ईश्वर की तरह ‘सर्वज्ञ’ श्री श्री रविशंकर को चायपत्ती क्यों चुरानी पड़ी – 21 फरवरी 13

सोमवार को अपनी डायरी में मैंने आपको श्री श्री रविशंकर की मोबाइल फोन चार्ज करने की तथाकथित शक्तियों के बारे में बताया था। यह कहानी मैंने उनकी वेबसाइट पर पढ़ी थी। मेरी डायरी का वह पन्ना इंटरनेट पर प्रकाशित होने के बाद उन्होंने वह कहानी अपनी वेबसाइट पर से हटा दी। आपको याद होगा कि हमने उस पेज का स्क्रीन शॉट ले लिया था। उस स्क्रीन शॉट को दोबारा ध्यान से देखने पर मेरी नज़र एक और कहानी पर गई जो श्री श्री अपने भक्तों को सुनाते हैं। इसमें भी गुरु – शिष्य के संबंध पर अंधविश्वासपूर्ण धार्मिक विचारों और गुरु के चतुराई भरे वचनों कि एक भक्त गुरु से ज्यादा शक्तिसंपन्न होता है, का मसाला भरा हुआ है।

संक्षेप में प्रस्तुत है नई कहानीः कोई दस साल पहले श्री श्री रविशंकर और उनके कुछ शिष्य दक्षिणी अफ्रीका के डरबन शहर में किसी सज्जन के अतिथि के रूप में ठहरे हुए थे। जब वे वहां से प्रस्थान करने वाले थे तो अचानक श्री श्री कुछ बेचैनी सी महसूस करने लगे और अपने भक्तों के कमरे में गए। वहां उन्होंने एक चायपत्ती का पैकेट पड़ा हुआ देखा। जब पूछने पर भी यह पता नहीं चल पाया कि वह पैकेट किसका था तो उन्होंने उसे उठाकर अपने सूटकेस में रखा लिया।

उनके भक्तों को यह देखकर कुछ अजीब सा लगा कि गुरुजी सरेआम ‘चोरी’ कर रहे हैं लेकिन जब वे जोहानेसबर्ग के हवाईअड्डे पर उतरे वहां उन्हें एक आदमी मिला जिसने उनसे पूछाः

“गुरुदेव मैंने चायपत्ती का एक पैकेट आपके लिए भेजा था, क्या वह आपको मिल गया है? यह एक विशेष किस्म की चाय है। मैं स्वयं जाकर इसे विशेषतः आपके लिए खरीदकर लाया हूं। मैं डर्बन नहीं आ सका तो मैंने किसी और व्यक्ति हाथ इसे आपके लिए भिजवा दिया था|“

कहानी की अगली पंक्तियां कुछ इतनी खूबसूरती से लिखी गईं हैं कि मैं बिना किसी काट – छांट के उन्हें जस का तस आपको पढ़वाना चाहता हूं|:

“अच्छा, तो तुमने किसी के हाथ इसे भिजवाया था और इन लोगों ने उसे दूसरे कमरे में रख दिया क्योंकि ये जानते हैं कि मैं चाय नहीं पीता और इसी कारण इन्होंने इस विषय में मुझे बताया भी नहीं। यह माज़रा था|
तब मैंने कहा ‘हाँ मुझे चाय का पैकेट मिल गया|’

“इसका अर्थ है कि जब आप भक्तों की भावनाएं इतनी तीव्र होती हैं तो मैं तो आपके हाथों की कठपुतली बन जाता हूं। इसीलिए वह पैकेट मैंने उठा लिया था|“

तो ये कहानी है कि मुझे चायपत्ती का पैकेट क्यों चुराना पड़ा। दरअसल यह चोरी नहीं है। यह तो मेरे लिए ही आया था लेकिन उस समय ऐसा प्रतीत हुआ कि मैं एक ऐसी वस्तु चुरा रहा हूं जो मेरी नहीं है|“

