खुद से अपनी नैसर्गिक सीमाओं से ज़्यादा की अपेक्षा न रखें- 15 अक्तूबर 2013

अपेक्षा

जो लोग अपने आपको आध्यात्मिक मानते हैं, उनके बीच इस बारे में विभिन्न धारणाएँ प्रचलित हैं कि आपको कैसा जीवन जीना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि वे सभी सकारात्मक बाते हैं, जो बताती हैं कि अपने आसपास के लोगों से प्रेम करना चाहिए, खुद का आकलन करना चाहिए कि आप क्या चाहते हैं, जीवन से अपनी अपेक्षाओं को कम से कम रखना चाहिए, जिससे बाद में आपको निराशा न हो और यह भी कि अपने अहं को अपने काबू में रखना चाहिए। पश्चिम में यह एक सामान्य प्रवृत्ति है कि इन विचारों को पूर्वी दार्शनिक चिंतन से आयात करके उन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश की जाती है लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा करते हुए उन्हें दोनों सभ्यताओं के सांस्कृतिक अंतर को भी ध्यान में रखना चाहिए। कुछ बातें पूर्वी संस्कृतियों में, जैसे भारतीय संस्कृति में, तो अच्छी तरह से फिट हो सकती हैं मगर पश्चिमी संस्कृतियों के लिए वे इतनी विजातीय और पराई होती हैं कि उसे अपनी संस्कृति पर लागू करना आपके लिए असुविधाजनक हो सकता है।

उदाहरण के लिए ‘अपेक्षा’ को लें। सभी जानते हैं कि आध्यात्मिक रुचियों वाले लोगों का यह लक्ष्य ही होता है कि वे अपनी अपेक्षाओं को कम करें और संभव हो तो पूरी तरह समाप्त ही कर दें। मैंने हमेशा कहा है कि वास्तव में अपनी अपेक्षाओं को पूरी तरह समाप्त करने का कोई कारण नहीं है। कुछ अपेक्षाएँ तो होनी ही चाहिए और अगर आप अपने परिवार और मित्रों के साथ सामान्य जीवन जीना चाहते हैं तो कुछ अपेक्षाएँ तो रहेंगी ही। तो, हमें चाहिए कि हम अपनी अपेक्षाओं को काफी कम करते हुए उन्हें न्यूनतम रखने के बारे में विचार करें।

मुझे लगता है कि यह एक उचित विचार है, जो आपको सुकून पहुंचा सकता है क्योंकि तब आप अत्यधिक निराशा से बच सकेंगे। लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि कोई अपेक्षा न हो, इसके लिए आपको बहुत प्रयास नहीं करना चाहिए और न ही इसके लिए अपने आपको मजबूर करना चाहिए। इसके अलावा यह आत्मग्लानि भी ठीक नहीं है कि अपने आपसे आपकी अपेक्षाएँ बहुत ज़्यादा हैं और उन्हें आप कम भी नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल, अपेक्षाओं की सीमा आपकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है।

अगर आप भारतीय परिवेश में पले-बढ़े किसी व्यक्ति पर नज़र डालें तो पाएंगे कि पश्चिमी देशों में पले-बढ़े व्यक्ति के मुकाबले उसकी अपेक्षाएं बहुत कम होती हैं। यहाँ लोग किसी से समय के पाबंद होने की ज़्यादा अपेक्षा नहीं रखते। पहले से निश्चित समय पर काम पूरा हो जाएगा, इसकी आशा भी यहाँ नहीं की जाती। लोग यह भी आशा नहीं रखते कि कोई काम इच्छित गुणवत्ता के अनुरूप और अच्छे तरीके से पूरा हो ही जाएगा। एक सामान्य भारतीय पहले से ही तालमेल, समझौतों और कमियों का आदी होता है। उसके लिए पहले ही कम निराशाएँ हैं क्योंकि उसकी आशाएँ और अपेक्षाएँ पहले से ही नगण्य हैं।

अगर आप अपने दैनिक जीवन में अनुचित अपेक्षाओं से दूर हो चुके हैं तो आपने एक बड़ा कदम उठा लिया है। अगर आप इस बात से परेशान हैं कि आप अब भी अपने चाहने वालों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे होटल में नियत समय पर खाना खाने आ जाएंगे तो मेरा खयाल है कि ऐसी अपेक्षा करना वाजिब ही है! यह आपका परिवेश है, जिसमें रहकर आप बड़े हुए हैं और वह आपके भीतर इतना धंसा हुआ है कि आप उसे निकालकर बाहर नहीं कर पा रहे हैं।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि आपको यह सोचना बंद कर देना चाहिए कि "जब भी मैं कोई आशा करता हूँ तो वह पूरी नहीं होती!" अपने दिमाग को उन साधारण अपेक्षाओं को लेकर परेशान न करें, जिनका कारण यह है कि किसी दूसरे देश के लोग समय बर्बाद करने के आदी हैं और आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरते। आपकी संस्कृति अलग है, आपकी पहचान दूसरी है।

आप जो भी हैं, स्वीकार करें और उन चीजों को बदलने की कोशिश न करें, जिन्हें बदलने की वास्तव में ज़रूरत ही नहीं है। कुछ चीज़ें जैसी हैं, वैसी ही ठीक हैं, भले ही दूसरे ऐसा न समझें।

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