अपने प्रिय से हमेशा के लिए बिछुड़ने के गम में धार्मिक दर्शन किसी काम नहीं आते- 11 दिसंबर 2013

मृत्यु

यह ठीक बात है कि अम्माजी के देहांत के बाद मैं अपने दुख से निपटने के विषय में सोच रहा था, देहांत के तुरंत बाद और अब भी, एक साल बाद पीछे मुड़कर देखते हुए। वह यह कि: जब आपका कोई प्रिय व्यक्ति आपको सदा-सदा के लिए छोड़कर चला जाता है तब आप अपनी भावनाओं के साथ क्या करें?

किसी के लिए भी अपने प्रियकर की आकस्मिक मृत्यु, जैसे अम्माजी की तरह हार्ट अटैक से या मेरी बहन की तरह किसी दुर्घटना स्वरूप, एक भयानक सदमा होती है। बहुत समय से बीमार, महीनों या सालों से तकलीफ झेलते या बहुत वृद्ध लोगों के साथ, जहाँ मृत्यु कभी भी हो सकती है, आप बहुत हद तक मृत्यु का स्वीकार करने के लिए तैयार होते हैं।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मृत्यु अचानक आई है या वह अपेक्षित थी, दुख तो होना ही है और कई बार यह दुख इतना ज़बरदस्त होता है कि आपको हर तरफ से जकड़ लेता है। तो फिर क्या किया जाए?

विभिन्न धर्मों में देखें तो आप दुखी परिवार वालों को सांत्वना प्रदान करने के अलग-अलग तरीके दिखाई देते हैं। एक धर्म आपसे कहता है कि मरने वाला एक पुण्यात्मा व्यक्ति था और अगले जन्म में भी वह उच्च योनि प्राप्त करेगा इसलिए उसके लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। मृतक इस वक़्त स्वर्ग में होगा और ईश्वर ने उसे अपने आलिंगन में ले लिया होगा। वह अपने उन परिवार वालों से मिल रहा होगा जो पहले से वहाँ मौजूद हैं। उसे उनसे मिलकर कितनी खुशी हो रही होगी! आदि आदि…

एक दूसरा विचार यह है कि यह शरीर आत्मा (जीव) का एक निवास-स्थान मात्र है, एक तरह का वाहक, जो अब पुराना पड़ गया था और उसे त्याग देना ही उपयुक्त था। आत्मा मरी नहीं है, वह अब भी यहीं आसपास मौजूद है, आपके साथ, आपको दिलासा देने हेतु और जीवन में आपकी मदद के लिए। कुछ धर्म दावा करते हैं कि आत्मा एक दिन कोई दूसरा शरीर प्राप्त कर लेगी और इस तरह पुनः जन्म लेगी, इस धरती पर वापस आएगी और इसलिए पुराने शरीर की मौत पर दुखी होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

वास्तविकता यह है कि ऐसी हालत में आप कितना भी दर्शन-शास्त्र का हवाला देते रहें या कोई भी फिलोसोफी बघारें, समझदारी की बातें करें, दुखी व्यक्ति को सिर्फ यही पता होता है कि उसका प्रिय व्यक्ति अब उसके पास नहीं है, उसने उसे खो दिया है। ऐसा आध्यात्मिक ज्ञान दूसरों पर झाड़ना आसान है मगर जब आप पर पड़ती है तब आप अपना सारा ज्ञान और समझदारी भूल जाते हैं। आप यह समझने की कोशिश कीजिए कि अगर यह व्यक्ति मरा नहीं होता तो आप उसके साथ किस तरह हंस-खेल रहे होते, मज़े कर रहे होते। इस मामले में कोई भी स्पष्टीकरण, व्याख्या या समझाहट एक तरह का भ्रम ही है इसलिए व्यर्थ भी। मेरा अनुभव यह है धर्म के सिद्धांतों में इसका कोई हल नहीं है, उसका दर्शन आपको कोई सांत्वना नहीं दे सकता-और जब कि लोग इस बात को जानते हैं फिर भी वे दुखी व्यक्ति के सामने वही सब प्रस्तुत करते रहते हैं और सोचते हैं कि इससे उसे कुछ तो दिलासा मिलेगा।

लेकिन ऐसा नहीं होता। इस तथ्य को मानना ही पड़ता है: आपका यह प्रियकर हमेशा हमेशा के लिए आपको छोड़कर चला गया है। यह घटना अपरिवर्तनीय है, इसे आप किसी भी हालत में बदल नहीं सकते। आपको इस आघात को सहन करना ही होगा। उसकी यादों और उसके प्रेम को अपने दिल में बसाए रखिए, वही आपके साथ रहेंगे और आपको दिलासा देते रहेंगे।

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