परसों यानी 25 अप्रैल को नेपाल की धरती काँप उठी। नेपाल, जहाँ भूकंप से हजारों लोगों की मौत हो गई, यहाँ से अधिक दूर नहीं है। जबकि वृन्दावन में भूकंप के झटके महसूस ही नहीं किए गए, आसपास के अधिकांश इलाकों में न सिर्फ झटके महसूस किए गए बल्कि मथुरा जैसी जगहों में घरों की दीवारें भी क्षतिग्रस्त हुईं। निश्चित ही, हम सभी इतने बड़े पैमाने पर हुई जान-माल की हानि के चलते सदमे में हैं और पीड़ितों के परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करना चाहते हैं। लेकिन आज मैं लोगों द्वारा व्यक्त की जा रही शुभेच्छाओं का सम्मान करते हुए कहना चाहता हूँ कि एक बात पीड़ितों को किसी तरह की राहत प्रदान नहीं कर सकती: और वह है, ईश्वर के सामने की जा रही प्रार्थना!
मैं जानता हूँ कि मैं ठीक-ठीक क्या लिख रहा हूँ और यह भी कि मेरे बहुत से पाठक मेरे शब्दों से सहमत नहीं होंगे। बहुत से लोग, कई वे लोग भी जो धार्मिक नहीं हैं, प्रार्थनाओं की शक्ति पर विश्वास रखते हैं। इसीलिए अब वे कह रहे हैं कि वे भी पीड़ितों के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।
मैं ईमानदारी के साथ विश्वास करता हूँ कि इसका कोई अर्थ नहीं है। यहाँ तक कि मैं इसे मूर्खतापूर्ण कहूँगा। आप उन लोगों के लिए सशरीर, अपने हाथों से और अपने पैरों से कुछ कर सकते हैं, वहाँ जाकर और सहायता-सामग्रियाँ इकठ्ठा करके या किसी चैरिटी संस्था को अपना समय देकर और श्रम-दान करके ऐसा कर सकते हैं। आप अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करके ऐसा कर सकते हैं, चैरिटी संस्थाओं को अपनी मेधा और बुद्धि की सेवाएँ मुहैया कराके या उन लोगों को याद करके और उनसे संपर्क करके, जो इस मामले में कुछ मदद कर सकते हैं। या आप मदद कर सकते हैं, खुद अपनी जेब हल्की करके, चैरिटी संस्थाओं को चन्दा या सहयोग राशियाँ देकर। अगर आप इनमें से कुछ भी कर सकते हैं, तो करें और पीड़ितों को उनसे कोई न कोई लाभ प्राप्त होगा। प्रार्थनाओं से कतई नहीं।
क्यों नहीं? क्योंकि आप उस सर्वशक्तिमान, परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं, जो स्वयं यह भूकंप और उसके साथ यह विपत्ति लेकर आया है! अपनी इच्छा के विरुद्ध, वह आपकी प्रार्थना क्यों सुनेगा?
उसकी इच्छा के बगैर तो पेड़ का पत्ता भी नहीं हिलता। इसलिए बिना उसकी इच्छा के धरती कैसे काँप सकती है? जी हाँ, यह उसी की मर्ज़ी थी, जिसने आबाद घरों को उजाड़ दिया जिसने घरों में रहने वाले इन्सानों सहित घर के घर ढहा दिए, उसी की मर्ज़ी से पहाड़ों की बर्फ पिघली और मलबा बहाकर लाई, जिसमें हजारों लोग दबकर मर गए, गाँव के गाँव उजड़ गए, मलबे में समा गए और उसी की इच्छा से हजारों लोग गिरती हुई प्राचीन इमारतों के नीचे आकर, जिन्हें विश्व-घरोहर कहा जाता था, जान गँवा बैठे। उसी की इच्छा से अनगिनत महिलाएँ विधवा हो गईं, पुरुष विधुर हो गए और बच्चे अनाथ!
अगर ये सब बातें उसकी इच्छा से हुईं हैं तो फिर आप क्यों उसी ईश्वर के सामने प्रार्थना कर रहे हैं? ईश्वर, जो किसी दैत्य जैसा नज़र आ रहा है, जो इतना क्रूर है, उसके सामने?
अगर आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं और अब भी उसके सामने प्रार्थना करते हैं, पूजा अर्चना करते हैं तो आपको उन बातों को भी स्वीकार करना चाहिए, जो उसके बारे में धर्मग्रंथों में लिखी हुई हैं: सब कुछ का कर्ता वही है और जो भी वह करता है, अच्छा ही करता है। उसके द्वारा ढाई गई सभी मुसीबतों को स्वीकार कीजिए-उन्हें रोकने या सुधारने के लिए उससे प्रार्थना करना अर्थहीन है!
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