आप बिकनी पहनना ठीक नहीं समझते? मेरी पत्नी उन्हें बीच पर पहनती हैं! क्या हम अब भी दोस्त बने रह सकते हैं? 9 जून 2015

कल मैंने अपने एक मित्र के बारे में आपको बताया था, जिसके साथ, दुर्भाग्य से, मैं अब ज़्यादा नजदीकी महसूस नहीं करता। मैं एक उदाहरण से इस स्थिति का विश्लेषण करूँगा, जिसके अनुसार हमारे विश्वासों, नजरियों और विचारों ने हम दोनों के बीच दूरी पैदा कर दी है। यह इस बात से संबंधित है कि महिलाओं और लड़कियों को क्या पहनना चाहिए-और क्या ऐसे वस्त्र, बदन को पर्याप्त न ढँक पाने की वजह से बलात्कार और यौन दुराचार को आमंत्रित करते हैं।

मेरा यह मित्र पूजापाठी हिन्दू है, वह हिन्दू संस्कृति और परम्पराओं का समर्थक और उसका वाहक है और शायद आप पहले ही इन विषयों पर मेरे विचारों को जानते होंगे। हमारे बीच किसी अखबार में प्रकाशित एक चित्र पर चर्चा हुई थी, जिसने मुझे एक ब्लॉग- जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं- लिखने के लिए भी प्रेरित किया था। इस चित्र का संदेश यह था कि पुरुषों को चाहिए कि वे अपनी लड़कियों को ‘पूरे कपड़ों में ढँककर’ रखें।

मैंने पूरी शक्ति से इस विचार का विरोध किया और अपनी बात के पक्ष में हर तरह के तर्क दिए लेकिन स्वाभाविक ही, उसे सहमत नहीं कर पाया क्योंकि जीवन के बारे में उसके विचार दक़ियानूसी, परंपरावादी और धर्म से संचालित भारतीय संस्कृति से प्रभावित थे।

इस चर्चा के बाद मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे याद आया, कुछ ही दिन पहले मैंने अपने मित्र को उस समय के फोटो दिखाए थे, जब हम यूरोप में थे। उसमें एक बीच पर खींचे गए मेरे, मेरी पत्नी, बेटी और दूसरे मित्रों के फोटो थे। हम तैरने की पोशाकों में थे, जिनमें मेरी महिला मित्रों और स्वाभाविक ही मेरी पत्नी ने बिकनी पहनी हुई थी और मेरी बेटी ने तैरते समय पहनने वाले बच्चों के वस्त्र पहने हुए थे-जो महज रंगीन अंडरवीयर लग रहे थे।

अगर आप या कोई भी यह मानता है कि जो कपड़े पूरा शरीर नहीं ढँकते, बलात्कार को आमंत्रित करते हैं, अगर आप सोचते हैं कि महिलाओं को बिकनी नहीं पहनना चाहिए बल्कि बीच पर भी पूरे कपड़े पहनकर नहाना चाहिए तो उनके मन में ये सैर-सपाटे वाले चित्र गलत विचार पैदा करेंगे! मैं एक सैर-सपाटे वाला चित्र साझा कर रहा हूँ और आप एक चित्र साझा करके कह रहे हैं कि महिलाओं को अपना बदन ढँककर रखना चाहिए?

आप मेरे परिवार के बारे में, मेरी पत्नी के बारे में क्या सोच रहे हैं?

मुझे लगता है कि यह बिल्कुल स्पष्ट है और मैं ऐसे व्यक्ति से, जो मेरी पत्नी के बारे में ऐसा सोचता है, वही घनिष्ठता नहीं रख सकता!

आप सभी पहले से जानते हैं कि मैं अपने विचार दबाकर नहीं रखता और इसलिए मैंने ठीक यही बात अपने मित्र से साफ-साफ शब्दों में कह दी। उसकी प्रतिक्रिया थी, ‘तुम बहुत ज़्यादा सोचते हो’!

जी नहीं, दरअसल आप पर्याप्त नहीं सोच रहे हो! आपका धर्म आपको सोचने की इजाज़त ही नहीं देता और इसलिए आप सिर्फ धर्मग्रंथों में लिखी गई या आपके पुरोहितों द्वारा बताई गई बातें ही सोच पाते हो! और ईश्वर ही तो यह सब कर रहा है तो फिर आप क्यों परेशान होंगे?

लेकिन जब आप कोई वक्तव्य देते हैं, किसी भी तरह का वक्तव्य, जो बहुत सामान्य किस्म का होता है और कहता है कि ‘कपड़े शरीर ढँकने के लिए होते हैं, उसे उघाड़ने के लिए नहीं’ तो आप सबके लिए कह रहे होते हैं, हर देश के लिए, हर जगह के संदर्भ में कह रहे होते हैं। आपका वक्तव्य मुझ पर भी लागू होता है, मेरी पत्नी पर लागू होता है और मेरी बेटी पर भी लागू होता है! अगर आप कहते हैं कि नहीं करता तो आप झूठ बोल रहे हैं। आप सच देखना सुनना नहीं चाहेंगे लेकिन यही आपके मन में होता है और भले ही आप ढँके-छिपे रूप से मेरे परिवार को और दोस्तों को मिली स्वतन्त्रता की प्रशंसा करेंगे लेकिन आपके मन में यही बात होती है कि- ‘यह गलत है, यह पापकर्म है!’

नहीं, इन घटनाओं या चर्चाओं के परिप्रेक्ष्य में मैं आपके प्रति एक वास्तविक अच्छे दोस्त जैसी घनिष्ठता महसूस नहीं कर सकता। मुझे इस एहसास से महरूम होने का दुख होगा- लेकिन जब मैं इसके कारणों पर सोचता हूँ तो मुझे कोई दुख नहीं होता!

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