परमात्मा? हाँ, धर्म? ना – आध्यात्मिकता का आधुनिक विचार – 12 फरवरी 13

ईश्वर

कल मैंने लिखा था कि कुछ लोग 'धार्मिक होते हुए अंधविश्वासी ना होने' का दावा करते हैं। मैंने आपसे कहा था कि यह मात्र धर्म को और वास्तव में पूरी धारणा को छोड़ने के मार्ग पर एक कदम की तरह प्रतीत होता है। दूसरी बहुत ही सामान्य अवस्था है, जिसमें लोग कहते हैं कि 'मैं परमात्मा में तो विश्वास करता हूं, लेकिन किसी धर्म में नहीं'। इस धारणा या मानसिकता पर मैँ अपने विचार बताता हूं।

सबसे पहले हम इस बात पर नजर डालते हैं कि 'परमात्मा' का विचार वास्तव में कहां से आया है। मैं ऐसा नहीं सोचता कि मनुष्य के स्वाभाविक विकास की शुरुआत में हमारे पूर्वज परमात्मा के बारे में सोच रहे थे। वास्तव में वे तो इस पर विचार कर रहे थे कि शिकार कैसे करें, क्या खाएं, और एक क्षण उन्होंने औजार बनाना सीख लिया और आग की खोज की। इस विकास में कुछ समय के बाद, वे बहुत कुछ जानते थे पर कुछ बातों को व्याख्यायित नहीं कर पाते थे। उन्होंने इन बातों को, प्राणियों को, प्रकृति को या परमात्मा को अलौकिक शक्ति का उत्तरदायी ठहराया। चूंकि विकास की गति पूरी दुनिया में एकसमान हो रही थी इसलिए परमात्मा के बहुत से नाम हैं।

धर्म की स्थापना तब हुर्इ जब लोगों ने उस रूप के हर ओर नियम बनाने शुरू किए, जिस शक्ति को परमात्मा कहा जाता है । उन्होंने लोगों द्वारा एक-दूसरे को बतार्इ गर्इ बातों पर कहानियां लिखी। साथ ही जो लोग दूसरों को डराने या धोखा देने के लिए अतिरिक्त शक्ति का अंश या भाग चाहते थे उन पर भी कहानियां लिखी। उन्होंने अपने परमात्मा को परिभाषित किया और दुनिया की जनसंख्या विभिन्न समूहों में बंट गर्इ।

बहुत से लोग स्वयं कर्इ वर्षों तक धार्मिक रहने के बाद, धर्म की वजह से जो भी गलत हुआ आमतौर पर उन बातों को समझते हैं। उन्हें गलती का एहसास होता है, वे अनैतिकपक्ष देखते हैं और वे समझने लगते हैं कि धर्म ने कैसे लोगों के बीच भय, क्रोध, पीड़ा, युद्ध और घृणा पैदा कर दी है।वे धर्म और संगठित धर्म कहे जाने को इसलिए छोड़ देते हैं।वे मन्दिर, चर्च, मस्जिद या परमात्मा के अन्य घरों में नहीं जाते, प्रचारकों और पुजारियों से दूर रहते हैं और घर में रखे धर्मग्रंथों को भी स्वयं से दूर कर देते हैं।

हालांकि वे सबकुछ त्यागना नहीं चाहते। उन्हें किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता होती है जो उन्हें कह सके कि जिस पर तुमने इतने लंबे समय से विश्वास रखा वो पूर्णतया गलत नहीं था। वे परमात्मा पर विश्वास रखने का निर्णय लेते हैं। उनके लिए परमात्मा उनके जीवन का आश्रय होता है, भले ही उनका परमात्मा धर्म द्वारा वर्णित परमात्मा से बहुत भिन्न लगता हो।

र्इमानदारी से कहूं तो मुझे इस अवधारणा से कोर्इ समस्या नहीं है। मैं समझ सकता हूं कि आप अपने जीवन में अलौकिक शक्ति की ईच्छा रखते हैं। आप चाहते हैं कि जब आपअपनी जिम्मेदारियों के बारे में सोचें, भविष्य की चिंता करें या आपको मृत्यु का भय हो तो वो शक्ति आपको शान्ति दे। वो परमात्मा दिव्य शक्ति का रूप या मात्र प्रकृति भी हो सकता है। ये कोई अन्य व्यक्ति जैसे- गुरु, संगी या बच्चा भी हो सकता है।यह मन की आवाज या अनुभूति भी हो सकती है जिसका आप पालन करना चाहते हैं। मैं इस पर विश्वास नहीं करता, लेकिन जब तक आप स्वयं में परमात्मा का विश्वास रखेंगे, दूसरों पर ये थोपना नहीं चाहेंगे और स्वयं व दूसरों को हानि नहीं पहुंचाएंगे मैं इसे पूरी तरह से स्वीकार करूंगा और इसके खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहूंगा।

हालांकि आपको या दूसरों को हानि पहुंचाने वाली किसी भी बात का मैं विरोध करूंगा। ना तो किसी को धोखा दीजिए ना ही किसी के धोखे में आइए।अपने स्वभाव और ईच्छा के विरुद्ध मत जाइए।जो ऐसा ढ़ोग करते हों कि केवल वे ही परमात्मा की सेवा कर रहे हैं अन्य धर्म नहीं उनके प्रलोभन में आकर दूसरे धार्मिक संप्रदाय में मत जाइए।

कई संप्रदाय हैं जिन्हें धर्म से अलग एक आम प्रवृति का एहसास हो गया है। ये है विमुखता, जो संगठित धर्म के विरुद्ध उत्पन्न हुई है। वे धर्म को छुपाकर प्रतिक्रिया करते हैं।एक प्रयोग कीजिए, हिन्दुत्व और धर्म के बारे में इस्कॅान भक्त या पुजारी के समक्ष कुछ प्रश्न उठाइए! वे आपसे कहेंगे कि वे धर्म के लिए नहीं परमात्मा के लिए सबकुछ करते हैं।वे दावा करते हैं कि उनका धर्म से लेना-देना नहीं है और वे तो मात्र कृष्ण के भक्त हैं। लेकिन कृष्ण कौन हैं? कृष्ण हिन्दू भगवान हैं ! धर्म के बिना, हिन्दुत्व के बिना कोई कृष्ण नहीं होंगे!

इसलिए ऐसे आडंबरयुक्त और मत परिवर्तन के प्रयासों का शिकार मत बनिए जो आपको अन्य धर्म संप्रदाय से जोड़ना चाहते हों। अगर आप किसी में विश्वास रखना चाहते हैं, अच्छा है, उसे बनाए रखिए।अपने लिए उस पर भरोसा रखिए और इसे व्यक्तिगत रूप से आपकी सहायता करने दीजिए लेकिन अपना ख्याल रखिए और इसे दूसरो पर मत थोपिेए।

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