अभी-अभी आपके अहं पर चोट हुई है और अब आपको प्रतिक्रया देना है- आप क्या करेंगे? 1 अक्तूबर 2013

अहम

कल का ब्लॉग मैंने अहं के सकारात्मक पहलुओं पर केन्द्रित किया था। आज मैं चाहता हूँ कि विशाल अहं का होना कैसे नुकसानदेह है, इस बारे में थोड़ा विस्तार से लिखूँ। खासकर किसी बाहरी चोट की त्वरित प्रतिक्रिया के संदर्भ में।

जीवन में हमारा अक्सर ऐसी स्थितियों से साबका पड़ता हैं, जिनमें हमें त्वरित प्रतिक्रिया देनी पड़ती है-चाहे वह किसी मित्र के साथ फोन पर दोस्ताना बातचीत हो रही हो या परिवार के किसी सदस्य ने किसी काम के बारे में या किसी नई जानकारी के संबंध में कुछ कहा हो। और मैं समझता हूँ कि सभी को यह अनुभव हुआ होगा, जब आपके अहं ने आपको मुसीबत में डाल दिया होगा। आपने ऐसा व्यवहार किया होगा कि स्थिति सुलझने के स्थान पर और जटिल हो गई होगी।

अहं से भरी हुई अपनी प्रतिक्रिया देने के बाद, जब आपको सोचने की कुछ फुरसत मिली होगी तो हड़बड़ी में दी गई अपनी प्रतिक्रिया पर आपको पछतावा हुआ होगा, लेकिन तब तक पहले ही काफी देर हो चुकी हुई होगी। आपकी इच्छा हुई होगी कि दीवार पर सर फोड़ लें। आप सोच रहे होंगे कि इसी अहं ने आपको इस हालत में पहुंचाया है। खुद अपने द्वारा निर्मित इस समस्या पर आप बहुत खीझ रहे होंगे!

हुआ यह है कि आपके सामने कोई ऐसी बात हुई होगी जिसने आपके अहं को तुरंत विचलित कर दिया होगा। क्योंकि स्थिति की मांग थी कि आप त्वरित प्रतिक्रिया दें, आपका अहं आगे आया और उसने ऐसा जवाब दिया जो स्वाभाविक ही अहं से सराबोर था।

मैं एक उदाहरण देना चाहता हूँ। आप अपने सहकर्मियों के साथ किसी नई योजना के संबंध में वार्तालाप कर रह हैं। सभी इस बात पर सहमत हैं कि आपने अच्छा काम किया है मगर किसी कारण से परिणाम ठीक उल्टा आया है: योजना पूरी तरह से असफल रही है और सभी अप्रसन्न हैं। आप उस विषय पर सामान्य रूप से बात कर रहे हैं और तभी उनमें से कोई कहता है, "मेरे विचार में डिजाइन में ही गड़बड़ी थी।" बाप रे! डिजाइन तो आपने तैयार किया था! आपकी तर्कशक्ति जवाब दे जाती है, आप होश खो बैठते हैं और आपका अहं आप पर सवार हो जाता है। सिर गरम हो जाता है और शायद चेहरा लाल, लगता है कानों में कर्कश आवाज़ें आ रही हैं और आखिर आप खुद को कर्कश आवाज में कहते हुए सुनते हैं, "दरअसल उसके निर्देश और ब्योरे गड़बड़ा गए थे, जैसे किसी स्कूल के बच्चे ने लिखे हों; समझ में ही नहीं आता था!" यह उस पर चोट थी, जिसने डिजाइन पर निर्देश और ब्योरे लिखे थे और अब अपने कथन से आपके अहं को कुरेदा था। यह समझदार प्रतिक्रिया नहीं थी, वह प्रभावशाली तो थी ही नहीं बल्कि उसने सबका ध्यान आपकी तरफ और आपके अहं की तरफ मोड़ दिया।

इस मामले में, अहं की मात्रा के अनुपात में, तुरंत ही या कुछ देर बाद, आप अपनी बात पर अफसोस करेंगे। लेकिन सामान्यतः आप ऐसा ही करते हैं, यह सोचकर कि उस वक़्त आपके तर्क की विजय हुई है। यह परेशान करने वाली बात है और आपको ऐसा करके अच्छा भी नहीं लगता। क्या किया जाए?

अगर आप देखें कि यह समस्या बार बार पेश आती है-या कभी-कभी आती है और कैसे भी उसे टालना चाहते हैं तो मैं आपको यह सलाह दूंगा कि कोई भी बात कहने से पहले उसके बारे में सोचें अवश्य। चाहे किसी भी बात पर चर्चा हो रही हो, त्वरित प्रतिक्रिया न देने का अभ्यास करें। पल भर रुकें, फिर जवाब दें। संकट के समय में यह एक पल इतना वक़्त दे देगा, जिसमें आप अपनी तर्कशक्ति को पुनर्जाग्रत कर सकेंगे और ऐसी प्रतिक्रिया करने से अपने अहं को रोक सकेंगे, जिस पर आपको बाद में पछतावा हो। अक्सर, यह भी, अंततः, ठीक ही साबित होता है कि उस वक़्त आप कुछ भी न कहें-सिर्फ मुस्कुरा दें या चुप रहें। अगर यह संभव न हो तो चाहें तो एक गिलास पानी पी लें, जिससे मस्तिष्क कुछ शीतल हो जाए और आप अहं को दूर रखते हुए कोई जवाब सोच सकें।

अगर किसी कारण से यह कारगर साबित नहीं होता और क्षणिक आवेश में आपका अहं आप पर सवार हो ही जाता है तो उससे हुई परेशानी, (हानि) को दूर करने का त्वरित उपाय कीजिए। ऊपर वर्णित उदाहरण में आपके मुंह से बात के निकलते ही मुस्कुरा दीजिए, सहकर्मियों से माफी मांग लीजिए कि आपका मतलब वह नहीं था जो आपने कहा, आप तो सिर्फ समस्या की गंभीरता पर ज़ोर देना चाहते थे और सीधे खुद पर की गई चोट को आप बर्दाश्त नहीं कर पाए और गुस्से में ऐसी बात मुंह से निकल गई। लीपापोती न करें, समस्या को स्पष्ट कहें-दूसरे सब समझ जाएंगे!

अगली बार अपने अहं को नियंत्रण में रखने की कोशिश करें- सिर्फ "अहं युक्त त्वरित टिप्पणी" को टालने के लिए।

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