जिन मित्रों से आप बिल्कुल सहमत नहीं हैं, उनके साथ प्रेम करना! 27 मई 2014

कल मैंने आपको बताया था कि मैं उस मित्र के साथ कैसा महसूस करता हूँ, जिसकी आस्थाएँ मुझसे पूरी तरह अलग होती हैं। हम एक-दूसरे की सोच, व्यवहार और यहाँ तक कि एक-दूसरे की बातचीत को भी पसंद नहीं करते! इन सबके बावजूद हम दोस्त होते हैं। यह कैसे संभव हो पाता है?

वास्तव में मैं इसी परिस्थिति से दो-चार हूँ, काफी समय से हूँ और मेरा विश्वास है कि मैं ऐसा अकेला व्यक्ति नहीं हूँ। जिन परिवर्तनों से होकर मैं इस स्थिति तक पहुंचा हूँ-यानी एक बहुत धार्मिक, आस्थावान व्यक्ति से परिवर्तित होकर अब एक नास्तिक हो गया हूँ-उनके चलते मेरे पास बहुत से मित्रों के साथ चर्चा करने योग्य ज़्यादा विषय ही नहीं होते। न सिर्फ धर्म पर हमारे विचार नहीं मिलते बल्कि लगभग सभी विषयों पर हमारे बीच मतभेद पाए जाते हैं। तो जब हम आपस में मिलते हैं तो हम थोड़ी देर तक मौसम के बारे में बात करते हैं फिर, अधिक हुआ तो, एक-दूसरे का हाल-चाल पूछते हैं और फिर हमारे बीच कोई विषय नहीं बचता, जिस पर हम लोग चर्चा कर सकें। ऐसे लोगों के साथ समय बिताना कितना मुश्किल हो सकता है, आप समझ सकते हैं!

लेकिन इसके विपरीत, जब मैं ऐसे किसी व्यक्ति से मिलता हूँ, जो मेरे बहुत नजदीक नहीं है और जिसके साथ मैं, उस तरह, सालों की मित्रता के धागे से जुड़ा हुआ भी नहीं हूँ लेकिन जिसका सोचने का नज़रिया मुझसे मिलता-जुलता है तो फिर उसके साथ मैं काफी समय तक विभिन्न विषयों पर बातचीत करता रह सकता हूँ। जब चर्चा समाप्त हो जाती है तो आपको महसूस होता है कि इस व्यक्ति के साथ अभी और काफी वक़्त गुज़ारा जा सकता था। क्या आप इस एहसास को जानते हैं?

अगर आप ऐसे लोगों के साथ समय बिताते हैं तो उनके साथ नजदीकी और प्रेम प्राकृतिक रूप से विकसित हो जाते हैं। निश्चय ही, आपको उनकी बातें, उनका सोचने का तरीका और जिस तरह वे लोगों के साथ पेश आते हैं, सब कुछ पसंद आते हैं और फिर आप उनके पूरे व्यवहार तथा व्यक्तित्व को ही पसंद करने लगते हैं। पूरी संभावना बन जाती है कि आपकी उनके साथ पट जाएगी क्योंकि अक्सर लोग समान विचार के लोगों को अपने आसपास इकट्ठा कर लेते हैं। और फिर मित्रता विकसित होती जाती है और आपसी प्रेम भी उत्पन्न हो जाता है।

लेकिन इसके साथ ही, प्रेम सिर्फ उन लोगों से ही नहीं होता, जिनके साथ आप समय बिताना पसंद करते हैं! जिनके साथ आपके विचार नहीं मिलते, उनके साथ भी प्रेम हो सकता है-और क्योंकि ज़्यादातर वे आपके पुराने मित्र होते हैं, आप उनसे इस दौरान पूरे समय प्रेम करते रहे होते हैं। आप इन लोगों से बात नहीं करना चाहते, आपके पास बात करने के लिए कुछ होता ही नहीं है, लेकिन फिर भी प्रेम मौजूद रहता है। जब प्रश्न प्रेम का हो, सारे दर्शन और सारी विचार-प्रक्रिया धरे के धरे रह जाते हैं।

मैंने यह अनुभव किया है कि मेरी विचार-प्रक्रिया समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार बदलती है। मेरी चेतना बदलती है और स्वाभाविक ही मेरे विचार भी तदनुसार बदल जाते हैं। जीवन में हर व्यक्ति अलग परिस्थितियों में अलग तरह से सोचता है। इस बात पर विचार करने पर मुझे विश्वास होता है कि संभवतः बाद में किसी दिन, किसी समय वह दूसरा व्यक्ति भी, जिससे आप प्रेम तो करते हैं लेकिन जिसके साथ चर्चा करने के लिए आपके पास कोई विषय नहीं होता, बदल सकता है और आपकी तरह विचार कर सकता है। जब वे ऐसा करेंगे, उनके साथ चर्चा के प्रति आपकी अरुचि भी पसंद में बदल जाएगी। लेकिन अगर ऐसा नहीं भी होता तब भी आप अपने आपसी प्रेम को त्यागने का विचार भी न करें!

जो कुछ मैंने ऊपर लिखा है वह मेरे जीवन का सच और मेरे दिल की बात है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे और आपके विचार मिलते हैं या नहीं। यह भी कोई मानी नहीं रखता कि हम एक-दूसरे को पसंद करते हैं या नहीं। लेकिन भले ही हम एक-दूसरे को पसंद न करें और एक-दूसरे के साथ समय बिताना पसंद न करें, हम सब मनुष्य हैं। और मानवता के लिए हम आपस में प्रेम के धरातल पर जुड़े रह सकते हैं।

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