जब आपकी आस्थाएं और विचार बदलते हैं तो दोस्त भी बदले-बदले से नज़र आते हैं- 16 दिसंबर 2013

मेरे जीवन में बहुत से परिवर्तन हुए और मैं समझता हूँ कि काफी हद तक ऐसे परिवर्तन सभी के साथ होते हैं। नतीजतन, अब आपके विचार वह नहीं हैं, जो पहले हुआ करते थे-और वे उन व्यक्तियों के विचारों से भी अलग हो गए हैं, जिनके साथ पहले आपके विचार बहुत हद तक मिलते थे। क्या होगा अगर वे आपके बहुत नजदीकी लोग हैं? जब जीवन के प्रति आपके विचार आसपास के लोगों के विचारों से भिन्न हैं?

मुझे लगता है कि एक ही परिवार में ऐसा अक्सर देखने में आता है। आप अपने खून के रिश्तेदारों से प्रेम करते हैं। आप उनके साथ बड़े हुए या सालों उनके साथ सबसे महत्वपूर्ण उत्सवों में शामिल हुए, साथ-साथ उनका आनंद लिया। वे आपके नजदीकी रिश्तेदार हैं-मगर आप उनके साथ उन बातों की चर्चा नहीं कर पाते, जो आपको वास्तव में उद्वेलित करती हैं क्योंकि उस विषय पर उनके विचार आपसे बहुत भिन्न हैं, आप दोनों के विचार परस्पर विरोधी हैं।

क्या हो अगर किसी मित्र के साथ ऐसी परिस्थिति पैदा हो जाए? अधिकतर ऐसा उन मित्रों के साथ ही होता है, जो बहुत समय से आपके मित्र हैं, जिनके साथ पहले आपके विचार एक जैसे थे, जैसे तब, जब आप दोनों अभी स्कूल में ही थे, किसी भी विषय पर आप दोनों के विचारों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू ही हुई थी या जब आपने अभी कुछ अलग सोचना शुरू ही किया था मगर वह विचार के रूप में स्थिर नहीं हुआ था। समय गुजरने के साथ आप दोनों के विचार एक दूसरे से अलग होते गए।

ऐसी परिस्थिति में आप उन लोगों से मिलना चाहते हैं क्योंकि आप उनसे प्रेम करते हैं और आप उनसे मिलने के लिए बेचैन भी हैं-लेकिन फिर उनसे मिलने पर बातचीत में वह मज़ा और आकर्षण नहीं होता, जो समान विचार रखने वाले के साथ बातचीत में होता है। आप उनसे मिलना तो चाहते हैं मगर कुछ वक़्त बाद ही आपके बीच चर्चा का कोई विषय नहीं रह जाता और चुप्पी छा जाती है। मौसम, क्या हाल-चाल है, इसके-उसके क्या हाल हैं या शायद राजनीति। बस इतना ही। आप उन बातों पर कोई चर्चा नहीं करते, जो वास्तव में आपको उद्वेलित करती हैं क्योंकि उन पर दोनों के विचार एक-दूसरे से बहुत अलग हैं।

इस तरह आप एक ऐसी व्यवस्था कर लेते हैं कि सप्ताह में एक बार मिलें या माह में एक बार और बस! इतना प्रयास आप करते हैं, जिससे आपके संबंध बने रहें-लेकिन चर्चा का वह मज़ा नहीं मिलता जो किसी ऐसे व्यक्ति के साथ चर्चा में मिल सकता है, जिसके साथ आप अपने मन की बात सहजता के साथ कह सकें, अपने मन को खोलकर रख सकें।

यह मित्र वैसा मित्र नहीं है, जिसके कंधे पर, आवश्यकता पड़ने पर, सिर रखकर आप रो सकें। इस मित्र के साथ आप अपनी बातों को साझा नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि दिल की गहराइयों में आप दोनों सोचते हैं कि दूसरा गलत है या उसके विचार ठीक नहीं हैं। आखिर इसीलिए तो आपने अपने विश्वासों या विचारों में परिवर्तन किया है कि वे विचार, आपके अनुसार, ठीक नहीं थे। और आपके मित्र में परिवर्तन इसीलिए नहीं आया कि उसके अनुसार वह परिवर्तन ठीक नहीं था। दोनों ही खुले रूप में यह नहीं कह पाते लेकिन दोनों के दिलों की गहराइयों में यह वास्तविकता उजागर है। उन परिस्थितियों में, जब आपको भावनात्मक सहायता की आवश्यकता होती है तो आप उस मित्र के पास नहीं जा सकते क्योंकि वह समझता है कि आप गलत हैं। यही कारण है कि वह मित्र आपके पास मदद के लिए नहीं आएगा भले ही उसे किसी की मदद की सख्त ज़रूरत हो। इसी तरह आप भी उसके पास नहीं जाएंगे भले ही आपको किसी के सहारे की ज़रूरत हो, भले ही किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता महसूस हो रही हो, जिसके सामने आप रो सकें या अपने दुख साझा कर सकें।

तो, ऐसे मित्र के साथ आपका व्यवहार कैसा होना चाहिए? इस विषय में अपने विचार मैं कल आपके सामने रखूँगा।

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