूसरे भी कई लोग-यह विश्वास करते हैं कि यह ऊर्जा, क्योंकि हमारे भीतर ही होती है, सिर्फ उन्हीं की सहायता करती है जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। हमारे भीतर जो भी सकारात्मक और शुभ है वही हमें रास्ता दिखाता है। फिर यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसकी आवाज़ सुनें या उसकी उपेक्षा कर दें।
यह पहला मौका नहीं है जब मैं इस सिद्धांत के बारे में सुन रहा हूँ और यह पहली बार नहीं है जब मुझे लगा है कि यह सिद्धांत उन लोगों का सिद्धांत है जो अब ईश्वर के बारे में धर्म की परंपरागत, पिटी-पिटाई और काल्पनिक धारणाओं के कायल नहीं रह गए हैं और धीरे-धीरे धर्म-रहित आचार-व्यवहार और विचार की तरफ बढ़ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर के अस्तित्व को पूरी तरह से नकारने में असमर्थ और धर्मों द्वारा दी गई स्थापनाओं पर अविश्वास के चलते वे बीच की किसी स्थिति में हैं।
मैं पूरी तरह मानता हूँ कि 'अंतरात्मा की आवाज़' जैसी कोई चीज़ होती अवश्य है। लेकिन मैं मानता हूँ कि यह आपकी संवदनाओं और आपके अनुभवों का मिला-जुला रूप होता है। क्या अच्छा है, यह बताने का आपके अवचेतन का एक तरीका। मैं नहीं समझता कि यह ‘अंतरात्मा की आवाज़’ कोई ईश्वरीय शक्ति या ऊर्जा है। इसके विपरीत यह बहुत मानवोचित है- और कभी-कभी यह आपको ऐसे काम करने की सलाह भी दे सकती है जो आपको परेशानी में डाल दें! सामान्यतः मैं समझता हूँ कि इस आवाज़ को सुनना अच्छी बात है लेकिन फिर आपको इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि आवाज़ कहाँ से आ रही है। अगर वह आपकी भीतरी इच्छाओं से उद्भूत है तो यह ठीक बात है कि आप उस आवाज़ को बेहिचक सुनें। अगर आपको लगता है कि अहं को चोट पहुँचने के कारण या और किसी कारण से उपजे क्रोध की वजह से आप भीतर से कोई काम करने की इच्छा महसूस कर रहे हैं तो फिर आप समझ जाएँ कि आवाज़ कहाँ से आ रही है और वह बात न सुनें। अगर आप ऐसी आवाज़ को सुनेंगे तो आपको काफी हिंसक प्रतिक्रिया प्राप्त होगी और आपको बाद में पछताना पड़ सकता है। इस सिद्धांत में विश्वास करने वाले ऐसे द्वन्द्व का भी बहुत मज़ेदार स्पष्टीकरण देते हैं: वह ईश्वरीय आवाज़ नहीं बल्कि आपका अहं बोल रहा था। आप दोनों आवाज़ों में भेद नहीं कर सके! या अगर आप बिना 'अंतरात्मा की आवाज़' सुने भी परेशानी में पड़ गए तो ये लोग कहेंगे कि आप सुन ही नहीं पाए और इस तरह ईश्वर को आपकी मदद का मौका ही नहीं दिया। वे दावा करेंगे कि आपको कई संकेत मिले मगर आपने उनकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया।
अंत में यही नज़र आता है कि आप ईश्वर के बचाव में खड़े वकील हैं। आपका तर्क यह है कि ईश्वर ने आपको कई संकेत किए और उसने आपको बुरी परिस्थिति में नहीं पहुँचाया बल्कि आप खुद ही यह काम कर रहे थे, क्योंकि आपने उसके संकेतों की उपेक्षा की। अगर हम कल के बलात्कार वाले उदाहरण की ओर लौटें तो स्पष्ट है कि आप भी बलात्कार पीड़िता को ही दोषी ठहराते नज़र आते हैं।
मैं जानता हूँ कि इस सिद्धांत को मानने वाला कोई भी व्यक्ति मेरे इस कथन का विरोध करेगा। लेकिन यह तर्कपूर्ण और सच है। आप शायद अपने विचारों को व्यक्त करने का कोई ऐसा रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं जिससे किसी को बुरा न लगे: न ही ईश्वर पर विश्वास करने वालों को और न ही नास्तिकों को। वास्तविकता यह है कि बीच का कोई रास्ता नहीं है। नास्तिक कभी आपकी बात नहीं मानेंगे कि ईश्वर दरअसल ‘अंतरात्मा की आवाज़’ ही है और ईश्वर पर विश्वास करने वाले इस बात से बुरी तरह खफा होंगे कि आपने ईश्वर जैसी शक्ति को 'अंतरात्मा की आवाज़' जैसी छोटी सी इयत्ता में सीमित कर दिया।
मान जाइए, आप दोनों पार्टियों को संतुष्ट नहीं कर सकते। आप उस रास्ते पर बढ़ चुके हैं जो ईश्वर रहित दुनिया की ओर ले जाएगा। अपना आखिरी कदम बढ़ाइए और स्वीकार कीजिये कि जो भी आप करते हैं वह आपकी संवेदनाओं, विचारों और अवचेतन से प्रभावित आपका अपना निर्णय होता है, और कुछ नहीं।
Related posts
बेतुका और हास्यास्पद विश्वास कि ईश्वर ने मंदिर तो बचा लिया जबकि हजारों लोगों की जान ले ली – 5 मई 2015
अगर आप ईश्वर या धर्म पर कोई आस्था नहीं रखते तो फिर अपनी शुभकामनाओं को ‘प्रार्थना’ क्यों कहते हैं? 30 अप्रैल 2015
"’ईश्वर महज अपना काम कर रहा है" – धार्मिक आस्थावानों का नेपाल के भूकंप पर स्पष्टीकरण – 28 अप्रैल 2015
नेपाल के भूकंप पीड़ितों के लिए प्रार्थना कर रहे हैं? किसके सामने? उसके, जिसने यह हादसा बरपाया है? 27 अप्रैल, 2015
संदेहवाद अथवा अज्ञेयवाद एक पड़ाव है, अंतिम लक्ष्य नहीं – 16 जनवरी 2014
गणेश और स्पाइडरमैन – बच्चों के लिए दो एक जैसे सुपरहीरो!- 17 सितंबर 2013
अगर मैं, आप और हम सब ईश्वर हैं तो आप ये उपदेश किसे दे रहे हैं? – 21 जून 2013
आस्तिक स्वयं को धोखा देते हैं यह कहकर कि हर बुरी घटना के पीछे ईश्वर का विधान है – 20 जून 2013
मुझे आपके भगवान से कोई परेशानी नहीं होगी यदि….. 19 जून 2013
