भारतीय स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाली क्रूरतापूर्वक शारीरिक प्रताड़ना का वीडियो सहित पर्दाफाश – 18 सितंबर 2015

आप पवन को जानते होंगे- या तो आप कभी आश्रम आए होंगे या मेरे ब्लोगों को नियमित पढ़ते होंगे और आपको पता चला होगा कि वह यहाँ, आश्रम में पिछले छह साल से रह रहा है। हम उसे अपने बेटे की तरह प्यार करते हैं और इसलिए जब हमें पता चला कि उसके नए स्कूल में उसके साथ क्या हो रहा है तो हमें उतनी ही तकलीफ हुई, जितनी किसी भी दूसरे, सगे माता-पिता को होती।

इस साल जून में, जब गर्मी की छुट्टियाँ समाप्त हुईं तो पवन बड़ा उत्साहित था: जुलाई की शुरुआत से उसके जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत होने वाली थी। जब से वह आश्रम आया है, स्वामी बालेंदु ई व्ही प्राथमिक शाला में पढ़ता रहा है लेकिन इस साल नए सत्र की शुरुआत से वह वृंदावन के इंडियन पब्लिक स्कूल नामक एक दूसरे स्कूल में पढ़ने जाने वाला था। रोज़ वहाँ जाने के लिए हमने उसके लिए साइकल खरीदी थी, उसकी प्रवेश फीस भरी थी, उसकी वर्दियाँ और किताब-कापियाँ खरीदी थीं।

यह सब अत्यंत रोमांचक था लेकिन उसे वहाँ भर्ती कराते वक़्त ही हमने प्रधानाध्यापक से पूछा था कि क्या उनके यहाँ शिक्षक बच्चों को मारते-पीटते हैं, क्या उनके यहाँ बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है और उनकी तरफ से यह पक्का आश्वासन ले लिया था कि ऐसा नहीं होगा। आप सभी जानते हैं कि हमारे स्कूल खोलने का प्रमुख कारण ही यह था: हम सुनिश्चित करना चाहते थे कि हमारे स्कूल में आकर बच्चे पिटाई को लेकर निश्चिंत हो सकें। ज़्यादा से ज़्यादा मुफ्त स्कूल खोलने और उन्हें अपने रेस्तराँ से जोड़ने के इरादे के पीछे भी यही कारण था कि गरीब और वंचित परिवारों के बच्चे पिटाई के डर से मुक्त होकर वहाँ मुफ्त शिक्षा प्राप्त कर सकें! अहिंसा और प्रेममय वातावरण बच्चों को उपलब्ध कराना हमारे स्कूल के प्रमुख मूल्य रहे हैं! उस स्कूल ने भी हमें आश्वस्त किया था कि वहाँ बच्चों के साथ किसी तरह की हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। इस वचनबद्धता के पश्चात ही हमने अपने बच्चे को वहाँ भर्ती कराया था।

हम सोच भी नहीं सकते थे कि वे लोग ज़बान देकर किस हद तक अपने शब्दों के विरुध्द आचरण कर सकते हैं!

अगर आप कभी पवन से मिले हों तो जानते होंगे कि स्वभाव से ही वह बहुत शांत बालक है। उस नए स्कूल में कुछ हफ्ते गुज़ारने के बाद से ही हमने नोटिस किया कि उसके व्यवहार में कुछ तब्दीली आ रही है। हमने सीधे उसी से पूछा: ‘क्या हो गया है तुम्हें? स्कूल में कुछ हुआ है?’ और तब हमें सारी कहानी पता चली।

वहाँ जाना शुरू करने के पहले हफ्ते से ही उसने देखा कि शिक्षक उसके सहपाठियों की पिटाई कर रहे हैं। हाथ पर छड़ियाँ, और कभी-कभी पैरों पर, पीठ पर और जहाँ शिक्षक का हाथ पहुँच सकता हो, वहाँ पर! उसे भी पहले भी मार पड़ चुकी थी और उस दिन भी पड़ी थी। उसने अपने हाथ दिखाए- मार खाकर लाल-गुलाबी हो रहे थे और उनमें इतना दर्द हो रहा था कि ठीक होने में दो दिन लगे।

वहाँ की जो कहानियाँ उसने बताईं, उन्हें सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं: हर शिक्षक के पास एक छड़ी है और जब भी वे पाते हैं कि किसी बच्चे ने होमवर्क नहीं किया है या कोई गलती की है तो किसी बच्चे से वह छड़ी मँगवाते हैं। उसके बाद गलती करने वाले बच्चे को अपना हाथ शिक्षक के सामने खोलकर रखना होता है। सामान्यतया छड़ी हाथ पर पड़ती है मगर यदि शिक्षक कुछ ज़्यादा ही गुस्से में हुआ तो वह कहीं भी उसकी बरसात कर सकता है। अक्सर इस हिंसा का कोई विशेष कारण भी नहीं होता।

