अगर आप ईश्वर या धर्म पर कोई आस्था नहीं रखते तो फिर अपनी शुभकामनाओं को ‘प्रार्थना’ क्यों कहते हैं? 30 अप्रैल 2015

ईश्वर

इस सप्ताह की शुरुआत मैंने यह बताते हुए की थी कि प्रार्थनाओं से नेपाल के भूकंप पीड़ितों का कोई भला नहीं होने वाला। दूसरे दिन मैंने आपको एक बेहूदा टिप्पणी दिखाई थी, जिसमें कहा गया था कि प्राकृतिक हादसे ईश्वर के भले काम हैं। उसके जवाब में मैंने कर्म-सिद्धांत की चर्चा करते हुए अपनी बात को और स्पष्ट किया था। लेकिन आज मैं अपनी मूल बात अर्थात, ‘प्रार्थना’ पर लौटना चाहता हूँ। क्यों? क्योंकि कुछ लोगों ने मुझसे कहा है कि प्रार्थना करते हुए भी वास्तव में वे ईश्वर की आराधना नहीं कर रहे होते।

मुझे यह बार-बार यह बात पढ़ने-सुनने को मिली और ये ब्लॉग लिखने के दौरान ही मेरे मन में यह बात घर कर गई कि बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जो प्रार्थनाओं पर तो विश्वास करते हैं मगर धर्म पर नहीं। कुछ ईश्वर पर भी आस्था नहीं रखते लेकिन फिर भी प्रार्थना करते हैं। कुछ और हैं, जो प्रार्थना का इस्तेमाल अपनी संवेदनाएँ या शुभकामनाएँ व्यक्त करने हेतु करते हैं। वास्तव में मैं पूछना चाहता हूँ कि आखिर ये सब लोग इन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति को ‘प्रार्थना’ क्यों कहते हैं?

खुद मैंने अपने आपको एक बहुत धार्मिक व्यक्ति से एक नास्तिक के रूप में परिवर्तित किया है और जानता हूँ कि आप भी उसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। प्रार्थना करने की वर्षों की आदत के पश्चात उसे अचानक छोड़ देना बहुत मुश्किल होता है। और उन प्रार्थनाओं पर विश्वास न रखना भी। अर्थात, प्रार्थना का असर मुख्यतः मनोवैज्ञानिक होता है: आप अपनी शुभकामनाओं या संवेदनाओं को दोहराते हैं, मन ही मन और कभी-कभी तेज़ स्वर में और इस तरह अपने लक्ष्य और अपनी इच्छा की तसदीक करते हैं, बल्कि अक्सर अपने आपको इस बात का विश्वास भी दिलाते हैं कि अब चिंता की कोई बात नहीं है। आपके भीतर यह एहसास अब भी बना रहता है कि आपने अपने आपको किसी और के सहारे (हाथ में) छोड़ दिया है और अब ज़िम्मेदारी उसकी है। जो लोग अब भी ईश्वर पर तो आस्था रखते हैं मगर धर्म पर नहीं, वे इस विचार के बीच झूलते रहते हैं। और जो दोनों पर भरोसा नहीं करते, वे इसके तथाकथित लाभ से वंचित नहीं रहना चाहते!

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि आप अब भी यही करते रह सकते हैं-लेकिन मुझे लगता है, आपको उसे ‘प्रार्थना’ नहीं कहना चाहिए! इस शब्द का अपना एक इतिहास है और वह सदा से धर्म और ईश्वर के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है। उसे आप 'भावनाओं की अभिव्यक्ति' क्यों नहीं कहते? या 'शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति'? तब वह, एक लिहाज से, किसी खास विचार पर ध्यान लगाने का ही एक अंग हो जाएगा, एकाग्रता का एक सचेत तरीका।

जब कोई व्यक्ति मुश्किल में होता है तो हम उसके लिए कामना करते हैं कि वह उस मुश्किल से सकुशल बाहर निकल आए। फिर नेपाल के भूकंप पीड़ितों के लिए संवेदना व्यक्त करते हुए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? आप कह सकते हैं कि आप उनकी पीड़ा और मुश्किलों में सहभागी हैं, कि न सिर्फ उनके प्रति आप शुभकामना व्यक्त कर रहे हैं बल्कि उनके स्वास्थ्य, उनके शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ और सौभाग्य की कामना भी करते हैं। कि उन्हें जिस चीज़ की भी आवश्यकता हो, वह उन्हें प्राप्त हो, किसी तरह की मदद में किसी तरह की कमी न रहे।

अब, उदाहरण के लिए, नेपाल में स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है। काठमांडू विमानतल पर स्थान की और आपसी तालमेल की कमी है। यह एक विकट समस्या है और वहाँ अटके पर्यटकों को रवाना करने में बड़ी दिक्कतें पेश आ रही हैं। इन्हीं कारणों से त्वरित अंतर्राष्ट्रीय मदद पहुँचने में भी देर हो रही है। बारिश के चलते भी लोगों को मदद पहुँचाना मुश्किल हो रहा है और जिनके घर-बार बरबाद हो चुके हैं, वे खुले में पड़े हैं और उन पर बरसात का कहर टूट पड़ा है। भोजन, पानी और दवाइयाँ आदि उन लोगों तक नहीं पहुँच पा रही हैं, जिन्हें उनकी तुरंत सख्त आवश्यकता है तथा अभी एपिसेंटर तक भी नहीं पहुँचा जा सका है।

इन लोगों को मदद की सख्त ज़रूरत है। चैरिटी संगठनों को आर्थिक सहयोग प्रदान करके आप उनकी मदद कर सकते हैं। अगर आप यह न कर सकें तो अपना समय देकर और श्रमदान करके भी उनकी मदद कर सकते हैं। और अगर आप इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते और सिर्फ अपने मित्रों से अपनी भावनाएँ व्यक्त करना चाहते हैं तो प्यार भरे शब्दों में अपनी संवेदनाएँ और शुभकामनाएँ व्यक्त करें, प्रार्थना करके नहीं।

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