जब एक परिचयात्मक शब्द सब कुछ बदलकर रख देता है! 4 फरवरी 2015

हमारे स्कूल में हाल ही में शिक्षक के एक रिक्त पद पर नई नियुक्ति का अवसर आया। जब भी कोई स्थान रिक्त होता है तो पहले से प्राप्त आवेदनों पर हम पहले विचार करते हैं और अपने मित्रों से भी कहते हैं कि अगर उनका कोई पढ़ाने वाला मित्र यह नौकरी चाहता हो, तो बताएँ। इस बार हमारे पास एक ऐसी अनुशंसा आई, जिस पर पहले हमें आश्चर्य हुआ और फिर ज़ोर की हँसी!

रमोना को एक मित्र ने बताया कि उसकी कोई सहेली है, जो पहले शिक्षक रह चुकी है और हमारे यहाँ नौकरी करना चाहेगी। उसके शब्दों में, जो उसने कहा: "वह disabled (विकलांग) है इसलिए वह हर हाल में यह नौकरी चाहती है!"

रमोना ने उसकी सहेली को साक्षात्कार के लिए बुलवाया और इस विषय में हमें भी बताया। हमने आपस में बात की और सोचा इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि हमारे बच्चों के लिए यह अच्छा ही होगा कि वे किसी विकलांग को-जो भी उसकी विकलांगता हो, जैसे मान लीजिए किसी लंगड़ी महिला को-पढ़ाता हुआ देखेंगे! यह उन्हें बताएगा कि हम कैसे भी नज़र आएँ, समाज के लिए हम सब समान रूप से उपयोगी हैं! वे यह भी सीखेंगे कि जो भी कठिनाई हो, अगर उसे हम सकारात्मक रूप से ग्रहण करें तो सबका कोई न कोई हल निकलता है और हममें इतनी शक्ति फिर भी बची होती है कि जीवन में कठिनाइयों का मुक़ाबला करते हुए सफलता पूर्वक आगे बढ़ सकें!

यही सब सोचते हुए हम उस महिला का इंतज़ार कर रहे थे कि वह आए, अपना लिखित परिचय दे और हम उसका साक्षात्कार ले सकें। फिर एक महिला आई और उसने हमारी उसी मित्र की मित्र होने की बात कहते हुए अपना परिचय दिया। हम समझ गए कि यही वह महिला है, जिसके विषय में हम लोग बात कर रहे थे। लेकिन यह क्या? यह तो किसी तरह भी विकलांग नहीं दिखाई दे रही है!

तो रमोना ने उसका साक्षात्कार लेना शुरू किया। उसने उसका लिखित परिचय पढ़ा, शिक्षक के रूप में उसके अनुभव की जानकारी ली, उसके जीवन के लक्ष्य के बारे में पूछा। पूरी बातचीत के दौरान रमोना अपनी बारीक नज़र से यह भाँपने की कोशिश कर रही थी कि वह किस विकलांगता से ग्रस्त है, जिसका बयान उसकी सहेली ने इतनी आजिज़ी के साथ किया था। उसकी दोनों बाहें अक्षुण्ण थीं, दोनों पैर भी सही-सलामत थे। हाथों में पाँच उँगलियाँ थीं, कुछ भी ऐसा नहीं था, जो ठीक तरह से काम न कर रहा हो। दो आँखें, नाक, मुँह, सब कुछ सामान्य, हम-आप सबके जैसा!

एक और विचार कौंधा: हो सकता है रमोना की मित्र का अर्थ उसकी ‘मानसिक विकलांगता’ से हो! लेकिन नहीं, यह भी संभव नहीं था-फिर वह इस विकलांगता के बावजूद कैसे इतना पढ़-लिख पाई और इतने दिन बच्चों को पढ़ाती रही? और, कुछ भी हो-बातचीत में कुछ भी ऐसा दिखाई नहीं दे रहा था कि उसे सोचने-समझने में या बात करने में या अपने आपको अभिव्यक्त करने में कोई परेशानी हो!

तो बाद में जब हम अपनी उस मित्र से मिले, रमोना ने पूछा: उसका साक्षात्कार अच्छा रहा-लेकिन तुमने यह क्यों कहा कि वह विकलांग है?

जवाब बिल्कुल स्पष्ट था: "वह वाकई विकलांग है! उसका परिवार बहुत गरीब है, वे अपने भोजन और कपड़ों तक का इंतज़ाम नहीं कर पा रहे हैं!"

हम आश्चर्य से उसकी तरफ देखते रह गए-और फिर ठहाका मारकर हँसने लगे! हमारी मित्र नम्र दिखाई देना चाहती थी और अंग्रेजी में ‘poor’ (गरीब) होने की जगह ‘disabled’ (विकलांग) कहना उसे बेहतर नज़र आया! अरे भई, ऐसी भी क्या बात है? हम भी गरीबों की सहायता करके खुश होते हैं!

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