जब बात सेक्स की हो तो सवाल उठता है स्वतंत्रता और सहिष्णुता का – 1 मार्च 13

स्वतन्त्रता

पिछले दिनों मेरे द्वारा लिखे गए डायरी के पन्नों पर पाठकों की प्रतिक्रियाएं मिलीं। उनमें से कुछ मेरी बात से सहमत नहीं थे। यह कोई नई बात नहीं है और न ही यह ग़लत या असामान्य है। हम सबकी अपनी अलग राय हो सकती है। मैंने भी अपनी राय ज़ाहिर की है और आप इसके विरोध में बोलने के लिए स्वतंत्र हैं और मुझे इस बात की भी आजादी है कि मैं यह जानते हुए भी कि आप मेरी बात का विरोध कर रहे हैं, अपनी बात पर कायम रहूं। आज मैं इसी विषय पर लिखना चाहूंगाः लोगों को न केवल इस बात की आजादी हो कि वे जो कहना चाहें कहें बल्कि जो भी वे करना चाहे, उसकी पूरी छूट उन्हें मिलें बशर्ते कि उनके इस काम से दूसरे को कोई नुकसान न पहुंचे।

हां, मैं कहता हूं कि हम सभी को मनचाहा काम करने की आजादी है बशर्ते कि वह काम गैरकानूनी न हो और उससे किसी को नुकसान न पहुंचता हो। कुछ लोग इस बात में यकीन नहीं रखते। वे कहते हैं कि हम सभी को मनचाहा काम करने की आजादी है बशर्ते समाज इसे स्वीकार करता हो, बशर्ते यह मेरे धार्मिक विश्वास के अनुरूप हो या फिर अन्य कुछ ऐसी ही बंदिशें वे लगाते हैं। सच्चाई यह है कि देश का कानून सर्वोपरि होता है और हम अपने नैतिक मूल्यों को दूसरों पर थोप नहीं सकते।

यदि आप मानते हैं कि एक रात की हमबिस्तरी ग़लत है तो आप यह काम मत करिए। अग़र आपको लगता है कि ‘स्वच्छंद प्रेमसंबंध’, जिसमे हर कोई जिसके साथ चाहे यौनसंबंध रख सकता है, अनैतिक हैं तो आप इस प्रकार के संबंध मत रखिए। कुछ लोगों का मानना है कि समलैंगिकता नैतिक तौर पर ग़लत है या औरतों का घर से निकलकर बाहर काम पर जाना ग़लत है। यदि आप भी उनमें से एक हैं तो आप ऐसा सोचने और मानने के लिए स्वतंत्र हैं । कोई आपको समलैंगिक बनने या कामकाजी महिला से विवाह करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

लेकिन याद रहे कि आप लोगों पर अपनी नैतिकता या ग़लत – सही की अवधारणा को थोप नहीं सकते। जब वे आपकी ज़िंदगी में हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं तो आपको भी उनकी आजादी में दख़ल देने का कोई अधिकार नहीं रह जाता। यदि आप इस बात को स्वीकार कर लें तो हम सभी शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं।

मेरी राय में जब दो व्यक्ति मिलते हैं, एक दूसरे को पसंद करते हैं और आपसे में शारीरिक संबंध बनाना चाहते हैं तो इस पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए बशर्ते कि वे ऐसा करके अपने किसी और साथी को धोखा न दे रहे हों। यदि वे एक हफ्ते बाद या फिर अगले ही दिन यह मन बनाते हैं कि वे किसी और नए व्यक्ति के साथ सेक्स करना चाहते हैं तो यह उनका व्यक्तिगत मामला है। बेहतर होगा कि वे ऐसा करते हुए कंडोम का इस्तेमाल करें ताकि बीमारियों से सुरक्षित रहें।

अग़र आप इस बात से असहमत हैं तो कोई बात नहीं। अपने नैतिक मूल्यों को स्वयं तक सीमित रखें। कोई भी ऐसा काम न करें जिसके लिए आपकी अंतरात्मा ग़वाही न दें। लेकिन इस बात को समझें कि दूसरे लोग इसी काम को करते हुए किसी प्रकार के अपराधबोध से ग्रस्त नहीं होते और न ही उनके इस काम से आपको कोई नुकसान होता है। तो फिर आप क्यों इसका विरोध कर रहे हैं?

बेशक हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का हक़ है। इसी प्रकार आपको भी यह कहने और करने का हक़ है कि आप एक साल में दो से ज्यादा या जितने आप निश्चित करें, व्यक्तियों के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाएंगें। लेकिन आपको इस बात का ध्यान रखना होगा कि आपके क्रियाकलापों और शब्दों से उन लोगों को आघात न पहुंचे जो आपसे अलग विचार रखते हैं। आप अपने विचार व्यक्त करें यह जानते हुए कि दूसरों को आपकी बात से असहमत होने का पूरा अधिकार है। अभद्र भाषा का प्रयोग न करें। शिष्टाचार का पालन करें।

इसी को सहिष्णुता कहते हैं। यदि आप लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहते हैं, अपनी स्वतंत्रता में यकीन रखते हैं और अपने नैतिक मूल्यों को केवल अपने तक सीमित रखते हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं तो आपको सहिष्णु बनना ही होगा और उन लोगों को स्वीकार करना होगा जो आपसे भिन्न मत रखते हैं।

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