अहं के साथ संघर्ष – स्वयं के साथ एक लगातार कशमकश? 2 अक्तूबर 2013

अहम

मैंने कल इस बात का वर्णन किया था कि कैसे अधिकतर लोग अहं के कारण जीवन में एक न एक बार परेशानी में पड़ जाते हैं। जब कि कल मैंने अपने ब्लॉग को बिना सोचे-समझे की गई त्वरित टिप्पणियों पर केन्द्रित किया था वहीं आज मैं काफी सोच-समझकर, सही-गलत का विचार करने के बाद की जाने वाली उन बातों की चर्चा करूंगा, जिनके बारे में आप स्वयं भी अच्छी तरह जानते होते हैं कि आप, दरअसल, अपने अहं के दबाव और प्रेरणा के चलते ऐसा कर रहे हैं।

मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि ऐसी स्थितियों के बारे में भी आप जानते हैं-या तो आपने स्वयं ऐसा व्यवहार किया है या किसी परिचित ने आपके साथ किया है। एक निर्णय लिया जाना है, कुछ न कुछ किया जाना ज़रूरी है और ऐसा करने के कम से कम दो विकल्प हैं: या तो आप अड़ जाएँ कि जैसा आप चाहते हैं वैसा ही हो या-वैसा जो आपके अहं की तुष्टि करे-या आप अपने अहं को काबू में रखने में कामयाब हो जाएँ और वही करें, जो उच्चतर लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे ज़्यादा लाभप्रद साबित हो।

इसका यह अर्थ नहीं हैं कि आप अपने अहं से पराजित होकर खुश हैं। नहीं, आप कोई दूसरा निर्णय करने का भरसक प्रयास करते हैं, आप वाकई नहीं चाहते कि आपका अहं आप पर विजय प्राप्त करे लेकिन अंततः आप हार ही जाते हैं। दरअसल, आपके भीतर एक अंदरूनी नाकेबंदी है, एक रुकावट, जिसे पार पाना आपके लिए नामुमकिन हो जाता है! यह स्थिति, कल बताई गई स्थिति से ज़्यादा समस्यामूलक है, जो आपको अहं-युक्त त्वरित प्रतिक्रिया देने पर मजबूर करती है। क्योंकि वर्तमान स्थिति में स्पष्ट ही अहं आप पर सवार हो गया है और समय गुजरने के साथ धीरे-धीरे उतरता नहीं है। अगर वह एक पल में आपको चित कर दे और फिर दूसरे ही पल आपके काबू में आ जाए तो उतनी परेशानी नहीं है। अगर आप कई दिनों तक उसके साथ संघर्ष कर रहे हैं और लगातार हारते ही चले जा रहे हैं तो ऐसी तात्कालिक समस्याओं को सुलझाना भी और भविष्य में ऐसी हालत पैदा न हो इस दिशा में कदम उठाना भी मुश्किल हो जाता है!

आप अपने निर्णय पर पछताते हैं लेकिन हर बार जब भी ऐसी स्थिति निर्मित होती है, आपका अहं आपको तुरंत अंधा कर देता है और आप अपनी पिछली गलती से सीखा हुआ सबक भूल जाते हैं। आप वही बात बार-बार दोहराते हैं और एक के बाद दूसरे मामले को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते चले जाते हैं। आपको समझ में नहीं आता कि इस कड़ी को कैसे तोड़ा जाए।

मैं यह ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि दुर्भाग्य से इस समस्या का समाधान आसान नहीं है। कोई जादू की पुड़िया नहीं है, जो इस बीमारी को ठीक कर सके और न कोई शल्यचिकित्सा है कि काट-पीटकर आपके अहं को बाहर निकाल दिया जाए। आपको खुद प्रयास करना होगा। फिर भी मैं कहूँगा कि संघर्ष करने की जगह आपको पहले सकारात्मक रवैया अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। अपने व्यवहार पर और गहराई के साथ सोचें और अपने उसमें होने वाले छोटे-मोटे सुधार के महत्व को समझें। जब आप शिद्दत से चाहेंगे कि अपने अहं पर काबू पाना ही है तभी आप इसे अंजाम दे सकते हैं! दृढ़ इच्छाशक्ति से कुछ भी संभव है!

इतनी ही सलाह मैं दे सकता हूँ कि जब ऐसी कोई परिस्थिति सामने आए तो आँखें और मस्तिष्क खुले रखें और सोच-समझकर बरताव करें या कोई निर्णय लें। कुछ सवाल अपने आप से पूछे: अपने अहं के विपरीत जाते हुए अगर अपने तरीके से इस काम को नहीं करेंगे तो दूसरों को इससे क्या लाभ हो सकता है? इसके विपरीत, अगर अपने अहं की तुष्टि करते हुए आप वही काम करते हैं तो इससे किसी का क्या भला हो सकता है? समान्यतः इसका उत्तर होगा, कुछ भी नहीं, ऊपर से आप व्यर्थ ही अहंकारी माने जाएंगे। अपने अहं के विपरीत जाने पर आपका कोई नुकसान नहीं होगा-विपरीत इसके, लोग, अक्सर, इस बात को सराहेंगे! तो फिर ऐसा क्यों न किया जाए?

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