"’ईश्वर महज अपना काम कर रहा है" – धार्मिक आस्थावानों का नेपाल के भूकंप पर स्पष्टीकरण – 28 अप्रैल 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

अपने ब्लॉग में प्रस्तुत विचारों पर कल मुझे इतना रोचक फीडबॅक प्राप्त हुआ है कि उसे मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ, जिससे आप जान सकें कि लोगों के मन में कैसे-कैसे खयाल आ सकते हैं। और संभव है कि उस टिप्पणी पर मेरा जवाब, जिसे मैं टिप्पणीकार के लिए लिख रहा हूँ, शायद आपको भी रुचिकर लगे। बल्कि सभी दूसरे पाठक उसे पढ़कर आनंदित होंगे क्योंकि टिप्पणीकर्ता को यह जवाब पाने की कतई उम्मीद नहीं होगी!। तो चलिए, स्वयं देखिए, मामला क्या है!

टिप्पणी की शुरुआत उन्हीं शब्दों से हुई थी, जिनके बारे में शुरू से मुझे पता था कि लोग इसी बात से शुरू करेंगे: कि प्रार्थनाएँ काम करती हैं क्योंकि हम सब एक-दूसरे के साथ एक उच्चतर परा-शक्ति के ज़रिए जुड़े हुए हैं, जिसके हम सभी अलग-अलग, सूक्ष्म हिस्से हैं। चलिए मान लेते हैं-क्योंकि मैं इस आपसी संपर्क पर विश्वास नहीं करता इसलिए मुझे विश्वास नहीं है कि इस अर्थ में प्रार्थनाएँ किसी तरह का लाभ पहुँचा सकती हैं।

लेकिन आगे वह व्यक्ति किसी दूसरी ही दिशा में चल पड़ा:

"…ईश्वर अपना काम कर रहा है। हम सब अपने कर्मों का फल पाते हैं और यह बात हम भूले रहते हैं जब कि हमें अच्छे कर्म करना चाहिए। ईश्वर हमारे हृदय, नाड़ी को चलायमान रखता है, हमारी नसों में रक्त प्रवाहित करता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उसी की कृपा से हम साँस लेते और छोड़ते हैं। उसने हमें देखने, सुनने, बोलने, सूंघने और छूने आदि की शक्ति देकर अपना काम कर दिया है। वह सर्वव्यापी है। वह हमारा कुछ भी बुरा नहीं कर सकता बल्कि वह हमसे प्रेम करता है, भले ही आप उस पर विश्वास करें या न करें। कृपा करके दूसरों को बहकाने की कोशिश न करें।"

तो आपके अनुसार ईश्वर अपना काम कर रहा है? अच्छा, तो इसीलिए उसने इतने लोगों की जान ले ली…

लेकिन आप तो यह कह रहे हैं कि जो भी होता है हमें स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि सब कुछ ईश्वर ने ही किया है। अगर आप किसी बात को बुरा महसूस करते हैं तो वह तो उस व्यक्ति के कर्म का परिणाम होता है, जो कि वास्तव में लोगों की भलाई के लिए ही है। इसका मतलब तो यह हुआ कि बुरी बातें भी अच्छी ही हैं- और कल मैंने ठीक यही लिखा था! कि अगर आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं तो आपको इन पंक्तियों पर भी विश्वास करना चाहिए

करते रहिए, लेकिन अगर आप इस तरह से सोचते हैं तो मैं आपके लिए दुखी हुए बगैर नहीं रह सकता! क्या यह बहुत अच्छी बात नहीं है कि ईश्वर सिर्फ अच्छा करता है! तदनुसार, जब किसी बच्ची के साथ बलात्कार होता है तो वह भी ईश्वर की इच्छा से होता है, उस लड़की के कर्मों के फल का नतीजा होता है! जब बच्चे बिना भोजन के या इसलिए कि चिकित्सा सेवाओं तक उनकी पहुँच नहीं है, मारे जाते हैं तो वह भी उनके कर्मों का फल ही होता है और वह सब भी उसी तरह होता है, जैसा ईश्वर चाहता है। निश्चित ही नेपाल में आया भूकंप भी सिर्फ ईश्वर की मर्ज़ी से ही आया था! स्वाभाविक रूप से वह ईश्वर के प्रेम का इज़हार था-क्या यह बात आपको समझ नहीं आ रही है?

मैं जानता हूँ कि इस तरह सोचने वालों के साथ वाद-विवाद करना समय और ऊर्जा की बरबादी के सिवा कुछ भी नहीं है। आप उन्हें कभी भी, किसी भी हालत में सहमत नहीं कर सकते। लेकिन कभी-कभी यह बात बहुत खलती है कि लोग ऐसी क्रूरता को भी अपने सर्वशक्तिमान ईश्वर की इच्छा मानते हैं और यहाँ तक कि, उसके प्रेम की निशानी भी!

मुझे नेक सलाह भी प्राप्त हुई है कि मैं इस तरह बात करना बंद करूँ और अपने कर्मों की चिंता करूँ। लेकिन मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि आप मेरी चिंता न करें, वास्तव में मैं कर्म-सिद्धान्त पर विश्वास ही नहीं करता और इसलिए इस बात पर भी मेरी कोई आस्था नहीं है कि कोई परा-शक्ति इन निर्भीक शब्दों के लिए मुझे कोई सज़ा दे सकेगी। परेशानी आपकी है, मेरी नहीं।

इन बेकार के विचारों से परेशान होने की जगह मैं बच्चों को भोजन कराऊँगा और शिक्षा प्रदान करके उनकी मदद करूँगा, अच्छे कामों में आर्थिक सहयोग प्रदान करूँगा और इस विषय पर लगातार लिखता रहूँगा कि कभी कोई भूला-भटका व्यक्ति इसे पढ़ेगा और शायद उससे प्रभावित होकर सही रास्ते पर आएगा और इस ओर सक्रिय होगा।

अच्छे काम करते हुए, सिर्फ प्रार्थना करके नहीं!