कल मैंने आपको बताया था कि भारत में बहुत से लोग यह मानने के लिए तैयार नहीं होते कि मार-पीट या कभी-कभार एकाध चाँटा मार देना भी बच्चे के लिए नुकसानदेह है। चाहे घर में हो या स्कूल में। मैंने बताया था कि कैसे यह पूरी तरह गलत है। शिक्षक यह नहीं समझना चाहते कि शिक्षा और स्कूल का अर्थ सिर्फ नंबर, परीक्षा और परीक्षा-परिणाम के आँकड़ों से कहीं बढ़कर है। इसका अर्थ बच्चों को ज़िम्मेदार नागरिक बनाना है जिससे वे आगे चलकर समाज, देश और संसार का बहुमूल्य हिस्सा बन सकें। और भय के वातावरण में आप यह काम नहीं कर सकते!
सभी जानते हैं कि हम सब एक जैसे नहीं हैं। हम सभी अलग-अलग जींस लेकर पैदा हुए हैं और हर एक की अलग-अलग प्रतिभा और अलग-अलग क्षमता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कुछ व्यक्तियों के पास बिना किसी समस्या के झटपट सीखने-समझने का और किसी भी जानकारी या किसी भी बताई गई बात को ग्रहण करने और उसे अच्छी तरह याद रखने का जन्मजात गुण होता है। लेकिन बहुत से दूसरे लोग होते हैं, जिनके पास यह गुण विद्यमान नहीं होता और उन्हें चीजों को ग्रहण करने के लिए दृश्यात्मक चित्रण की ज़रूरत पड़ती है, याद रखने के लिए बार-बार दोहराने की या किसी संदर्भ से उन्हें जोड़ने की जरूरत पड़ती है।
उन्हें डरा-धमकाकर आप उनकी कोई मदद नहीं कर रहे होते। कक्षा के तीस से पचास बच्चों को एक छड़ी से नहीं हाँक सकते, जो बच्चा आपके सिखाए शब्दों को क्रमानुसार दोहरा नहीं पा रहा है, उसे मार-पीट कर आप ठीक-ठीक दोहराने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। इसके विपरीत आप उन्हें भयभीत, बेचैन और अधीर कर देते हैं, जिसके कारण कुछ सीखने के स्थान पर उनके मन में नकारात्मक परिणामों का विचार घर कर लेता है। जिसे सीखने की वाकई उन्होंने कोशिश की थी, उसे सीख न पाने के कारण आप उन्हें पीड़ा पहुँचा रहे हैं।
यह बच्चे का दोष नहीं है कि वह सीख नहीं पाया! ऐसा नहीं है कि वह जानबूझकर याद नहीं करना चाहता। और यह कोई अपराध नहीं है कि उसे सीखने में दिक्कत पेश आ रही है- लेकिन बच्चे को मारना-पीटना अपराध है! क्या आप यह नहीं देख पा रहे हैं कि आप उसे सिखाने में असमर्थ रहे हैं। आप अपना कर्तव्य ठीक तरह से निभा नहीं पा रहे हैं? कक्षा के सभी बच्चों को पढ़ाना आपका काम है और आप सिर्फ पिटाई करके बच्चों के दिमाग में जानकारियाँ ठूँसना चाहते हैं जबकि उनमें से कुछ बच्चे उन जानकारियों को दूसरों के मुक़ाबले तुरत-फुरत ग्रहण कर पाने में असमर्थ हैं।
इससे ज़्यादा से ज़्यादा आप यह कर पाएँगे कि बच्चों को तोते की तरह कोई बात रटा देंगे लेकिन उन शब्दों का वास्तविक अर्थ वे ग्रहण नहीं कर पाएँगे। बच्चे उन्हें बहुत जल्दी भूल जाएँगे क्योंकि आपने उन्हें सिर्फ उथली जानकारी दी है, उसके मर्म को समझाने की गंभीर कोशिश नहीं की है, उस बात का महत्व नहीं बताया है। आप ज़ोर-जबरदस्ती करके उन्हें सिखा रहे हैं लेकिन वे सीखने के आनंद से वंचित हो रहे हैं। आपकी हिंसा उनके अंदर भी हिंसा का संचार कर रही है, उन्हें इतना आक्रामक बना रही है कि या तो वे खुद को नुकसान पहुँचा लेंगे या फिर दूसरों को नुकसान पहुँचाएँगे।
परीक्षा में पाठों को दोहरा दें, इस उद्देश्य से स्कूल में पढ़ाने से अधिक ज़रूरी है यह सिखाना कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, किस तरह दूसरों के साथ शांतिपूर्ण वार्तालाप करना चाहिए, किस तरह मिल-जुलकर विवादों का समाधान ढूँढ़ना चाहिए, किस तरह अपनी भावनाओं को और अपने अभिमत को व्यक्त करना चाहिए और किस तरह दूसरों के विचारों का भी सम्मान करना चाहिए। बच्चों को बेहतर इंसान बनाना स्कूलों और शिक्षकों का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।
Related posts
हर चाँटा आपके बच्चे को थोड़ा सा और तोड़ देता है! 23 सितंबर 2015
एक अहिंसक स्कूल खोलने का अर्थ है पहले शिक्षकों को शिक्षित करना! 22 सितंबर 2015
