कल मैंने लिखा कि बहुत सारे लोग हैं जो अपने गुरुओं से निराश हो चुके हैं और उनसे संबंधित चीजों में उनकी रूचि खत्म हो चुकी है परन्तु वे किताबें, समारोह, रस्में और चमत्कारों को बेचना जारी रखते है क्योंकि साधारणतः यह उनका अपना व्यवसाय है और इससे उन्हें धन का लाभ होता है। हालांकि दूसरे वैसे भी हैं जिनका कोई व्यवसाय नहीं है परन्तु वे जाली चमत्कारों में अपने विश्वास को नहीं छोड़ पाते हैं यद्यपि वे अपने गुरु का त्याग कर चुके हैं। उनके इस व्यवहार का कारण क्या है?
मैं इस तरह के बहुत लोगों से मिल चुका हूं और आपको भी उनके बारे में बता चुका हूं। वे अब अपने गुरु के संसर्ग में कुछ भी नहीं करना चाहते परन्तु अभी भी वे कहते है कि उनके (गुरु) पास कुछ अलौकिक शक्ति है। उनका मानना है कि वह (गुरु) धोखेबाज है और गलत है लेकिन वे दूसरे को यह दिखाते भी हैं कि वे उसके द्वारा प्रचारित चमत्कार में विश्वास करते हैं। क्यों?
इस तरह के व्यवहार का एक बहुत बड़ा कारण गुरु के शरण में व्यतीत किया गया अच्छा खासा समय है। ढेर सारे लोग है जिन्होंने दस साल, पन्द्रह साल यहां तक की बीस साल का समय गुरु के साथ व्यतीत किया है तब उन्हें उसके विषय के कुछ पता चला या अनुभव हुआ और उन्होंने महसूस किया कि अब वे उसके साथ और नहीं चल सकते। और अब वे यहां है, अन्य अनुयायियों के संरक्षित एवं सुरक्षित समुदाय के बिना और खुद को बिखरा हुआ महसूस करते हैं। वे गहरे गड्ढे में गिरा हुआ महसूस करते है और अब कुछ भी समझ में नहीं आता।
कईयों के लिये यह बहुत भयावह स्थिति है और मैं ढेर सारे लोगों के संपर्क में हूं जो इस दौर से गुजर चुके हैं। किसी बिंदु पर पहुंचने के बाद इनमें से प्रत्येक ने अपनी दुनिया में वापस लौटना शुरु कर दिया। और उनमें से कोई भी यह नहीं महसूस करना चाहता कि उसने यह सारा समय व्यर्थ बर्बाद किया! लोग मेरे पास सलाह के लिये आते हैं और बिलखते है पूछते हैं "अब मुझे क्या महसूस करना चाहिये?" क्या मैंने अपने जीवन के इतने सारे साल बर्बाद कर दिये? मैं किसी चीज में विश्वास करता था और अब मुझे पता चला कि वह सत्य नहीं है! वे यह महसूस नहीं करना चाहते कि उन्होंने अपना समय व्यर्थ किया है और यही कारण है कि उनमें से बहुत यह मानते हैं कि उसमें से कुछ निश्चित ही सही और सत्य होना चाहिये। वे पूरी कहानी के एक हिस्से को स्वीकार करते हैं और ऐसा न महसूस हो कि उन्होंने सब कुछ गंवा दिया इसलिये सिद्धि या चमत्कार में विश्वास दर्शाते हैं।
कृपया इस तरीके से न सोचे। अब अपने आप को बेवकूफ बनाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ बेहतर महसूस करें, यह मायने नहीं रखता कि कितना समय आपने लगाया, वह व्यर्थ नहीं गया। आपने अपने समय को बर्बाद नहीं किया बल्कि आपने अनुभव प्राप्त किया, आप और मजबूत हुये और अब आप सच्चाई जानते हैं अगर आपने यह अनुभव नहीं प्राप्त किया होता, आज आपको सच का ज्ञान कैसे होता? सच को स्वीकार करें और इसके बारे में ईमानदार बनें। उन वर्षों ने आपका विकास किया।
हिंदी की एक कहावत है "जब जागें तभी सवेरा" यह मैं अपने पास आने वाले वैसे प्रत्येक व्यक्ति से कहता हूं जो ऐसी स्थिति में हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि छह बजे हैं, आठ बजे हैं, दस बजे हैं। आप उठो और एक नया दिन जीने के लिये वहां है। कभी देर नहीं हुई है और समय कभी बर्बाद नहीं हुआ। अपने अनुभव को स्वीकार करें और उसके साथ बढ़ें।
Related posts
भक्तों की दुविधा: गुरु के अपराधों को जानते हैं मगर मानते नहीं- 11 सितंबर 2013
गुरु की वासना-शांति के लिए लड़कियां मुहैया कराना, आँख मूंदकर उसके अपराध के भागीदार बनना-10 सितंबर 2013
आसाराम द्वारा प्रताड़ित लड़की के पिता को रिश्वत का प्रयास, मारने की धमकी के बावजूद सराहनीय है मजबूती-9 सितंबर 13
आस्था समाप्त होने पर धर्म का व्यवसाय मत करो – ईमानदार बनो – 12 अक्तूबर 2011
अनुयायी बनने की अपेक्षा विद्यार्थी बनें तो ज्यादा अच्छा है – 16 जून 2011