हमने पूछा कि क्या उसने प्रधानाध्यापिका से शिकायत की तो हमें और भी बहुत कुछ जानने को मिला: प्रधानाध्यापिका खुद स्कूल का चक्कर लगाती है और मौका मिलते ही, खुद भी बच्चों की पिटाई करती है! ऐसी प्रधानाध्यापिका से शिकायत करने की हिम्मत कौन करेगा? हमें बहुत दुःख हुआ और हम क्रोध से भर उठे! हमारे दिल को ठेस लगी थी कि जिस बच्चे को हमने अपने स्कूल में इतने साल मार-पीट से दूर रखा, जिसे स्कूली पिटाई को कोई अनुभव नहीं है, उसे इस प्रताड़ना से गुज़रना पड़ रहा है! मुझे अपने स्कूली दिनों की याद हो आई और उस समय बच्चों के साथ होने वाली हिंसा पर अपनी खीझ, गुस्से और हताशा की भी

हमें क्या करना चाहिए?

यह सोचकर कि बच्चे को वहाँ से निकालकर किसी दूसरे स्कूल में भर्ती करवा देते हैं, हमने कुछ दूसरे स्कूलों के विषय में विस्तृत जानकारियाँ प्राप्त करने की कोशिश की। समस्या यह थी कि वैसे भी बच्चों के प्रति शारीरिक हिंसा के मसले पर सभी स्कूल साफ़ झूठ बोल देते हैं और ऐसी स्थिति में हम कैसे विश्वास करते कि किसी अन्य स्कूल में भी ऐसा ही नहीं होगा? जिनके बच्चे स्कूलों में पढ़ते थे, उनके अभिभावक मित्रों से पता किया और वही बात सामने आई जिसका हमें शक था- हमें पता चला कि कमोबेश सभी स्कूलों में बच्चों का शारीरिक दंड दिया जाता है!

एक और विकल्प था: घर में पढ़ाना। हमने सोचा यह हमारे लिए एक और विकल्प हो सकता है- लेकिन उससे उस स्कूल के बच्चों को क्या लाभ मिलेगा जिन्हें रोज़ ब रोज़ शिक्षकों की पिटाई बर्दाश्त करनी पड़ती है, चाहे वह किसी भी विषय की पढ़ाई हो, कोई भी शिक्षक हो! इस प्रकरण के बाद क्या हमारे लिए इतना पर्याप्त होगा कि सिर्फ अपने आश्रम के बच्चों को हम पहले अपने स्कूल में पढ़ायें और फिर आगे की पढाई भी उन्हें आश्रम में ही रख कर कराई जाये?

पवन के साथ बात करके हमने कोई ठोस कार्यवाही करने का निर्णय किया, जिससे इस स्थिति में बदलाव लाया जा सके। हमने एक गुप्त कैमरा खरीदकर पवन को दिया, जिसे वह अगले सात या दस दिन तक स्कूल ले जाता रहा। जो वीडियो क्लिप्स वह लेकर आया है, वे उसकी बताई कहानियों की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं। आप उन्हें नीचे देख सकते हैं और आप भी अगर हम जैसे संवेदनशील हुए तो हमारी भाँति द्रवित हुए बगैर नहीं रह पाएँगे!

उनकी कक्षाध्यापिका एक दिन कक्षा में आई और पूरी कक्षा को एक सिरे से मारना शुरू कर दिया, सिर्फ इसलिए कि कुछ दूसरे शिक्षकों ने कक्षा के बारे में उससे शिकायत की थी! हर किसी को डंडे से मारा गया, सबकी पिटाई हुई। कुछ बच्चे उसी समय कक्षा में आए थे, उनकी भी पिटाई हुई और उन्हें समझ में तक नहीं आया कि उन्हें क्यों मारा-पीटा जा रहा है! एक लड़के को उसने कुछ लाने के लिए भेजा था, जब वह वापस आया तो उसे भी नहीं छोड़ा गया! और अंत में उसने बच्चों को धमकाया भी, कि एक हफ्ते तक वह इन सज़ाओं को रोज़ दोहराएगी, जिससे वे कुछ सीख ले सकें और अगर वे उससे भी नहीं सीख पाए तो उसके बाद दिन भर के लिए उन्हें 'मुर्गा' बनने की सजा देगी!

