संयुक्त परिवार का एक स्थानापन्न और वृद्धाश्रम का विकल्प- 23 सितंबर 2013

कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र ने अपने जीवन में हुए एक बड़े परिवर्तन के बारे में बताया: वह अब 55 वर्ष का है और उसने अपना घर छोड दिया है। उसने तय किया है कि अब जीवन भर वह अपने खास दो मित्रों के साथ एक घर में रहेगा। भारत जैसे देशों में मौजूद संयुक्त परिवार व्यवस्था का, जहां वृद्ध अपने बच्चों और नाती-पोतों के साथ रहते हैं, यह एक स्थानापन्न हो सकता है। यह तरीका वृद्धाश्रमों का, जो आजकल पश्चिमी देशों में बहुत आम हो गए हैं और अब भारत में पाँव पसार रहें हैं, विकल्प हो सकता है।

मेरा मित्र जीवन में असफ़ल व्यक्ति नहीं है। वह बहुत घुमक्कड़ रहा है और उसने बहुत यात्राएं की हैं, उसके पास मनपसंद नौकरी है, अमीर न भी हो तो भी इतना कमा लेता है कि आराम और शांति के साथ जीवन यापन कर सकता है और वह एक सुखी व्यक्ति है। उसके जीवन में सिर्फ एक ही बात की कमी थी, उसके जीवन में प्रेम नहीं था, एक ऐसी महिला नहीं थी जिसके साथ वह बूढ़ा होना चाहता हो। लेकिन आप उसके लिए ज़्यादा परेशान न हों, वह खुद इस बात को लेकर अवसाद नहीं पालता था और इस सच्चाई के बावजूद अपने एकाकी जीवन का आनंद उठाता था। उसे एक ही बात परेशान करती थी कि अकेलेपन के साथ बुढ़ापा कैसे कटेगा।

उसने अपने दो मित्रों से इस बारे में बात की और अपनी भावनाएँ उनके साथ साझा कीं। दोनों ही तलाक़शुदा हैं और उनके बच्चे वयस्क हो चुके हैं। तुरंत उसे लगा कि उन दोनों की परिस्थितियाँ भी उससे मिलती जुलती हैं। दोनों दोस्त उसकी तरह अपने-अपने फ्लॅटों में अकेलापन महसूस करते थे। इस तरह इस विचार का जन्म हुआ: क्यों न तीनों साथ रहें? वे एक दूसरे को जानते हैं, यह भी जानते हैं कि तीनों की आपस में अच्छी पटेगी, तीनों साथ में शामें और सप्ताहांत गुजार सकेंगे, रसोई, घर और सबसे बड़ी बात अपनी भावनाएँ एक दूसरे के साथ साझा कर सकेंगे। इस तरह, कुछ सप्ताह पहले वे घर लेकर एक साथ रहने लगे हैं और अकल्पनीय आनंद का अनुभव कर रहे हैं!

मैं सोचता हूँ कि यह एक बहुत बढ़िया तरीका है। पश्चिम में पारिवारिक संबंध उतने गहरे नहीं होते कि संयुक्त परिवार के विचार को स्थापित किया जा सके। इतना ही दुखद यह है कि अधिकांश लोग अपने अभिभावकों के साथ रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते। क्रिसमस की छुट्टियों में कुछ दिन बिताना भी उनके लिए मुश्किल होता है। व्यक्तिवाद की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि लोग-चाहे वे बूढ़े हों या जवान-अपने रिश्तेदारों को आसपास पाकर भी बिदकने लगते हैं।

दोनों ओर मौजूद यह भावना जिसने वृद्धाश्रमों जैसी व्यवस्थाओं को सफल बनाया, भले ही बुजुर्ग वहाँ जाना पसंद नहीं करते और युवा भी उन्हें वहाँ भेजते हुए, अपने आपको अपराधी महसूस करते हैं। लेकिन इतना तो होता ही है कि वहाँ उन्हें कोई बातचीत करने वाला मिल जाता है, भले ही वह कोई अजनबी ही क्यों न हो!

पश्चिम में लोग आजकल अपने परिवार से ज़्यादा अपने मित्रों के साथ भावनात्मक नजदीकी महसूस करते हैं। इस लिहाज से इस समस्या का मेरे मित्र द्वारा सुझाया गया यह हल बहुत उपयुक्त नज़र आता है! जब मैं पश्चिम में नया-नया ही था, मैंने अपने कुछ मित्रों से कहा कि वे मेरे लिए परिवार की तरह हैं। वे हँसकर जवाब देते थे कि "नहीं, मैं आपको एक दोस्त के रूप में चाहता हूँ, रिश्तेदार की तरह नहीं!" वहाँ रिश्तेदारों के मुक़ाबले मित्रों को इतनी ज़्यादा वरीयता दी जाती है! आखिर रिश्तेदारों का चुनाव आपके हाथ में नहीं होता, जबकि अपने मित्र आप अपनी मर्ज़ी से बना सकते हैं! आप जीवन भर अपने मित्रों के साथ, नियमित रूप से मुलाक़ात कर सकते हैं, उनके साथ अधिकांश वक़्त गुज़ार सकते हैं और अपनी निजी भावनाओं को साझा कर सकते हैं। आप इस मित्रता पर गर्व महसूस करते हैं, जो सालों, दशकों चलती रही हैं और जिंदगी भर चलती रह सकती हैं! स्वाभाविक ही, कुछ मित्र आते-जाते रहते हैं लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो लंबे समय तक या ज़िंदगी भर साथ निभाते हैं!

