हो सकता है कि आपकी मित्रताएँ, जैसी हैं, वैसी ही ठीक हों!- 25 सितंबर 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

मित्रों के बारे में लिखते हुए, जैसा कि मैंने पिछले दो दिनों में लिखा, कई तरह की भिन्न-भिन्न परिस्थितियाँ, प्रश्न और भावनाएँ मेरे मस्तिष्क में आती है, जिन्हें या तो मेरे मित्रों ने मुझसे साझा किया था या उन्होंने, जो मेरे पास सलाह मशविरा करने व्यक्तिगत सत्र में उपस्थित होते थे। ऐसे कई लोग थे, जो मुझसे कहते थे, ‘मेरे कई मित्र हैं लेकिन मेरा कोई ऐसा मित्र नहीं है, जिसके लिए मैं कह सकूँ कि वह मेरा बचपन का मित्र है!’ या यह कि, ‘मैं नहीं जानता, मेरे मित्र हैं, लेकिन हम साथ में खरीदी करने बाज़ार नहीं जाते न ही साथ में काफी पीने जाते हैं!’ ऐसे ही वाक्य। लोगों की यह भावना है कि उनकी दोस्ती शायद पक्की नहीं है। मेरी प्रतिक्रिया अक्सर एक प्रश्न के रूप में होती है: क्या यह आपकी अपनी भावना है या वह बाहर से आप पर लाद दी गई है?

सब यह बात समझ नहीं पाते क्योंकि लोग अक्सर इस बात पर बिना किसी गहरे सोच-विचार के जीते रहते हैं कि जो हम कर रहे हैं तो ऐसा क्यों कर रहे हैं और यह भी कि हम जो सोच रहे हैं तो ऐसा क्यों सोच रहे हैं। वास्तविकता यह है कि हमारे बहुत से कार्य, विचार और भावनाएँ सुनी-सुनाई या दूसरों के साथ तुलना करते वक्त महसूस की गई बातों या मीडिया में सुनी या देखी गई बातों द्वारा प्रभावित होते हैं। स्वाभाविक ही, आप सब यह जानते हैं कि अपने परिवेश के साथ अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए, आप जानते हैं कि दूसरों का कहा मानना नहीं चाहिए और यह भी आप जानते हैं कि मीडिया आम तौर पर चाहता है कि आप उसके द्वारा प्रचारित सामाग्री खरीदें। फिर भी, आपके भीतर जबर्दस्ती ठूँसी जा रही बातों और उसके प्रभाव से बचे रहना मुश्किल होता है।

इस तरह के बहुत से संदेश टीवी, सिनेमा, विज्ञापन, पत्र-पत्रिकाओं और किताबों में होते हैं, जिनमें यह कहा जाता है कि ‘इसे ऐसा होना चाहिए’। मित्रों की बात करें तो अधिकतर हीरोज़ के बहुत से मित्र होते हैं और वे दुनिया देखे हुए लोग होते हैं, वे, सिवा बुरे लोगों के लिए, जिनका काम ही उनसे नफरत करना होता है, लोकप्रिय होते हैं। अगर वे ऐसे नहीं होंगे तो उनके कुछ, चुने हुए बहुत करीबी मित्र होंगे, जिन पर उन्हें विश्वास होगा और जिनके साथ वे सारी बातें-उनके ऑफिस की बातों से लेकर अपनी यौन समस्याओं तक-साझा कर सकते होंगे। सब कुछ! औरतें हर रोज़ बाहर निकलती हैं, साथ में ख़रीदारी करती हैं, कॉफी पीती हैं, अक्सर डिनर या लंच साथ करती हैं, साथ स्पा लेती हैं, घूमती-फिरती हैं। तो आपकी मित्रता भी ऐसी ही लगनी चाहिए।

लेकिन बात इतनी ही नहीं है, अगर आप अपने आसपास देखें तो आपको यही देखने को मिलेगा। कई लोग मीडिया के संदेश देखने के और उस छवि के कि ‘कैसा होना चाहिए’, इतने आदी हो जाते हैं कि वे उसी तरह व्यवहार करने लगते हैं जैसे कि वे स्वयं वैसे ही हों और शायद यह भ्रम भी पाल लेते हैं कि उनका जीवन भी उन काल्पनिक कथा चरित्रों के जीवनों जैसा ही है। जब आप उनसे बात करते हैं तो आप लगभग उसी लहजे में वही बातें सुनते हैं, जो आप टीवी पर देखते हैं। मगर यह वास्तविकता नहीं होती।

इसका नतीजा यह होता है कि आप सोचते हैं कि आपकी दोस्ती वैसी नहीं है। आपकी मित्रता कुछ भिन्न दिखाई देती है। आप बार-बार मिलते नहीं हैं, आप फोन पर रोज़ बात नहीं करते। आपका कोई ऐसा मित्र नहीं है, जिससे आप अपने यौन संबंधों की चर्चा कर सकें-और शायद आप ऐसे मित्र चाहते भी नहीं क्योंकि आप ऐसे अंतरंग सम्बन्धों को, सिवा अपने साथी और भागीदार के, किसी और के साथ साझा नहीं कर सकते! वास्तव में शायद आप सोचते हैं कि कभी-कभी मुलाक़ात हो जाना काफी है! शायद आप संतुष्ट हैं कि आप लड़कियों या लड़कों की साप्ताहिक शामों में शरीक नहीं होते! शायद यह वह नहीं है जो आप चाहते हैं!

मैं एक बात आपसे कहना चाहता हूँ: आप आप हैं और अगर आप अपने मित्रों के साथ ठीक महसूस करते हैं तो यह ठीक ही है। जो आपके पास है उस पर अपना ध्यान केन्द्रित कीजिये और अपनी दिली इच्छा और आपके मस्तिष्क में बाहरी दबावों के चलते निर्मित कृत्रिम इच्छाओं के बीच अंतर को समझने की आदत डालिए। अगर आप एक या दो घनिष्ठ मित्रों के साथ अच्छा महसूस करते हैं तो आपको दरजन भर मित्रों की ज़रूरत नहीं है। अगर आप बचपन में ऐसा कोई मित्र नहीं बना पाए, जिसके साथ आपका मजबूत और स्थायी संपर्क नहीं बन पाया तो उसकी चिंता छोड़ दीजिए। आप उनके बारे में भी सोचना छोड़ दीजिए, जिनके साथ रहकर आपको अच्छा नहीं लगता।

जो आप हैं, वही बने रहिए। पता लगाएं कि आप वास्तव में क्या चाहते हैं और उसका भी, जिसे आप सिर्फ सोचते हैं कि चाहते हैं। और फिर, खुश रहिए।