वीडियो क्लिप्स अलग-अलग शिक्षिकाओं द्वारा, अकारण या छोटी-मोटी गलतियों पर लड़के और लड़कियों, दोनों की क्रूर मार-पीट, यहाँ तक कि कभी-कभी शिक्षिकाओं को बच्चों के सिर पर चोट करते हुए भी दिखाती हैं। साथ ही उन्हें बुरी तरह अपमानित भी किया जाता है। एक क्लिप में आप एक शिक्षिका को यह कहते हुए सुन सकते हैं, ये गाँव वाली हेकड़ी, गाँव में ही छोड़कर आना तुम, और इतने बेशर्म हो कि इतनी पिटाई के बाद कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आदत पड़ी हुई है रोज रोज पिटते आ रहे हो ठुकते आ रहे हो! लात-घूँसे खाकर भी तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा!

हमें पवन पर गर्व है कि पकड़े जाने और पीटे जाने का खतरा होने के बावजूद भी उसने बाल उत्पीड़न के ये प्रमाण हमें उपलब्ध कराए। अगर उन्हें पवन के पास कैमरा मिल जाता तो वे उसके साथ न जाने क्या करते?

जब हमें कुछ वीडियो क्लिप्स मिल गईं तो हमने उनके आधार पर तुरंत कार्यवाही करने का निर्णय लिया। मैंने उत्तर प्रदेश की बाल-आयोग की अध्यक्ष, श्रीमती जूही सिंह से काफी देर बातचीत की और उन्हें सारी घटनाओं का ब्योरा दिया।

मुझे उनसे समुचित कार्यवाही का आश्वासन प्राप्त हुआ है।

अगले दिन हम उस स्कूल की प्रधानाध्यापिका से मिले। शुरू में तो उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया मगर जब हमारा संबल पाकर पवन ने ज़ोर देकर वही बात कही तो उसने अपनी दो शिक्षिकाओं को बुलवाया। और उन्होंने वे सारे तथ्य क़ुबूल किए, जिन्हें हमने इन वीडियो क्लिप्स में देखा था। कक्षाध्यापिका ने क़ुबूल किया कि उसने कक्षा के सारे बच्चों की पिटाई की थी क्योंकि उसे यह पता नहीं चल पा रहा था कि कौन बदमाशी या शैतानी कर रहा है। तो आपको दोषी का पता नहीं चला इसलिए आप सभी निर्दोषों को सज़ा देंगी? आप वहाँ की हालत समझ सकते हैं, जहाँ शिक्षिकाएँ खुले आम, बिना किसी पश्चाताप या अपराधबोध के सब कुछ स्वीकार करने की ढिठाई कर सकती हैं! जब प्रधानाध्यापिका उनसे कहने लगी कि शैतानी करने वाले बच्चे को उनके पास भेजना चाहिए था, तो हमने प्रतिवाद किया कि वे स्वयं भी बच्चों के साथ मार-पीट करती हैं! इस सच्चाई के सामने कुछ कहना उनके लिए असंभव था।

हमने साफ़ कहा कि बच्चों को शारीरिक दंड देना कानूनन अपराध है और इसके लिए आपको जेल की सज़ा भी हो सकती है! हमने उन्हें सी बी एस ई (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल) द्वारा जारी 'शारीरिक दंड की रोकथाम हेतु दिशानिर्देशों' की पुस्तिका दी क्योंकि वह स्कूल भी सी बी एस ई से ही सम्बद्ध है!

उत्तर? 'जी हाँ, लेकिन नियम तो बहुत सारे हैं- अगर हम उन सभी नियमों का पालन करते रहे तो और कुछ नहीं कर पाएँगे!' प्रधानाध्यापिका अपने आपराधिक कामों को उसी तरह जायज़ ठहरा रही थी जैसा हमारे स्कूल की पूर्व-शिक्षिकाएँ किया करती थीं और जिन्हें हमने सिर्फ एक बार बच्चे पर हाथ उठाने पर निकाल बाहर किया था: 'आप क्या करेंगे जब बच्चा पूरी तरह हाथ से निकल जाए? 'प्रधानाध्यापिका, जिसकी छड़ी उसके पास ही रखी हुई थी, तर्क करती ही चली जा रही थी, 'चलिए माना कि छड़ी से पिटाई करना गलत है लेकिन बच्चों को काबू में रखने के लिए आपको 'कुछ न कुछ' तो करना ही पड़ेगा!'

