बलात्कार जैसी दर्दनाक घटना के बाद ईश्वर पर विश्वास किसी प्रकार का दिलासा देने के काबिल नहीं है! क्यों? – 06 फरवरी 2013

ईश्वर

कल मैंने दिसंबर में हुए सामूहिक बलात्कार के धार्मिक पहलुओं की चर्चा की थी। जब यह विषय समाचारों में खूब गर्माया हुआ था सारे अखबारों में और टीवी के समाचार चैनलों में हर तरफ बलात्कार पर बहस-मुबाहिसा हो रहा था। जब भी कोई धार्मिक व्यक्ति ऐसी बहसों में शामिल होता, वह किसी न किसी बिन्दु पर आकर यह ज़रूर कहता था कि ऐसे हादसों में पीड़ित के पास धर्म ही एकमात्र सहारा बचता है और यह भी कि ऐसे हादसों के बाद पीड़ित धर्म में ही सांत्वना प्राप्त कर सकता है। उसी समय किसी ऑनलाइन साइट पर सत्य का प्रतिपादन करता हुआ एक वाक्य मेरी नज़र से गुज़रा: जब मुझ पर बलात्कार हो रहा था ईश्वर वहाँ नहीं था; मुझे अब उसकी आवश्यकता नहीं है!

मुझे लगता है कि एक ऐसे व्यक्ति की, जिस पर बलात्कार जैसा भयानक अत्याचार हुआ है, यह एक बहुत सामान्य और सहज प्रतिक्रिया होती है। यह ऐसे लोगों की भी सहज प्रतिक्रिया होगी जिनके परिवार में आकस्मिक अकाल मृत्यु हुई है। यह बात मेरे परिवार से बेहतर कौन जान सकता है? धार्मिक व्यक्तियों द्वारा हमेशा मुझे बताया जाता रहा है कि धार्मिक विधियाँ और क्रिया-कर्म ऐसे मौकों पर लाभकारी सिद्ध होते हैं। वे कहते हैं इन रीति-रिवाजों का पालन करने से आपको मन की शांति प्राप्त होती है क्योंकि आपको मालूम है कि आपकी देखभाल करने के लिए कोई न कोई आपसे ऊपर भी है। मैं इसे नहीं मानता! पहली बात तो यह पूछी जानी चाहिए कि ऐसे मामलों में कोई कर्मकांड किस तरह सहायक हो सकता है? अगर आपका ईश्वर पर विश्वास, समय को वापस ला सके तब तो मैं यह बात मान सकता हूँ। बलात्कार पीड़िता चुपचाप बैठकर प्रार्थना करे और समय अपने आप बलात्कार से पहले वाले समय में पीछे चला जाए। फिर वह इरादा करे कि घर लौटने के लिए उस मनहूस रास्ते का या तरीके का इस्तेमाल न करे बल्कि कोई दूसरा रास्ता पकड़े। वह किसी टॅक्सी का इंतज़ार कर ले, या किसी दोस्त को साथ ले ले। वह भागने का इरादा कर सकती है या सौ बात की एक बात, बलात्कार वाली जगह पर ही न जाए! बिल्कुल, अगर ईश्वर पर आपका विश्वास समय को वापस ला सकता है तो अवश्य कुछ हो सकता है!

मगर यह सोचा भी नहीं जा सकता और इसीलिए मेरा मानना है कि किसी बलात्कार पीड़िता या ऐसे ही किसी हादसे के शिकार व्यक्ति को ईश्वर पर भरोसा रखने की सलाह देना और कहना कि ईश्वर सब कुछ ठीक कर देगा, एक तरह का पागलपन है। स्वाभाविक ही वे आपसे पूछेंगे: अगर ईश्वर मेरी सहायता के लिए अब है तो फिर उस वक्त क्यों नहीं था जब मेरे साथ ऐसा भयंकर हादसा हो रहा था? क्यों नहीं वह उस वक़्त अवतरित हुआ? अपनी तलवार से उसने बलात्कारियों के टुकड़े-टुकड़े क्यों नहीं कर दिये? या कोई ईश्वरीय तूफान क्यों नहीं भेज दिया जो चमत्कारिक ढंग से बलात्कारियों को अंधा कर देता और मुझे भागने का मौका मिल जाता? या सीधे-सीधे उन बलात्कारियों के मन से बलात्कार का खयाल ही निकाल बाहर करता!

ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता। तो अपने ईश्वर से कहो कि ऐसी बुरी इच्छा न किया करे! धरती पर लोग भूखे क्यों मर रहे हैं, युद्ध क्यों हो रहे हैं, लोग बलात्कार क्यों कर रहे हैं, हत्याएँ क्यों हो रही हैं, क्यों नहीं हम सब शांति पूर्वक मिल-जुलकर नहीं रह रहे हैं? हम सब स्वस्थ क्यों नहीं हैं और क्यों लोग प्रकृति और धरती को प्रदूषित कर रहे हैं? विश्व में तानाशाह क्यों हैं और क्यों ईश्वर के होते हुए बच्चों को काम करना पड़ता है? क्यों, क्यों, क्यों? अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है और अगर सब कुछ उसकी इच्छा से ही होता है तो फिर वह इतनी बुरी हस्ती क्यों है? मैं इस तर्क को नहीं मानता कि उसकी कोई विशाल योजना है जिसे हम नहीं जान सकते। आप किसी बलात्कार पीड़िता से यह बात नहीं कह सकते! तो फिर क्यों एक ऐसा व्यक्ति, जिसे इतनी बड़ी यातना से होकर गुज़रना पड़ा हो ईश्वर पर भरोसा करे या धार्मिक विश्वासों में सांत्वना प्राप्त करने की कोशिश करे? नहीं, मैं बिल्कुल नहीं समझता कि ऐसा हो सकता है या होना चाहिए!

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