ईश्वर से डरकर आपको क्या मिलता है? अच्छे नैतिक विचार या दिमागी बीमारियाँ? – 18 जून 2013

मैंने एक बार कहा था कि जो लोग ईश्वर से डरते हैं वे हर बात से डरते हैं। इस बात के पीछे तर्क है। क्योंकि वे मानते हैं कि ईश्वर हर जगह है और धरती पर होने वाली हर बात, हर घटना उसकी मर्ज़ी से हो रही है इसलिए जब वे ईश्वर से डरते हैं तो वे हर चीज़ से, हर उस बात से डरने लगते हैं जो हर जगह ईश्वर की मर्ज़ी से हो रही है! क्योंकि मैंने ऐसे विचार कई बार सामने रखे हैं इसलिए मुझे एक खास तरह के विचार भी कई बार प्राप्त हुए हैं: डर एक ऐसी चीज़ है जो आवश्यक है! डर ज़रूरी है, यह लोगों के लिए अच्छा है! यह देखकर कि यह अपवाद स्वरूप, किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं है, मैंने महसूस किया कि इस बारे में मुझे कुछ विस्तार से लिखना चाहिए कि क्या डरना इतना महत्वपूर्ण है, विशेषकर ईश्वर से।

दरअसल एक व्यक्ति ने तो अपना बहुत सा समय और ऊर्जा खर्च करते हुए मुझे समझाने की कोशिश की कि ईश्वर से डरने के क्या-क्या लाभ हैं। पता चला कि बहुत से धार्मिक लोग यह समझते हैं कि दुनिया भर की संस्कृतियों में व्याप्त सारे नैतिक विचारों की जड़ धर्मभीरुता में निहित है। सिर्फ ईश्वर के डर के कारण ही लोग अपनी पत्नियों के साथ धोखा नहीं करते, गैरतमंद लोग चोरी नहीं करते, डाकेजनी और हत्याएँ नहीं करते और लोग एक-दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और पड़ोसियों, दोस्तों और यहाँ तक कि अनजान लोगों की मदद करते हैं।

एक तुलना न्याय और व्यवस्था से भी की गई। अगर कानून, पुलिस और कोर्ट-कचहरी का डर न रहे तो सब कुछ उलट-पुलट जाएगा, अराजकता फैल जाएगी, लोग अपराधी हो जाएंगे और कोई भी शांति से नहीं रह पाएगा। स्पष्ट है कि ईश्वर का डर उनके विचार में इसी तरह की कोई चीज़ है।

जैसा कि मैंने कहा, अगर किसी एक व्यक्ति ने यह बात कही होती तो उसे उसका व्यक्तिगत विचार मानकर मैं इतना सब लिखने की ज़हमत नहीं उठाता क्योंकि यह मेरे लिए एक बेहूदा तर्क होता। क्योंकि मैंने बहुत से लोगों से ऐसी बातें सुनी हैं, इसी तर्क को आधार बनाकर लिखे गए बड़े-बड़े तर्कपूर्ण (?) लेखों और पुस्तकों को पढ़ा है, इसलिए मुझे लगता है मुझे भी इस बारे में अपनी बात अवश्य रखनी चाहिए। मैंने कभी एक छोटा सा पैराग्राफ पढ़ा था जो इस मामले में बहुत मौजूं प्रतीत होता है:

आप बिना ईश्वर पर विश्वास किए नैतिक कैसे हो सकते हैं? बिना ईश्वर के तो शायद मैं लोगों की हत्या करने लग जाऊंगा, बलात्कार कर सकता हूँ, बच्चों का यौन शोषण कर सकता हूँ, खुद अपने बच्चों को प्रताड़ित कर सकता हूँ, बैंकों में डाका डाल सकता हूँ, चोरी कर सकता हूँ, हर किसी पर जादू-टोना कर सकता हूँ, पत्नी को धोखा दे सकता हूँ, मार-पीट सकता हूँ, जानवरों की बेवजह हत्या कर सकता हूँ और खुद अपने आपको तकलीफ पहुंचा सकता हूँ। लेकिन क्योंकि मैं ईश्वर पर भरोसा करता हूँ और जानता हूँ कि ऐसे काम करने पर मैं अनंत काल तक नर्क में सड़ता रहूँगा, मैं ऐसे काम नहीं करता! बिना डर के आप अच्छे व्यक्ति बन ही नहीं सकते!

क्या यह तर्क कोई मानी रखता है? क्या आप वाकई हत्या नहीं कर रहे हैं क्योंकि आप डरते हैं कि कहीं ईश्वर आपको इसकी कोई सज़ा न दे दें? मैं यह नहीं मान सकता कि ईश्वर से डरने वाला हर व्यक्ति ऐसा दुष्ट और क्रूर होता अगर उसे ईश्वर के बारे में कोई जानकारी नहीं होती! और इतना मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास न करने वाले अधिकतर व्यक्ति उतने ही अच्छे, सामान्य और व्यवहार कुशल होते हैं जैसे ईश्वर पर विश्वास करने वाले। फर्क सिर्फ इतना ही होता है कि वे ईश्वर से नहीं डरते!

नहीं, मैं नहीं समझता कि ईश्वर से डरना इतना महत्वपूर्ण है। बल्कि मैं मानता हूँ कि यह एकदम गलत बात है। यह डर धार्मिक माता-पिता अपने बच्चों के कोमल मन में बिठाते है। वे अपने बच्चों को बताते हैं कि वे उस सर्वशक्तिमान से डरकर रहें, जो कि एक तरह का खतरा या कोई गुस्सैल सुपरवाइसर जैसा कोई शख्स है जो हर वक्त, हर जगह आपको सज़ा देने के लिए विद्यमान रहता है! और यही असुरक्षा का भाव वयस्कों में भी पाया जाता है। वह उन्हें दब्बू, डरपोक और बच्चों जैसा बना देता है जिनमें कोई आत्मविश्वास नहीं होता और जो हमेशा अपने निर्णयों पर दूसरों की मुहर प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, जो उन्हें बता सकें कि वे ठीक कर रहे हैं और ईश्वर उन्हें इसके लिए दंडित नहीं करेगा।

मैं निश्चय पूर्वक कह सकता हूँ कि यह डर बिल्कुल गलत है। जब नैतिकता की बात आती है तो मुझे लगता है कि हमें तथ्यों पर नज़र डाल लेनी चाहिए। दुनिया की जेलें सिर्फ नास्तिकों से ही भरी हुई नहीं हैं! नैतिक रूप से ठीक व्यवहार सिर्फ धार्मिक लोगों की बपौती नहीं है। सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी अभिभावकों की है कि वे अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं। मेरे विचार में उन्हें चाहिए कि जो भी सिखाएँ, उनके भीतर किसी भी बात का डर पैदा किए बगैर सिखाएँ!

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