संदेहवाद अथवा अज्ञेयवाद एक पड़ाव है, अंतिम लक्ष्य नहीं – 16 जनवरी 2014

ईश्वर

आज मैं धर्म या धार्मिक लोगों पर नहीं और नास्तिकों पर भी नहीं बल्कि संदेहवादियों या अज्ञेयवादियों (Agnosticism) पर कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहता हूँ।

जो इस शब्द को पहली दफा सुन रहे हैं, उनके लिए बता दूँ कि ये वही लोग हैं, जो अपने आपको आस्तिक तो नहीं मानते मगर नास्तिक भी नहीं मानते। लब्बोलुवाब यह कि वे मानते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व हो सकता है। वे इस बात पर सुनिश्चित नहीं हैं कि कोई परम शक्ति का अस्तित्व है या नहीं है। वे अपने आपको संशयवादी, संदेहवादी, अनिश्चयवादी और कुछ लोग और आगे जाकर, अपने झुकाव या प्रवृत्ति के अनुसार ‘अज्ञेयवादी आस्तिक’ या ‘अज्ञेयवादी नास्तिक’ कहते हैं।

अज्ञेय या संदेह वादी का तर्क यह होता है कि ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं, जिनका स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता और जबकि एक ओर ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है तो दूसरी तरफ यह भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं ही है। यह संदेह हमेशा रहेगा और इसलिए वे भी हमेशा संदेह में रहते हैं।

ईश्वर पर उनका यह संदेह आस्था के संभावित लाभों को त्यागे बिना धर्म पर संदेह जताने की चेष्टा से उपजे हैं। अगर यह अंततः सत्य प्रमाणित हो जाए तो आपको स्वर्ग, मोक्ष या वह सब प्राप्त हो जाएगा, जिसे आपकी आस्था (या धर्म) प्रदान करने का वचन देती है। लेकिन आपको वे लाभ मिल नहीं पाएंगे क्योंकि वास्तव में आप उन पर विश्वास ही नहीं करते! एक आस्तिक की नज़र में अगर आपके मन में संदेह है तो आप ईश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं हैं। अगर आपने ईश्वर के अस्तित्व के प्रति ज़रा सा भी संदेह व्यक्त किया है तो कोई भी धर्म आपको आस्थावान नहीं मानेगा। उनके अनुसार तो आप नास्तिक ही हैं। आप चाहते हैं कि आपके लिए एक खास वर्ग बनाया जाए और उसे कुछ विशिष्ट शर्तों के साथ ‘अज्ञेयवादी’ कहा जाए। आप ईश्वर पर विश्वास नहीं करते लेकिन चाहते हैं कि खुदा न खास्ता वह मौजूद हो ही तो फिर आप उसके लाभों से वंचित न रह जाएँ।

इस भौतिक दुनिया में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां आप यह सुनेंगे कि: संदेह करना अच्छी बात है। जब आप सत्य के रूप में स्वीकृत उन बातों पर प्रश्न खड़े करेंगे तभी आप कुछ आगे बढ़ सकते हैं; जैसे संदेह ही कई क्षेत्रों में हुईं बहुत सी वैज्ञानिक खोजों मे मूल में दिखाई पड़ता है। लेकिन जब मानव मस्तिष्क की बात होती है तब संदेह को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल मैं उसे संदेह मानता ही नहीं बल्कि उसे भ्रम कहता हूँ। और यह भ्रम की स्थिति उन लोगों के लिए और भी बुरी है क्योंकि वे न इधर के हैं न उधर के।

जो लोग अपनी आस्था पर अडिग हैं उनका मन-मस्तिष्क साफ है। वे जानते हैं कि ईश्वर है, वे जानते हैं कि उसका प्रेम और उसकी कृपा प्राप्त करने के लिए उन्हें क्या करना होगा और वे वैसा करते हैं। और जो आस्तिकता से मुक्त हैं वे भी अपनी आस्था को लेकर स्पष्ट हैं। वे जानते हैं कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है और उन्हें अपने नैतिक मूल्यों के अनुसार व्यवहार करने के अतिरिक्त और कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। जो भ्रम में जीते हैं उनके पास आस्तिकों की तरह मार्गदर्शन के लिए कुछ भी नहीं होता और न ही वे नास्तिकों की तरह मुक्त ही होते हैं!

मेरा विश्वास है कि यह स्थिति अंततः उनके व्यक्तित्व के लिए समस्या बन जाता है। किसी निर्णय पर पहुँचने में उन्हें समस्याएँ पेश आएंगी क्योंकि वे निश्चित नहीं हैं कि किधर जाना उचित होगा। क्या मैं खुद स्वतंत्रतापूर्वक कोई निर्णय ले लूँ या मुझे धार्मिक नियमों के बारे में समझकर निर्णय लेना चाहिए क्योंकि आखिर वे महत्वपूर्ण हो भी सकते हैं, भले ही आज वे अप्रासंगिक लग रहे हों? मैं वास्तव में कौन हूँ और कहाँ से आया हूँ? उन्हें अपनी पहचान के साथ समस्या हो सकती है, निर्णय न ले पाने की स्थिति आ सकती है जिसका कि परिणाम आखिर में मनोवैज्ञानिक समस्याओं के रूप में हो सकता है।

स्वाभाविक ही, संदेहवादी होना आस्तिक से नास्तिक हो जाने की प्रक्रिया के बीच कोई संक्रमण बिन्दु भी हो सकता है और मैं खुद भी कुछ समय तक इसी बिन्दु पर अटका रह चुका हूँ। यह एक संक्रमण काल होता है, जिसमें आप विभिन्न विचारों को आपस में मिलाते हैं, उन पर एक साथ विचार करते हैं और अंततः सत्य आपको स्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है। लेकिन स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है! किसी को भी अधिक समय तक भ्रम की हालत में नहीं रहना चाहिए अन्यथा मानसिक समस्याएँ पैदा होना अवश्यंभावी है!

अगर आप उनमें से एक हैं, जो अपने आपको ‘अज्ञेयवादी’ या ‘संदेहवादी’ के रूप में वर्गीकृत करते हैं तो आपकी भलाई इसी में है कि आप कृपया इस तरफ या उस तरफ होने का निर्णय अवश्य ले लें!

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