यह कहानी दिलचस्प लग सकती है यदि आप एक कमरे में बैठकर भक्तों के समूह को यह सुना रहे हों और सभी श्रोता आनंदरस में डूबे हुए हों क्योंकि उन्हें केवल अपने प्रिय गुरु की वाणी सुनाई दे रही है। लेकिन यदि आप अपने घर में बैठकर इस कहानी को पढ़ें तो आपको यकायक इस बात पर यकीन नहीं होगा कि लोग गुरु की इस कहानी पर कैसे विश्वास कर सकते हैं और गुरु कैसे सार्वजनिक रूप से इसे अपनी वेबसाइट पर पोस्ट करने की सोच सकते हैं! लोगों को ऐसी कहानियां सुनाने के पीछे उनका मक़सद केवल एक ही है कि लोग उन्हें भगवान मानने लगें। यह कहानी दिमाग़ में कई सवाल खड़े करती है।

सबसे पहला और महत्वपूर्ण प्रश्न तो यह हैः यदि आप सर्वज्ञ हैं, जिसे आपने कहानी के प्रांरभ में अस्वीकार नहीं किया है, तो ऐसा कैसे संभव है कि आपको इस बात का जरा भी भान नहीं हुआ कि चायपत्ती का वह पैकेट आपके लिए ही वहां भेजा गया था?

अग़र आपको यह पता नहीं था कि वह आपके लिए था, तो आपने उसे उठाया ही क्यों? किसी दूसरे की वस्तु उठाना चोरी कहलाता है। और अग़र आपको बाद में यह पता चल भी गया कि यह आपके लिए ही था, तो भी चोरी तो आप कर ही चुके हैं। यह एक ग़लत बात है। श्री श्री, आप इस बात से यूं ही पल्ला नहीं झाड़ सकते!

अग़र कोई व्यक्ति आपके लिए कोई विशेष किस्म की चायपत्ती खरीदता भी है और जानता है वह आपसे भेंट करने के लिए जोहानेसबर्ग आयेगा, तो वह इस पैकेट को डर्बन क्यों भेजेगा?

हो सकता है कि उसे यह पता न हो कि वह जोहानेसबर्ग आयेगा और इस कारण से उसने पैकेट वास्तव में डर्बन भेज दिया, तो वाहक ने पैकेट व्यक्तिगत रूप से आपको क्यों नहीं सौंपा? बात साफ है कि भेजने वाला व्यक्ति इतना खास था कि वह आपको जोहानेसबर्ग हवाई अड्डे पर मिला। इतने खास व्यक्ति का संदेशवाहक आप तक क्यों नहीं पहुंच पाया? सवाल यह है कि चायपत्ती सीधे आप तक क्यों नहीं पहुंची?

कहानी का सबसे मज़ेदार हिस्सा तो यह हैः

“इसका अर्थ है कि जब आप भक्तों की भावनाएं इतनी तीव्र होती हैं तो मैं तो आपके हाथों की कठपुतली बन जाता हूं। इसीलिए वह पैकेट मैंने उठा लिया था|“

इसी पेज पर एक और तीसरी कहानी के माध्यम से वह इस बात को और पुख्ता करते हैं। वह बाहर प्रतीक्षा में बैठे भक्तों को दर्शन नहीं दे पाए और वे सब बहुत निराश हुए और नाराज़ भी। इस कारण से वह शारीरिक तौर पर खुद को कमजोर और बीमार महसूस कर रहे थे। यदि इस बात में इतनी ही सच्चाई है तो वह सदा भक्तों द्वारा सम्मोहित से क्यों नज़र नहीं आते और क्यों नहीं वह सब करते जो उनके भक्त उनसे चाहते हैं। मैं यह जानता हूं कि उनके अनुयायी उनकी भक्ति में आकंठ डूबे हुए हैं। पिछले तीन दिनों से मेरे वेबपेज और फेसबुक पेज पर उनकी तीखी प्रतिक्रियाएं, जिन्हें मैंने वहां से मिटा दिया है, इस बात की गवाह हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि मैं इस बेहूदा कहानी में कतई विश्वास नहीं करता। यह बात तो कतई मेरे गले नहीं उतरती कि वह सर्वज्ञ हैं। मैं तो यह मानना ज्यादा पसंद करूंगा कि या तो यह एक मनगढ़ंत कहानी है या फिर वह कभी कभी चाय पीना पसंद करते हैं, लेकिन इस बात को खुले तौर पर स्वीकार करने से परहेज़ करते हैं। क़यास तो कुछ भी लगाया जा सकता है लेकिन एक बात तो पक्की हैः यदि वह सर्वज्ञ हैं तो इस बात को छुपाना बखूबी जानते हैं।

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