स्कूलों में शारीरिक प्रताड़ना: अपना खुद का स्कूल खोलने का सबसे मुख्य कारण – 21 सितंबर 2015

शारीरिक दंड

शुक्रवार के दिन अपने लंबे ब्लॉग में, जिसमें मैंने हमारे शहर के एक स्कूल में बच्चों के विरुद्ध जारी क्रूर मार-पीट का पर्दाफाश किया था, मैंने ज़िक्र किया था कि अपना स्कूल खोलने के पीछे अहिंसा एक प्रमुख कारण रहा था। मुझसे पूछा गया है कि इससे मेरा ठीक-ठीक मतलब क्या है। इसका उत्तर बहुत सीधा सा है: हम बच्चों की मदद करना चाहते थे लेकिन ऐसे स्कूल में नहीं जहाँ उन्हें मारा-पीटा जाए!

स्कूल खोलने के बहुत समय पहले से हमने गरीब बच्चों की मदद करने का काम शुरू कर दिया था। सबसे पहले भारत के विभिन्न इलाकों से संस्कृत की पढ़ाई करने आने वाले गरीब बच्चों को हम अपने आश्रम में रहने की जगह उपलब्ध कराते थे, उनके खाने-कपड़े और मुफ्त पढ़ाई का इंतज़ाम करते थे और बाद में, जब वे हमसे मदद मांगते थे तो उनकी फीस इत्यादि भी भरते थे। अंत में हमने खुद अपने आश्रम में कक्षाएँ शुरू कीं। इसके लिए हम अपने इलाके के सबसे अच्छे संस्कृत शिक्षक को ऊँची फीस देकर अपने यहाँ नियुक्त करते थे और मेरी बहन बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ाती थी।

उस समय मैं अधिकांशतः विदेशों में ही यात्राएँ करता था लेकिन एक बार, जब मैं भारत में घर पर था तो एक स्थानीय व्यक्ति मुझसे मिलने आया और पूछा कि क्या मैं कुछ गरीब बच्चों की मदद करना चाहूँगा, जिनके माता-पिता उनके प्राथमिक स्कूल की फीस भरने में असमर्थ हैं और मदद न मिलने की स्थिति में वे पढ़ाई छोड़ देंगे। मेरे परिवार ने और मैंने खुशी-खुशी मदद का हाथ बढ़ाया! इस तरह सन 2006 तक हमने लगभग 160 बच्चों को प्रायोजित किया था, जो वृंदावन के दूसरे स्कूलों में पढ़ते थे। हम उनकी फीस भरते थे और उनकी वर्दियों और किताब-कापियों का इंतज़ाम करते थे। अपनी यात्राओं में मैं लोगों को इस विषय में बताया करता था और उनमें से कुछ लोग धीरे-धीरे बच्चों को प्रायोजित करने लगे!

बीच-बीच में हम उन स्कूलों का दौरा भी किया करते थे, विशेष रूप से तब जब ये प्रायोजक हमारे आश्रम में मेहमान बनकर आते थे और देखना चाहते थे उनके बच्चों की शिक्षा की क्या व्यवस्था की गई है। वहाँ जाने के बाद, चाहे पढ़ाई कितनी भी अच्छी क्यों न चल रही हो, हर बार मुझे एक बात से बड़ी परेशानी होती थी: शिक्षक या शिक्षिका के पीछे दीवार पर टंगी छड़ी! मैं शिक्षकों प्रधानाध्यापकों से प्रतिवाद करता था और उनके जवाब बड़े हैरान करने वाले होते थे: ‘छड़ी? कौन सी छड़ी? वह तो हम ब्लॅकबोर्ड पर लकीर खींचने के लिए रखते हैं…’ या ‘अरे नहीं, छड़ी तो सिर्फ बच्चों को डराने के लिए रखी जाती है, मारने के लिए नहीं!’ या फिर यही कि ‘हम वादा करते हैं कि भविष्य में बच्चों की पिटाई नहीं की जाएगी!’ हालांकि अंतिम बात तभी की जाती थी जब हम उन्हें धमकाते थे कि उनके स्कूल से बच्चों को निकालकर कहीं और भर्ती करा दिया जाएगा- लेकिन इसके बावजूद वे अपने वादे पर कभी कायम नहीं रहते थे।

हमारे इन प्रयासों का कोई असर नहीं हो रहा था। मैं जानता होता था कि जिन लड़कों को हम वहाँ भेजते हैं, उनकी भी कक्षा में पिटाई जारी है। यह बिल्कुल उचित नहीं लगता था: हम उन बच्चों का भविष्य बनाना चाहते थे, हम चाहते थे कि वे स्कूल में पढ़े-लिखें, मस्ती करें, न कि इस तरह स्कूल जाएँ जैसे कोई काम करने निकले हों। और सबसे बढ़कर हम चाहते थे कि उनके मन में किसी बात का डर न बैठ जाए और न ही उनके साथ किसी तरह की मार-पीट की जाए। इससे क्या भला हो सकता है? हम जानते थे कि हिंसा उनके मस्तिष्क को विकृत करेगी और जितना उन्हें पढ़ाई से लाभ होगा शायद उससे भी अधिक नुकसान हो जाएगा।

लेकिन स्कूल प्रबंधन को प्रभावित करना या अपनी जायज बात मानने पर आमादा करना हमें असंभव लग रहा था- वे हमारे मुँह पर सीधा झूठ बोल देते थे क्योंकि वे इस बात पर पूरी तरह यकीन करते थे कि बच्चों को अनुशासित रखने और उनमें डर पैदा करने के लिए उन्हें शारीरिक दंड दिया जाना अनिवार्य है। और उनकी नज़र में डर के बिना बच्चे कुछ भी नहीं सीख सकते। यही कारण था कि हमें अपना खुद का स्कूल खोलना पड़ा क्योंकि हम चाहते थे कि स्कूल में अपने बच्चों के प्रति सौहार्द्र और अहिंसा सुनिश्चित की जा सके।

इस तरह सन 2007 में हमने यही किया: खुद अपना स्कूल खोल लिया।

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