श्री श्री रविशंकर की अपील – सोचो मत, मेरे पीछे चले आओ! – 20 फरवरी 13

मेरी डायरी के पिछले दो पन्नों पर पाठकों की जो सकारात्मक प्रतिक्रिया आई है उससे मुझे आश्चर्यमिश्रित खुशी हो रही है। सोमवार को मैंने आर्ट ऑफ लिविंग की वेबसाइट पर छपे एक हास्यास्पद लेख के बारे में बताया था जिसमें श्री श्री रविशंकर दावा करते हैं उनके भक्त बिना किसी चार्जर का इस्तेमाल किए उनकी तस्वीर के सामने अपना मोबाइल फोन रखकर उसे चार्ज कर सकते हैं। जब उस ऑनलाइन लेख पर सवाल उठाए गए तो श्री श्री ने तय किया कि यह कहानी प्रचारित करने योग्य नहीं है और उन्होंने झटपट उस पेज को अपनी वेबसाइट से हटा लिया। उसके बाद से बहुत लोग मुझे लिख रहे हैं और उन्होंने इन गुरु और उनकी फाउंडेशन के बारे में अपने अनुभव बताए हैं। मैंने सोचा कि मुझे भी श्री श्री रविशंकर, उनके कार्य और जनता को आकर्षित करने के लिए अपनाए गए उनके हथकंडों के बारे में अपनी इस डायरी में लिखना चाहिए।

ऊपर आप एक समाचारपत्र में डाला गया फोटो विज्ञापन देख रहे हैं। यह विज्ञापन अहमदाबाद में अखबारों के जरिए लोगों तक पहुंचाया गया है। इसमें सबसे नीचे कार्यक्रमों, कोर्सेज़, रीट्रीट, कार्यक्रम स्थल (जो फाउंडेशन की अपनी जगह है) और संपर्क सूत्र का ज़िक्र किया गया है। इस विज्ञापन में जो मुख्य बात पाठक का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करती है, वह है : सोचो मत. . . . अभी आर्ट ऑफ लिविंग के सदस्य बन जाओ। यह इतने बड़े बड़े शब्दों में लिखा गया है कि पर्चे की अन्य विषय सामग्री इसके सामने गौण सी हो गई है और यह पढ़कर मुझे बड़ी क़ोफ्त हुई।

वाह क्या तरीका है ! आप क्या सोचते हैं कि लोगों को बरगलाने के लिए किसी पोंगापंथ के कार्यक्रम को विज्ञापित करने का यह सबसे प्रच्छन्न व आसान तरीका है? मोबाइल फोन चार्ज करने की कहानी के बाद तो मुझे यकीन हो गया है कि आर्ट ऑफ लिविंग तथा श्री श्री रविशंकर और कुछ नहीं बस लोगों के दिमाग़ को कुंद करने का काम कर रहे हैं ताकि आप सोचने समझने में अक्षम हो जाएं। यह एक ऐसी जगह है जहां आप वही करेंगे जो आपसे करने के लिए कहा जाएगा और आप इस झूठ को सच मानने लगेगें कि ऐसा करके आप दिव्यज्ञान और समाधि की परम अवस्था तक पहुंच सकते हैं, यहां तक कि जीवन के अंत में मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। उन सभी को शुभकामनाएं जो इस इस विज्ञापन की तरफ आकृष्ट हो रहे हैं!

हो सकता है कि वे अपने उद्देश्य में सफल हो जाए क्योंकि वे खुलेआम अपनी बात कह रहे हैं। अन्य पोंगापंथों की भांति वे इस सच्चाई को छुपाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं कि वे यह नहीं चाहते हैं कि लोग अपनी विचारशक्ति का इस्तेमाल करें बल्कि यह चाहते है कि वे गुरुजी की बात में विश्वास करें। जैसाकि मैंने भी कल भी कहा था कि आम तौर पर श्री श्री रविशंकर सार्वजनिक रूप से स्वयं को सर्वज्ञ या सर्वव्यापी गुरु के रूप में प्रस्तुत नहीं करते क्योंकि ऐसा करने से उनकी छवि को नुकसान ही पहुंचेगा। वह इस बात से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं कि आज मीडिया ऐसे गुरुओं की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रखता जो अविश्वसनीय चमत्कारी शक्तियों से संपन्न होने का दावा करते हैं ।

निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि वैसे तो श्री श्री रविशंकर अन्य पाखंडी गुरुओं जैसा न दिखने की कोशिश करते हैं लेकिन ओढ़ी हुई नकली निर्मलता का आवरण यदा – कदा उघड़ ही जाता है और भीतर की सच्चाई निर्वस्त्र हो जाती है। मोबाइल चार्ज करने की चमत्कारी शक्ति पर लेख, लोगों को सोचना समझना बंद कर आर्ट ऑफ लिविंग में शामिल होने के लिए प्रेरित करता विज्ञापन और ग़रीब और ज़रूरतमंदों के लिए आबंटित सरकारी ज़मीन पर आर्ट ऑफ लिविंग के ध्यान केंद्रों की इमारतें खड़ी करने के आरोप लगाती रिपोर्ट्स इसके गवाह हैं।

ऐसी घटनाएं भी हुई हैं जिनकी वज़ह से धर्मभीरू भारतीय जनता के मध्य भी उनकी आदर्श गुरु की छवि को धक्का पहुंचा है और उनकी लोकप्रियता में कमी आई है।उदाहरण के लिए उन्होंने पिछले साल मार्च महीने सार्वजनिक तौर पर कहा कि सरकारी स्कूल आतंकवादियों को पैदा कर रहे हैं, क्यों नहीं इनका प्रबंधन निजी संगठनों को सौंप दिया जाता। देश भर में उनकी इस बात का भारी विरोध हुआ । यहां तक की संसद सदस्यों और मंत्रियों, जो स्वयं इस सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं, ने उनका विरोध किया। श्री श्री ने इस सारे प्रकरण से अपना पल्ला झाड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन अपने बयान की विडियो रिकॉर्डिंग को वह कैसे झुठलाते।

हो सकता है कि श्री श्री रविशंकर अपने दोष छिपाने की भरसक कोशिश करें। हो सकता है कि लोगों को यह सद्बुद्धि आ जाए कि आंतरिक शांति के लिए, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए और योग, ध्यान व प्राणायाम सीखने के लिए उनके जैसे गुरु की आवश्यकता नहीं है। यह सब कुछ सर्वसुलभ है। श्री श्री रविशंकर या और किसी अन्य गुरु के नाम का ठप्पा लग जाने से ये सारी क्रियाएं अधिक गुणकारी या महत्वपूर्ण नहीं बन जातीं।

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