ज़ोर-ज़बरदस्ती मत कीजिए, परिवर्तन तभी होता है जब वह भीतर से निसृत होता है! 29 मई 2014

पिछले कुछ दिनों से मैं एक ऐसी स्थिति के बारे में लिखता रहा हूँ, जब एक तरफ आपमें तो बदलाव आ गया है मगर आपके मित्रों में नहीं आया, या आया भी है तो किसी और दिशा में आया है। तो अब आप दोनों एक-दूसरे से इतना अलग सोचते हैं कि आपस में बातचीत के लिए कोई विषय ही नहीं होता। मैंने लिखा था कि आप अपना प्रेम और मित्रता बनाए रखें और यह भी कि आपके मित्रों में बदलाव की संभावना हमेशा बनी रहती है। हालाँकि यह आशा मेरा विश्वास भी है, मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ: आप किसी को बदल नहीं सकते इसलिए इस विचार पर बहुत आशा मत कीजिए और सबसे अधिक, अपने मित्र में यह बदलाव लाने का प्रयास भी मत कीजिए! जब भी बदलाव होगा, पहले उसके भीतर ही घटित होगा!

यह स्वाभाविक ही है कि हर व्यक्ति समझता है कि उसके विचार ही सही हैं। आपके सारे विचार और कार्य-व्यवहार इसी सोच का नतीजा होते हैं। अपने सोच, रवैये और व्यवहार में किसी तरह का बदलाव लाने के लिए आपके मन में शंका होनी चाहिए। यह शक कि आप जो सोच रहे हैं वह गलत भी हो सकता है। कि संभव है कि कुछ भिन्न बात भी हो, कोई दूसरा, वैकल्पिक रास्ता या विचार, जो आपके विचार से ज्यादा सही हो। लेकिन यह संदेह बाहरी प्रभावों से उत्पन्न नहीं किया जा सकता!

यदि खुद मुझमें हुए परिवर्तनों की बात की जाए तो मैं कह सकता हूँ कि वे मुझे समझाने के किसी दूसरे के प्रयास का परिणाम नहीं थे। शायद ही किसी ने ऐसा प्रयास किया होगा लेकिन जब भी कोई मेरी आस्थाओं के बारे में पूछता था तो मेरे पास कोई न कोई जवाब होता था कि क्यों मेरा विचार सही है। महज बातचीत से न तो कोई मुझे समझा सकता था न ही मुझे बदल सकता था।

हाँ, स्वाभाविक ही कुछ बाहरी घटनाएं ऐसी हो सकती हैं, जो आपमें इन परिवर्तनों का बीज बो देती हैं। मेरे मामले में मेरा गुफा में एकांतवास और मेरी बहन की अकस्मात् मृत्यु वे घटनाएं थीं, जिन्होंने मुझे भीतर तक प्रभावित किया और सोचने पर मजबूर कर दिया। आखिरकार यह कोई बाहरी घटना नहीं बल्कि आपकी आतंरिक यात्रा ही होती है, जो आपमें कोई परिवर्तन लेकर आती है। सिर्फ इसी आतंरिक यात्रा के कारण मैं अपनी आस्थाओं को खुली नज़रों से, और खुले दिमाग से देख सका। अपने इस आतंरिक परिवर्तन के पश्चात् ही मैं धर्म में मौजूद झूठ और भ्रमों को समझ सका।

लेकिन अपने आपमें परिवर्तन भी सोच-समझकर लिया गया निर्णय नहीं होता। दरअसल, यह अवचेतन की गहराइयों में आया परिवर्तन होता है, जो उस वैकल्पिक संसार पर पड़ा पर्दा हटा देता है, जो अब आपकी आँखों को दिखाई देने लगता है। इतना सब दूसरों के कहने-समझाने से संभव नहीं हो सकता।

अगर सिर्फ बाहर से आने वाले शब्द और बाहर से की जाने वाली समझाइश किसी व्यक्ति में परिवर्तन ला सके तो फिर लोग बार-बार बदलते रहेंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं है! लोग आपकी बातें सुनते हैं, आपके शब्दों को सुनते हैं और शायद यह भी समझते हैं कि जो आप कह रहे हैं, वह तर्कपूर्ण है। वे जानते हैं कि उनकी सोच में ही कुछ खामियाँ हैं या यह भी कि आप अपने विचारों के साथ अधिक आज़ाद, संतुष्ट और खुश नज़र आते हैं। वे जानते हैं कि आपके मुकाबले वे अपने विचारों के साथ उतने आश्वस्त नहीं हैं। लेकिन इस निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद भी वास्तविक आतंरिक परिवर्तन आना बहुत कठिन होता है।

इसीलिए अपने मित्रों को बदलने का प्रयास आपको नहीं करना चाहिए। अपेक्षा करना छोड़ें और इस विचार पर आशान्वित न हों कि वे बदल भी सकते हैं। अपने विचारों और व्यवहार सहित वे जैसे भी हैं, उसी तरह उन्हें स्वीकार करें लेकिन जब भी वे बात करना चाहें, हर विषय पर उनके साथ खुले मन से बातचीत करें। बार-बार उन्हें यह न कहें कि वे गलत हैं। इससे अर्थहीन वाद-विवाद होने लगेगा, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाएंगे और यहाँ तक कि आपसी कटुता और क्रोध भी उत्पन्न हो सकता है। एक उदाहरण की तरह अपने मित्र के सामने अपने सत्य के साथ खड़े रहें। किसी दिन, कोई मित्र सलाह लेने आपके पास आता है तो उसके लिए उपलब्ध रहें। अगर नहीं, तो जो, जैसी स्थिति है उसे उसी तरह स्वीकार करें।

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