जब औपचारिकताओं की मित्रता बनाए रखना ठीक होता है! 28 मई 2014

मित्र

पिछले कुछ दिनों में मैंने आपको बताया कि आपके ऐसे पुराने मित्र भी हो सकते हैं, जिन्हें आप चाहते तो हैं मगर जिनके साथ आप कतई सहमत नहीं हो पाते। आज मैं इस प्रश्न पर चर्चा करूंगा कि क्या आपको इन मित्रों के साथ सामान्य सामजिक औपचारिकताएँ निभाते रहना चाहिए या नहीं।

आपको याद होगा कि एक बार मैंने दोस्तों के बीच होने वाली औपचारिकताओं के बारे में लिखा था। दरअसल तब मैंने कहा था कि सिर्फ बहुत करीबी मित्रों के बीच ही कोई औपचारिकता मौजूद नहीं होती। मैं अब भी इस बात पर विश्वास करता हूँ-आप उन लोगों के साथ औपचारिक नहीं हो सकते और आपको होना भी नहीं चाहिए, जो वास्तव में आपके दिल के बहुत करीब होते हैं। लेकिन मुझे कुछ ऐसे अनुभव भी हुए हैं, जिन्होंने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि कुछ ऐसे भी मामले होते हैं, जिनमें औपचारिकता निभाने में कोई हर्ज नहीं है।

जैसा कि कल मैंने आपको बताया था, जब आपके जीवन में, नज़रिए में और दिमाग में परिवर्तन घटित होते हैं तो ऐसे कुछ लोग हो सकते हैं, जिनका सान्निध्य आपको पसंद नहीं आता। आपके मन में उनके प्रति बहुत प्यार है और उसके साथ आप बहुत नजदीकी भी महसूस करते हैं मगर आप उसका सान्निध्य पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि उनके साथ बातचीत के लिए आपके पास कोई विषय भी नहीं होता। ऐसे मामलों में आपको कुछ औपचारिकताओं की, कुछ रीति-रिवाजों की ज़रुरत पड़ती है, जो आपके संबंधों को जीवंत बनाए रखने में आपकी मदद करते हैं। आप उनसे सप्ताह में एक बार फोन पर बात कर लेते हैं, माह में एक बार मिल लेते हैं और उनके साथ बातचीत भी आप एक कर्तव्य की तरह करते हैं, आनंद के लिए नहीं।

आप महसूस करते हैं कि आपकी मुलाकातें और कुछ नहीं, महज औपचारिकताओं का निर्वाह है। मुलाकातों और लम्बी चर्चाओं का कोई आकर्षण नहीं होता! आपके फोन का कोई मतलब नहीं होता और कोई गंभीर बातचीत भी नहीं होती। वह उसके बारे में नहीं होतीं, जो आपके लिए महत्वपूर्ण होता है, जिसके साथ आप शिद्दत के साथ जुड़े होते हैं या जो बातें आपको उद्वेलित करती हैं। बातचीत में कोई मज़ा भी नहीं आता और ये पल आपके लिए बड़े बोझिल से होते हैं, या तो आप किसी तरह फोन से पीछा छुड़ाना चाहते हैं या, उनके घर में हुए तो, वहां से जल्द से जल्द निकलना चाहते हैं। यह एक निरर्थक रस्म अदायगी होती है, जिसकी परस्पर समझ से स्वतः विकसित नियत समय-सीमा होती है। पश्चिमी देशों में वहां के पारिवारिक और सामाजिक सम्बंधों के सन्दर्भ में मैंने यह बात अक्सर देखी है।

क्या किया जाए? आप उस व्यक्ति से सम्बन्ध बनाए रखना चाहते हैं लेकिन उसके साथ समय बिताना आपको नहीं सुहाता! शायद हमें अपने दिल को इस तरह तैयार कर लेना चाहिए कि ऐसे रस्मोरिवाजों और औपचारिकताओं को आप किसी तरह निभा ले जाएँ क्योंकि हम जानते हैं कि वे उस सम्बन्ध को एक विशेष स्तर तक बनाए रखने के लिए यह अत्यंत आवश्यक हैं!

आप किसी के दिल में ज़बरदस्ती प्यार पैदा नहीं कर सकते। अगर आप किसी से ज़बरदस्ती नजदीकी बढ़ाना चाहेंगे तो आपसी कटुता पैदा होगी और आप अपना प्यार भी खो देंगे, जिसे दरअसल आप संजोना चाहते थे! इसलिए उन औपचारिकताओं को निभाने में और यह स्वीकार कर लेने में ही भलाई है कि फ़िलहाल आपके बीच ज़्यादा नजदीकी नहीं है। और यदि आपमें से कोई कभी फोन करने या मिलने की औपचारिकताएँ निभा न पाए तो किसी को बुरा भी नहीं मानना चाहिए!

मैं उन सभी मित्रों से, जिन्हें मैं चाहता हूँ लेकिन जो मुझसे इतने भिन्न हैं कि फ़िलहाल मैं उनसे ज़्यादा करीब नहीं हूँ, कहना चाहता हूँ कि मैं अपने दिल में आपकी नजदीकी का आनंद लेता हूँ लेकिन आपके साथ बैठने में मुझे कोई आनंद प्राप्त नहीं होता। मैं अपनी कल्पना में आपसे प्रेम करता हूँ, जहाँ आप मुझे ज़्यादा प्यारे नज़र आते हैं। शायद जीवन हमारे बीच यह भ्रम बनाए रखना चाहता है। हो सकता है कि मेरा मन अभी किसी पुराने अतीत में जी रहा है, जहाँ हमारे विचार अभी भी एक जैसे हैं। मैं अपने अतीत का महत्व स्वीकार करता हूँ और उन पुरानी यादों को दिल में संजोए हुए हूँ, भले ही अब मैं हमारे बीच की वर्तमान परिस्थिति का आनंद नहीं ले पा रहा हूँ। मुझे लगता है कि आप भी ऐसा ही महसूस कर रहे होंगे। इसलिए मैं अब सिर्फ उन रीति-रिवाजों और औपचारिकताओं तक ही अपने आपको सीमित रखूंगा, जिन्हें हमने अपने लिए तय कर रखा मालुम होता है-और अगर किसी दिन आप या मैं पुनः बदल सके तो फिर हमारे सम्बन्ध भी तदनुसार बदल जाएंगे! अगर ऐसा नहीं भी हुआ तो भी जैसा चल रहा है, चलता रहेगा और हम इसी तरह खुश और संतुष्ट रहेंगे। हम एक-दूसरे के लिए अपने दिलों में मौजूद इसी प्रेम के साथ जीवन गुज़ारते चले जाएंगे।

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