तो क्यों न उनके साथ रहा जाए?

Related posts

सोशल मीडिया मित्रों को वास्तविक जीवन में एक-दूसरे से मिलवाता है

यहाँ सब कुछ आभासी नहीं है: जब सोशल मीडिया मित्रों को वास्तविक जीवन में एक-दूसरे से मिलवाता है! 16 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे सोशल मीडिया के ज़रिए उन्हें अपने जीवन में कई तरह के लाभ प्राप्त ...
बात करने के लिए कभी-कभी आपको किसी दूरस्थ मित्र की ज़रूरत पड़ती है - 8 सितंबर 2015

बात करने के लिए कभी-कभी आपको किसी दूरस्थ मित्र की ज़रूरत पड़ती है – 8 सितंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने एक मित्र का ज़िक्र कर रहे हैं, जिसने बात करने के लिए उन्हें फोन किया क्योंकि अपने ...
आप बिकनी पहनना ठीक नहीं समझते? मेरी पत्नी उन्हें बीच पर पहनती हैं! क्या हम अब भी दोस्त बने रह सकते हैं? 9 जून 2015

आप बिकनी पहनना ठीक नहीं समझते? मेरी पत्नी उन्हें बीच पर पहनती हैं! क्या हम अब भी दोस्त बने रह सकते हैं? 9 जून 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि क्यों उन्हें उन लोगों के साथ घनिष्ठ होना कठिन लगता है, जो भारतीय संस्कृति ...
जब परिवर्तन मित्रों के बीच नज़दीकियाँ कम कर देते हैं - 8 जून 2015

जब परिवर्तन मित्रों के बीच नज़दीकियाँ कम कर देते हैं – 8 जून 2015

स्वामी बालेंदु अपने एक मित्र का ज़िक्र करते हुए बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने महसूस किया कि मित्रता कम ...
अच्छे और बुरे, दोनों वक़्तों में, दोस्त दोस्त होते हैं - 4 दिसंबर 2014

अच्छे और बुरे, दोनों वक़्तों में, दोस्त दोस्त होते हैं – 4 दिसंबर 2014

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे वे आजकल आश्रम आए हुए अपने दोस्तों के साथ बहुत व्यस्त हैं। ...
अलग-अलग आस्था रखने वाले मित्र - यह मित्रता कैसे निभ सकती है! 4 नवंबर 2014

अलग-अलग आस्था रखने वाले मित्र – यह मित्रता कैसे निभ सकती है! 4 नवंबर 2014

स्वामी बालेंदु विस्तार से बता रहे हैं कि वे कैसे धार्मिक मित्रों के साथ पटरी बिठा पाते हैं। सीधी सी ...
कैसे? केवल परिचित ही नहीं बल्कि मित्र बनायें! 16 सितम्बर 2014

कैसे? केवल परिचित ही नहीं बल्कि मित्र बनायें! 16 सितम्बर 2014

स्वामी बालेन्दु मित्रता के बारे में लिखते हुए अपने मित्रों के बारे में बता रहे हैं कि कैसे उन्हें मित्र ...
मैं जर्मनी क्यों आया? 10 सितंबर 2014

मैं जर्मनी क्यों आया? 10 सितंबर 2014

स्वामी बालेंदु इतने कम अंतराल के बाद ही परिवार सहित अपने जर्मनी प्रवास के कारणों पर प्रकाश डाल रहे हैं! ...
ज़ोर-ज़बरदस्ती मत कीजिए, परिवर्तन तभी होता है जब वह भीतर से निसृत होता है! 29 मई 2014

ज़ोर-ज़बरदस्ती मत कीजिए, परिवर्तन तभी होता है जब वह भीतर से निसृत होता है! 29 मई 2014

स्वामी बालेन्दु बता रहे हैं कि क्यों अपने मित्र को न तो बदलने का प्रयास करना चाहिए और न ही ...
जब औपचारिकताओं की मित्रता बनाए रखना ठीक होता है! 28 मई 2014

जब औपचारिकताओं की मित्रता बनाए रखना ठीक होता है! 28 मई 2014

स्वामी बालेन्दु ऐसी मित्रता का वर्णन कर रहे हैं, जिसमें प्रेम को एक सीमा तक बनाए रखने के लिए औपचारिकता ...

Leave a Reply