मैं जर्मनी क्यों आया? 10 सितंबर 2014

यह ब्लॉग मैं जर्मनी से लिख रहा हूँ। आश्चर्य? मैं समझ सकता हूँ! हम अभी चार हफ्ते पहले ही भारत लौटे थे और पुनः वीज़बादेन आ गए हैं, अपने घर, थॉमस और आइरिस के पास। क्यों, अभी बताता हूँ।

कहानी ठीक दस साल पहले शुरू हुई थी। एक दशक पहले मेरे जर्मन मित्र माइकल कोसक हमसे मिलने भारत आए थे। वह कोई साधारण यात्रा नहीं थी। जी नहीं। 14 सितम्बर 2004 के दिन उन्होंने आश्रम में अपना 50 वाँ जन्मदिन मनाया था। अपने इरादे के बारे में उन्होंने हमें पहले ही बता दिया था और हमने यहाँ जलसे की भरपूर तैयारियाँ कर रखी थीं! हमने यहाँ बहुत से लोगों को बुला लिया था और जब वे यहाँ आए तो यहाँ आयोजित स्टेज कार्यक्रम देखकर दंग रह गए थे। खाने की कई मेज़ें लगाईं गई थीं, जहाँ लोगों ने बहुत ही स्वादिष्ट भोजन का मज़ा लिया और इसके अलावा भारतीय शास्त्रीय नृत्य का आयोजन भी किया गया था। उन्होंने उस दिन भारतीय मेहमाननवाज़ी का भरपूर मज़ा लिया!

उसी समय हमने तय किया था कि उनके 60 वें जन्मदिन पर भी हम साथ रहेंगे! मैंने वादा किया था कि वह दिन हम साथ गुजारेंगे।

पहले 60वें जन्मदिन पर भी अपनी पत्नी, आंद्रिया के साथ उनके ही भारत आने का कार्यक्रम था। किन्हीं अपरिहार्य कारणों से उनके लिए सितम्बर में यहाँ आना संभव नहीं हो पा रहा था और अब वे इसी साल दिसंबर में यहाँ आएँगे। तब मैंने अपने कार्यक्रमों पर नज़र दौड़ाई और इसी साल गर्मियों में, जब हम लुनेबर्ग में थे, मैंने निश्चय कर लिया था कि कुछ भी हो जाए, मैं अपने मित्र के जन्मदिन पर दोबारा उनके यहाँ हाज़िर हो जाऊँगा! सोचा, तय किया और तुरंत मेरा, रमोना और अपरा का टिकिट भी बुक करवा लिया। बस, इस तरह अब हम यहाँ हैं!

हम ठीक दोपहर के समय वीज़बादेन पहुँचे थे और अभी कुछ देर के लिए आराम फरमा रहे हैं। कल अपरा के नाना हमसे मिलने यहाँ आने वाले हैं। शनिवार को हम ट्रेन से लुनेबर्ग जाएँगे, जहाँ रविवार के दिन हम माइकल के जन्मदिन के समारोह में शामिल होंगे। उन्होंने बहुत से मित्रों को समारोह में बुलाया है और उनसे कहा है कि वे कोई उपहार न लाएँ बल्कि उस रकम को चैरिटी के रूप में हमारे स्कूल के बच्चों को दान कर दें! यह बात इस आयोजन को और भी अधिक अनोखा और महत्वपूर्ण बना रही है और इसी कारण मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं है कि मैं इस जन्मदिवस-समारोह में शामिल हो पा रहा हूँ!

सोमवार को हम वापस वीज़बादेन आ चुके होंगे और बुधवार को भारत लौटने के लिए उड़ान भरेंगे। इस तरह यह सिर्फ एक हफ्ते का कार्यक्रम है। केवल सप्ताहांत के लिए मैं पहले भी उड़ान भर चुका हूँ: एक बार तब जब मुझे लन्दन में एक कार्यक्रम प्रस्तुत करना था और तब भी जब आस्ट्रेलिया में विभिन्न शहरों के बीच कुछ घंटों का विश्राम लेते हुए मुझे लगातार कई कार्यक्रम प्रस्तुत करने पड़े थे। लेकिन इस बार हमारे साथ अपरा थी और उसे जेट लेग से और जल्दी-जल्दी स्थान-परिवर्तन के कारण परेशानी न हो इसलिए हमने पूरे एक सप्ताह यहाँ रुकने का निर्णय किया था।

इसके अलावा इस बार हमने अपने साथ सामान भी ज़्यादा नहीं रखा है-हम लोग बिना चेक-इन बैगेज के ही चले आए हैं! इस कारण हम बहुत हल्का और सहज महसूस कर रहे हैं।… बस, अब मैं अपरा को थॉमस के साथ खेलता हुआ देखने निकलूँगा। वह इतनी जल्दी पुनः यहाँ आकर बहुत अधिक रोमांचित है- उसे किलकारियाँ मारते हुए देखना बड़ा आनंददायक अनुभव है! लेकिन इस विषय में कल आपको बताऊँगा।

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