आस्तिक स्वयं को धोखा देते हैं यह कहकर कि हर बुरी घटना के पीछे ईश्वर का विधान है – 20 जून 2013

मैंने कई बार धर्म और ईश्वर के बारे में लिखा है और दोनों के ही समर्थन में नहीं लिखा। मैंने अंधविश्वासों का पर्दाफाश करते हुए उदाहरण सहित यह दर्शाने की कोशिश की है कि कैसे विश्वास गलत सिद्ध होते हैं। मैंने धर्मग्रंथों के अजीबोगरीब उद्धरण देते हुए समझाने का प्रयास किया है कि कैसे ये बातें उचित और सच नहीं हो सकतीं और बार-बार यह सवाल रखा है कि अगर ईश्वर इतना ही सर्वशक्तिमान है तो वह धरती पर इतनी बुरी घटनाएँ होने ही क्यों देता है। यह एक नास्तिक का पहला और सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है: मैं ईश्वर पर भरोसा क्यों करूँ जब कि वह हमें इतना दुख और तकलीफ पहुंचाता है।

और हमेशा आस्तिकों का एक ही जवाब होता है: ईश्वर के तौर-तरीके रहस्यमय होते हैं। वह हमारी इच्छाओं का गुलाम नहीं है और अपनी मर्ज़ी से सब काम करता है। लेकिन हमें यही विश्वास करना चाहिए कि जो भी वह करता है, अच्छा ही करता है। वह प्रकृति के चक्र का भी खयाल रखता है। अगर वह हमारी मर्ज़ी से चले तो हम कभी मरेंगे ही नहीं क्योंकि मृत्यु तो तकलीफदेह होती है, मरने वाले के लिए न हो तो उसके करीबी लोगों के लिए तो होती ही है! शेर के बारे में सोचो, उसे कुछ न कुछ खाना ही होगा। हरिण मरना नहीं चाहता मगर शेर जीवित रह सके इसलिए उसे मरना ही पड़ता है। यह तो ईश्वर द्वारा निर्मित बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण प्रकृति चक्र है!

यह एक आस्तिक का आम जवाब होता है और मैंने भी इसे बार-बार सुना है। लेकिन हर बार मुझे इस तर्क को खारिज कर देना पड़ता है। यह अलग बात है कि एक शेर को अपने भोजन के लिए हरिण का शिकार करना पड़ता है। यह तो प्राकृतिक घटना हुई, शेर की सहज प्रवृति की बात हुई, जीवित रहने के लिए शेर इसके अलावा कुछ नहीं कर सकता। इसके विपरीत जब लोग लालच में एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने लगते हैं, हत्या तक कर देते हैं तो वह बिलकुल दूसरी बात हो जाती है। जब सत्ता के भूखे तानाशाह ताकत के बल पर लोगों को उनकी धरती से हकालकर खुद रहने लगते हैं या वहाँ तेल के कुएं खोदना शुरू कर देते हैं और भूख से मरते लोग आजीविका के लिए दूसरी जगहों पर ठिकाना खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं। जब लोग आपस में युद्ध करने लगते हैं, जब वे प्रकृति को नुकसान पहुँचाते हैं और जब वे एक-दूसरे को यातनाएँ देने में भी नहीं हिचकिचाते। ये मानव की सहज प्रवृतियाँ नहीं हैं और न ही कोई चक्र इसके पीछे है।

क्या आप यह कहना चाहते हैं कि किसी बच्ची पर होने वाले बलात्कार की घटना अच्छी बात है क्योंकि उसके द्वारा ईश्वर ने एक व्यक्ति को अपनी प्राकृतिक यौनेच्छा पूर्ण करने का मौका दिया। मैं आपको हजारों ऐसे उदाहरण दे सकता हूँ जहां आप अपने गलत तर्कों को लागू करते हुए पागल नज़र आएंगे। नहीं, ईश्वर बहुत सी ऐसी घटनाओं को होने देता है जोकि नहीं होनी चाहिए और वो घटनाएँ अच्छी नहीं होतीं। दुनिया में ऐसी-ऐसी दर्दनाक घटनाएँ इतनी ज़्यादा तादात में हो रही हैं कि उन्हें अच्छी घटनाएँ मान पाना असंभव है। अगर वास्तव में इन घटनाओं के पीछे ईश्वर का हाथ है तो मैं तो यही मानूँगा कि ईश्वर से ज़्यादा क्रूर कोई नहीं है! और कौन ऐसे ईश्वर पर विश्वास करना चाहेगा? नहीं, उसके पीछे कोई तर्क, कोई योजना नहीं है; वह सिर्फ एक विश्वास है, बल्कि अंधविश्वास है, फितूर है। लोग इस विश्वास को बनाए रखना चाहते हैं जिससे वे दुनिया में होने वाली सब बुरी बातों के लिए कोई बहाना ढूँढ सकें और किसी सर्वशक्तिमान को उनके लिए जिम्मेदार ठहरा सकें, भले ही वह एक कल्पित पात्र ही क्यों न हो।

अगर ईश्वर वाकई सर्वशक्तिमान है तो वह उन नास्तिकों के विरुद्ध क्यों नहीं कुछ करता जिनकी संख्या दिनोदिन बढ़ती ही चली जा रही है और जो उसकी सत्ता को स्पष्ट चुनौती दे रहे हैं और सिद्ध करने पर तुले हुए हैं कि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है! मैं जानता हूँ कि आस्तिक इसके पीछे भी अपने सर्वशक्तिमान का कोई तर्क प्रस्तुत कर देंगे; शायद यह कि वह सभी की रक्षा करने वाला है या यह कि वह उन नास्तिकों को अपने बगैर रहने का अनुभव प्रदान करना चाहता है कि उस दुर्दांत अनुभव के बाद वे उसके पास वापस लौट आएंगे!

लेकिन वास्तविकता यह है कि ईश्वर पर विश्वास करने वाले आस्तिक नास्तिकों को कभी भी सहमत नहीं करा पाएंगे क्योंकि अधिकतर नास्तिक ऐसे विवादों पर बात करना भी पसंद नहीं करते। जैसे ही कोई विश्वासु अपनी मान्यताओं का बखान शुरू करता है वे भाग जाते हैं और फिर कभी दिखाई नहीं देते- वे जानते हैं कि धर्मविश्वासुओं को अपने विश्वास किसी तर्क या विचार की तरह प्रस्तुत ही नहीं करना चाहिए, अपने विश्वासों को इतना बिकाऊ नहीं बनाना चाहिए!

आप विश्वास करते रहें कि आपके क्रूर ईश्वर ने ये सारी बुरी चीज़ें बनाई हैं, सारी दुखद घटनाओं का जिम्मेदार भी वही है, लेकिन वह खुद बुरा नहीं है! लेकिन मैं तो अपनी आँखें खुली रखना चाहता हूँ और यथार्थ को समझना चाहता हूँ। मैं अपने सामर्थ्य के अनुसार पूरी कोशिश करता रहूँगा कि इस वातावरण में परिवर्तन लाया जा सके चाहे वह गरीब भूखे बच्चों को खाना खिलाकर हो या उन्हें उचित शिक्षा देकर।

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