जब परिवर्तन मित्रों के बीच नज़दीकियाँ कम कर देते हैं – 8 जून 2015

मित्र

निश्चय ही प्रेम और मित्रता के बारे में, दिलों की गहरी नजदीकी के बारे में और भौतिक अंतरंगता के बारे में मैं पहले कई बार विस्तार से लिख चुका हूँ। और निश्चित रूप से, जब भी मैंने ऐसे विषयों पर लिखा है, हर बार इस बात का ज़िक्र अवश्य किया है कि भौतिक नजदीकी के मुक़ाबले दिलों की नजदीकी हर हाल में अधिक महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से हाल ही में मैंने एक बार फिर नोटिस किया कि यह तथ्य वास्तव में कितना महत्वपूर्ण है!

मेरा एक दोस्त है, जिसके साथ मैं हमेशा से बहुत घनिष्ठ रहा हूँ। हम एक-दूसरे को लंबे समय से जानते हैं और अपनी मित्रता के दौरान हम जीवन के विभिन्न चरणों से गुजरे हैं, कभी काफी नजदीक रहते हुए तो कभी लगातार बहुत समय तक एक-दूसरे से दूर रहते हुए।

जब हम एक साथ नहीं भी रहते थे और न सिर्फ मिलते नहीं थे बल्कि फोन पर भी महीनों हमारी बातचीत भी बंद रहती थी, तब भी हम आपस में करीबी महसूस करते थे। कभी कभी सालों गुज़र जाते और हम बारह-बारह महीनों में भूले-भटके ही मिल पाते थे! इस दौरान पूरे समय मुझे महसूस होता था कि जब भी हम मिलते हैं, हम आपस में काफी मजबूती के साथ, बहुत घनिष्ठता के साथ जुड़े हुए हैं।

लेकिन अब परिस्थिति कुछ बदल गई है। मुझमें और मेरे जीवन में बहुत सारे परिवर्तन आ गए हैं और मज़ेदार बात यह कि हम लोग अब परस्पर काफी नजदीक भी रहने लगे हैं, एक-दूसरे से माह में कम से कम दो बार अवश्य मिल लेते हैं लेकिन दुर्भाग्य से अब मैं उससे उतनी नजदीकी महसूस नहीं करता।

बहुत से परिवर्तनों का मैंने ज़िक्र किया और निश्चित ही उनमें से एक है मेरे विचारों में आए परिवर्तन। जो विषय मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, उन पर हमारे विचारों में बहुत अंतर है। इतना अधिक कि हम एक-दूसरे के साथ कभी सहमत नहीं हो पाते और इसलिए उन विषयों को चर्चा में ही नहीं लाते या कभी उस पर चर्चा होने लगी तो उसे बीच में ही छोड़ देते हैं। कुछ समय तक यह निभ गया।

लेकिन समय बीतने के साथ यह महसूस होने लगता है कि कैसे जीवन के प्रति आपका बुनियादी नज़रिया और विचार बातचीत के हर दूसरे विषय को प्रभावित करने लगता है। और अंत में, वह मुलाक़ात और आपसी बातचीत भी महज रस्म अदायगी और औपचारिक वार्तालाप में तब्दील हो जाती है।

एक ऐसी रस्म, जिसे मैं अपनी पुरानी मित्रता की खातिर जारी रखने की औपचारिकता निभाता रहूँगा।

मैं अपनी भावनाएँ खुलकर व्यक्त करने में विश्वास रखता हूँ और इसलिए अपने मित्र से मैंने कहा कि अब हमारे बीच उतनी नजदीकी नहीं रह गई है। उसके जवाब ने मेरी भावनाओं की सत्यता की पुष्टि कर दी: उसने कहा, नहीं, सब कुछ ठीक है।

इसका आशय यह था कि उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे बीच अब उतनी नजदीकी नहीं रह गई है- या इससे भी कि मैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ। यह अपने आप में सिद्ध करता है कि वास्तव में अब हमारे बीच कोई घनिष्ठता नहीं रह गई है। और इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता-लेकिन यह एहसास भी समय के साथ समाप्त हो जाएगा!

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