माता-पिता के प्रेम में अपने जीवन से खिलवाड़ – 23 अप्रैल 2015

निर्णय

कल मैंने अपने ब्लॉग में बच्चों के लालन-पालन संबंधी प्रश्नों पर अपने विचार रखे थे, जिसमें बहुत छोटे बच्चों और किशोरों के संदर्भ में ही चर्चा की थी। आज मैं उन बच्चों के विषय में चर्चा करना चाहता हूँ, जो जल्द ही वयस्क होने वाले हैं या हो गए हैं। यह मैंने कई बार खुद देखा है और मेरे सलाह-सत्रों में कई लोगों ने इस समस्या पर मुझसे चर्चा भी की है: जब अभिभावक, खासकर यदि अभिभावक एक ही हो अपने बेटे या बेटी पर इतना अधिक आश्रित हो जाते हैं कि वे उन्हें हाथ से निकलने ही नहीं देना चाहते-और इस तरह बच्चों को अपनी राह खुद चुनने की स्वतंत्रता में बाधक बनते हैं!

यह कुछ अमूर्त और जटिल सा लग रहा है लेकिन मैं एक उदाहरण की विस्तृत चर्चा से यह बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ कि मेरे कहने का अर्थ क्या है।

एक दिन बीस साल की एक महिला मेरे पास सलाह लेने आई। उसने बताया कि वह मेरी राय इसलिए चाहती है कि उसके आसपास के लोगों के मुक़ाबले मैं उसकी समस्या को पूरी तरह अलग नजरिए से देख सकूँगा। उसका मानसिक द्वंद्व इस प्रकार था:

वह अपनी माँ के साथ रहती थी। जब वह नौ बरस की थी, उसके माता-पिता ने तलाक ले लिया था और उसके बाद कुछ अप्रिय घटनाओं और आपसी विवादों के चलते उसने और उसकी माँ ने उसके पिता से कोई संपर्क नहीं रखा था। उसकी माँ ने अकेले ही उसका लालन-पालन किया था और पूरे दिलोदिमाग से सारा जीवन इसी काम में न्योछावर कर दिया था। अब वे आपस में बहुत नजदीक आ गए थे और सिर्फ और सिर्फ माँ पर ही बेटी का भरोसा था और उसे ही वह दुनिया में सबसे अधिक प्यार करती थी।

दो साल पहले इस युवा लड़की ने अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की और आगे की पढ़ाई हेतु देश भर के कई विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए आवेदन किया। कुछ विश्वविद्यालयों ने उसके आवेदन को स्वीकार करते हुए पत्र लिखे, जिनमें से एक उनके शहर के पास ही था और दूसरा, जिसमें वह दाखिला लेना चाहती थी, अधिक दूर था।

उसकी लालसा बाद वाले विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की थी, घर में माँ की छत्रछाया से दूर, बाहर निकलकर दुनिया को अपनी नज़रों से देखने की। अब वह जीवन के आगत रोमांच की कल्पना करने लगी और थोड़े अपराधबोध के साथ उसे लगता कि आज तक वह उससे पूरी तरह महरूम रही है-क्योंकि जिस तरह माँ उसकी देखभाल करती थी, उसी तरह वह भी तो उसकी देखभाल करती रही है! लेकिन फिर उसने तुरंत स्पष्ट किया कि वह अपनी माँ से बहुत प्यार करती है और उनसे बढ़कर उसके लिए कुछ भी नहीं है। यह भी कि, इसी तरह माँ भी उससे उतना ही प्यार करती है। कुल मिलाकर यह कि वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती थी, जिससे यह लगे कि वह एहसान फरामोश है, कृतघ्न है। माँ ने उसके लिए सब कुछ किया है, प्यार दिया है, श्रम किया है, तकलीफ़ उठाई हैं। अंततः वह घर पर ही रही। उसने उसी विश्वविद्यालय को चुना, जो घर के करीब था।

जब हमारी मुलाक़ात हुई थी, वह इसी परिस्थिति में जी रही थी। और अब माँ के कई व्यवहार उसे नागवार गुजरने लगे थे। जब भी माँ से वह कोई प्रतिवाद करती, तुरंत अपराधबोध से परेशान हो उठती और इस गुस्से को भी मन से निकाल न पाती कि माँ ने उसे वास्तविक जीवन जीने के अधिकार से वंचित कर रखा है। इस उलझन के साथ वह मेरे पास आई थी।

मैंने उससे कहा कि उसका गुस्सा साफ बताता है कि वह अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहती है। मैंने उसे ठीक वही करने के लिए प्रोत्साहित किया और वह भी बिना किसी अपराधबोध के। मैंने कहा, अगर वह ऐसा नहीं करेगी तो क्या हो सकता है, सामने आ चुका है, साफ दिखाई दे रहा है-जीवन भर की कटुता और विद्वेष! ऐसी भावनाएँ, जो आसानी से उसके और माँ के बीच के प्रेम को नष्ट कर देंगी।

उसकी बहुत सी महत्वाकांक्षाएँ थीं, बहुत से लक्ष्य, बहुत से सपने थे, इसलिए विशेष रूप से इस उम्र में उन्हें साकार करने की उसे कोशिश करनी चाहिए थी और जीवन के रोमांच में कूद पड़ना चाहिए था! इसका यह मतलब कतई नहीं था कि वह अपनी माँ को 'त्याग' देती, उनके साथ 'एहसान फरामोशी' करती! वह अब भी उनका ख्याल रख सकती थी-बस, कुछ अधिक दूरी से! और कुछ समय गुज़रने के बाद, जीवन में कुछ और स्थिरता और आज़ादी प्राप्त करने के बाद, आज के मुकाबले जीवन थोड़ा और संवर जाने के बाद हो सकता है कि वे भविष्य में पुनः एक साथ रहने का कोई रास्ता निकाल सकें! ऐसी परिस्थिति भी निर्मित हो सकती है कि वह माँ के और करीब रहकर उसकी सेवा कर सके। और यही सब मैंने उससे कहा।

मेरी नज़र में यही तरीका था जो बेटी को अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से जीने की स्वतन्त्रता प्रदान करते हुए उनके आपसी प्रेम की रक्षा कर सकता था-और मुझे विश्वास है, उसकी माँ ने भी इस बात को समझा होगा!

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