अनुयायी बनने की अपेक्षा विद्यार्थी बनें तो ज्यादा अच्छा है – 16 जून 2011

अनुयायी

कल मैंने दस प्रकार के अनुयायियों में से अंतिम एक के बारे में बताया था जिनके विषय में मैंने गत सप्ताह लिखा था। ये दस प्रकार निम्नवत हैं:

  1. अंध अनुयायी
  2. बुद्धिजीवी अनुयायी
  3. अहंकारी / गर्वित अनुयायी
  4. गुप्त या लज्जित अनुयायी
  5. घूसखोर या पेड तनखैया अनुयायी
  6. पक्का अनुयायी
  7. लचीला अनुयायी
  8. सामूहिक अनुयायी
  9. व्यक्तिगत अनुयायी
  10. प्रसिद्ध/ ख्यात अनुयायी

मैंने अपने जीवन में अनकों अनुयायी देखे हैं, भारत में अपने गुरु जीवन के दौरान और अब पश्चिम की अपनी यात्रा के दौरान। इस कारण मैं उन्हें इन श्रेणियों में विभाजित कर सकता हूं। हर कोई एक श्रेणी में नहीं फ़िट हो सकता, उनमें से अधिकांशतः एक साथ अनकों श्रेणी में आते हैं|

इन दिनों आम तौर पर क्या होता है कि जब मैं इस प्रकार के अनुयायी टाइप लोगों से मिलता हूं तो वे लंबे समय तक मेरे साथ नहीं रह पाते। कारण है कि सामान्यतः वे एक गुरु की तलाश में रहते है और मैं न तो गुरु हूं और न ही किसी का मालिक। बहुत सारे लोग इसका अहसास होने के बाद मुझसे अलग हो जाते हैं और दूसरे मुझसे जुड़े रहने का प्रयास करते हैं, बिना मुझे इसका अहसास कराये हुये मेरे अनुयायी होने का कोई रास्ता तलाश करते हैं, और वास्तव में घनिष्ठता विकसित कर लेते हैं। मैं हमेशा उन्हें यह अहसास कराने का प्रयास करता हूं कि वे अपने गुरु स्वयं हैं।

वस्तुतः मैं “अनुयायी” या शिष्य शब्द पसंद नहीं करता। मेरा मानना है कि किसी से कुछ सीखना अच्छी बात है, छात्र बने रहे और सीखना जारी रखें। गुरु का सामान्य अर्थ है शिक्षक, इसलिये अगर आपको एक शिक्षक की आवश्यकता है, गुरु की आवश्यकता है तो क्यों नहीं खुद को मात्र छात्र पुकारते हैं? भेड़ की तरह अंधे होकर अनुसरण करने की बजाय आपको एक छात्र होना चाहिये, अत्यधिक जानने को उत्सुक, अधिक ज्ञान और अनुभव प्राप्त करने के लिये उत्साहित।

बहुत सारे गुरु अच्छे शिक्षक हैं और आप उनसे सीख सकते हैं। उन्हें सिद्ध न बनायें और उन्हें भगवान के रुप में न देखें। वे मानव है, गलती करते हैं, उनके अपने दोष भी है। उनकी पूजा न करें। एक ऐसे व्यक्ति के रुप में उनको आदर प्रदान करें जिसके पास कुछ ज्ञान है या बुद्धिमत्ता है जो वे आपके साथ बांटते हैं।

एक यथार्थवादी दृष्टिकोण रखें, केवल सतही तौर पर नहीं बल्कि गहरे पैठे और देखें वह व्यक्ति क्या है। किसी एक व्यक्ति पर निर्भर न हों और यदि उनका कथन परस्पर विरोधी हो तो दिग्भ्रमित न हों। और अंत में आप यह पायेंगे कि आप अपने मालिक खुद हैं। किसी भी दर्शन और शिक्षण का अपना सच है और आप इसे महसूस कर सकते हैं, चाहे यह आपके लिए सही हो या नहीं।

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