क्या करें, जब आस्थाओं और रुचियों की विभिन्नता के चलते आपकी मित्रता में अपेक्षित अंतरंगता नहीं हो पाती? 17 दिसंबर 2013

मित्र

कल मैंने स्पष्ट किया था कि ऐसे मित्र भी हो सकते हैं, जिनके विचार और आस्थाएँ आपके विचारों और आस्थाओं से पूरी तरह भिन्न हों। ऐसी स्थिति में क्या करें जब आप देखें कि आपने किसी से मित्रता तो कर ली मगर वह महज़ औपचारिकता से आगे नहीं बढ़ रही है, जब कि आप उसके साथ गाढ़ी मित्रता चाहते थे?

सबसे पहले तो आप उसे विभिन्न विषयों पर अपने विचारों से अवगत करा दें। ऐसे विषयों पर, जहां आप परस्पर विरोधी विचार रखते हैं, पहले चर्चा करें, जिससे दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचान लें। जब आपको लगे कि आप दोनों अपने-अपने विचारों को बदल नहीं सकते तो आपसी असहमतियों पर सहमत हो जाएँ!

इन असहमतियों को मित्रता के बंधन को तोड़ने का बहाना न बनने दें। लेकिन साथ ही इस मित्रता से ज़्यादा अपेक्षाएँ न रखें। प्रेम बनाए रखें मगर वह सिर्फ कभी-कभार की मुलाकातों और औपचारिक बातचीत से आगे नहीं बढ़ पाता तो निराश न हों।

अपनी दादी माँ और अपने पिताजी का उदाहरण देते हुए कहना चाहूँगा कि वे दोनों बदले ज़रूर मगर उतना नहीं जितना मैं बदल गया। उम्र के इन पड़ावों पर वे इससे अधिक क्या बदलते! उन्होंने अपने पूरे जीवन धर्म के नाम कर दिये थे और भले ही वे उससे जुड़ी बहुत सी बातें पीछे छोड़ आए थे, पूरी तरह उसका त्याग करना उनके लिए असंभव था। और मैं उसकी अपेक्षा भी नहीं करता था।

मूल बात यह है कि आप एक दूसरे को समझें और एक दूसरे का आदर करें। उन्हें अपनी मर्ज़ी पर छोड़ दें और खुद भी अपनी मर्ज़ी के मालिक बने रहें। जिस तरह परिवार में होता है कि कुछ भी हो जाए परिवार का सदस्य, परिवार का सदस्य ही बना रहता है, उसी तरह मित्रता के मामले में भी यह संभव है कि आप किसी भिन्न विचार रखने वाले के साथ मित्रवत संबंध कायम रख सकें, हालांकि परिवार की तुलना में यह कुछ अधिक मुश्किल होता है। सच बात तो यह है कि अगर आपके बीच वास्तविक मित्रता और प्रेम है और दोनों में से एक भले ही न बदले मगर दूसरा बदलने की कोशिश करे तो दोनों की मित्रता मज़े में चलती रह सकती है।

लेकिन यह बात निश्चित है: आप दोनों के बीच भिन्नता है। दोनों एक दूसरे के साथ अपने मन की बात कह नहीं पाते, आप एक दूसरे के जीवनों में भागीदार नहीं हो पाते और दोनों बैठकर आपस में लंबी चर्चाएँ नहीं कर पाते।

लेकिन इस संबंध में कोई बेईमानी नहीं है। आप एक दूसरे का भला चाहते हैं लेकिन आपके विचार इतने अलग हैं कि आपको उसके साथ वैसा आनंद प्राप्त नहीं हो सकता, जैसा किसी समान विचार वाले के साथ अपनी भावनाएँ साझा करके हो सकता है।

इस तथ्य को स्वीकार करें। अगर आप यह मान लें कि दूसरा आपसे अलग है तो आपको यह भी स्वीकार करना होगा कि आप उसके साथ उतने अंतरंग नहीं हो सकते, जितना विचार-भिन्नता न होने पर हो सकते थे। दूसरे की आस्थाओं का सम्मान करें और अपने दिल में प्रेम बनाए रखें। ऐसी मित्रता बनाए रखने के लिए आप इतना ही कर सकते हैं।

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