यह वादा करते हुए कि भविष्य में बच्चों की पिटाई बंद कर दी जाएगी वे हमें इस बात पर सहमत करने की पूरी कोशिश करते रहे कि हम पवन को उनके स्कूल में भेजना जारी रखें। लेकिन मामला सिर्फ उसका नहीं था, दूसरे सभी बच्चों का था! जब हमने उनसे यह लिखकर देने के लिए कहा कि भविष्य में किसी बच्चे पर हाथ नहीं उठाया जाएगा तो वह इसके लिए राज़ी नहीं हुई।

प्रधानाध्यापिका ने हमें स्कूल के संचालक के पास भेज दिया, जो उसका पति ही था और प्रधानाध्यापिका के साथ उस स्कूल का मालिक था। यह मुलाक़ात बहुत छोटी सी थी क्योंकि वह बहुत रूखा और अशिष्ट था। उसने हमसे बैठने तक के लिए नहीं कहा और हर बात से इंकार करता रहा। अंत में उसने कहा, 'जाइए, जो बन पड़े कर लीजिए!' स्वाभाविक ही, उसे पता नहीं था कि हमारे पास उनके अपराधों का पक्का प्रमाण भी मौजूद है। हम चुपचाप चले आए। उसके साथ आगे बात करना ही व्यर्थ था।

जब हम आश्रम वापस आए, हमें अपने एक भूतपूर्व पड़ोसी का फोन मिला, जिन्हें वे लोग भी जानते हैं। उसने कहा, 'आप इनसे पंगा क्यों लेते हो? जानते हैं, इस डायरेक्टर का भाई एक बार एक व्यक्ति के सिर पर पिस्तौल तानकर खड़ा हो गया था?' यह प्रकारांतर से हमारे पास भेजी गई धमकी थी। हमने जवाब दिया कि वह हम सबको गोली मार सकता है लेकिन हम वही करेंगे जो हमारा दिल चाहता है और जो किया जाना चाहिए।

हमारा अगला कदम मीडिया से सम्पर्क करना था। उन्होंने उनके इंटरव्यू लिए और हमने वीडियो क्लिप्स उन्हें थमा दी। हमने एक वीडियो तैयार किया है और वे अपने कार्यक्रम में उसे दिखाकर इस अपराध को जनता के सामने रखेंगे।

हमारे लिए यह सिर्फ इन शिक्षिकाओं, इस प्रधानाध्यापिका या इस स्कूल की बात नहीं है। मामला समाज और देश के बच्चों से संबंधित है! लोग सोचते हैं कि बच्चे कुछ सीख सकें, इसके लिए हिंसा ज़रूरी है! बच्चे कुछ कहते हुए घबराते हैं, अभिभावक शिकायत करते हुए डरते हैं। अभिभावक समझते हैं, उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, बच्चे को उस स्कूल से निकाल लें तो उसकी पढ़ाई का एक साल बरबाद होगा।

हिंसा या भय का वातावरण सीखने में कोई मदद नहीं करता। विपरीत इसके, वह उन्हें नुकसान पहुँचाता है, स्वस्थ तरीके से विकसित होने में रुकावट बनता है! सकारात्मक और स्नेहिल वातावरण में बच्चे उससे कहीं अधिक सीख पाते हैं और उनका समग्र विकास संभव होता है!

मैं उन बच्चों की मदद करना चाहता हूँ जो स्कूलों में मार खाते हैं। मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि यह गैरकानूनी है, कि इसकी शिकायत कहाँ और कैसे की जाए- और यदि आप ऐसा करते हैं तो आपका नाम गुप्त रखा जाएगा!

प्रिय अभिभावकों, विश्वास कीजिए, यह आपके बच्चे के लिए हानिकारक है। जब भी आपको पता चले कि आपके बच्चे के साथ ऐसा हो रहा है तो चुप न बैठें! प्रतिरोध में आवाज़ बुलंद करें, शिक्षकों से, स्कूल प्रबंधन से, दूसरे अभिभावकों से मिलकर चर्चा करें। इन घटनाओं को जनता के सामने लेकर आएँ, इस प्रताड़ना का सक्रिय प्रतिरोध करें!

प्यारे बच्चों, अपनी बात कहने से कभी न घबराएँ! आपके साथ जो हो रहा है अपने अभिभावकों को अवश्य बताएँ, खुद भी सक्रिय हों, जो कुछ आपके साथ हो रहा है, उसकी सूचना अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

मैं भी आपकी मदद के लिए यहाँ मौजूद हूँ। जब भी ज़रूरत हो, मुझसे संपर्क करें। मैं आपके समर्थन में खड़ा रहूँगा और हर संभव मदद करने का प्रयास करूँगा।

बच्चों की खातिर हमें इस देश में और समाज में परिवर्तन का सूत्रपात करना है।

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