आप खास हैं क्योंकि आप, आप हैं- इसलिए नहीं कि आप क्या करते हैं!-14 अगस्त 2013

चेतना

उन अल्पसंख्यकों के लिए, जिन पर समाज द्वारा दबाव डाला जाता है, अपने कल के ब्लॉग के बाद आज मैं उन बहुसंख्यकों के बारे में कुछ शब्द कहूँगा, जो अल्पसंख्यकों जैसा बिल्कुल अनुभव नहीं करते बल्कि सोचते हैं कि वे वैसा ही महसूस करते हैं, जैसा समाज के दूसरे लोग महसूस करते हैं, वे जो वास्तव में ‘बहुसंख्यक समाज’ का ही हिस्सा हैं। क्यों? क्योंकि ‘बहुसंख्यक-ताड़ना’ जारी है, खासकर आध्यात्मिक क्षेत्र में, लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो ईमानदारी के साथ वही चाहते हैं, जो वे कर रहे होते हैं और इस आचरण का उन्हें अधिकार भी प्राप्त है-भले ही इसका अर्थ यह निकाला जाए कि वे ‘बहुसंख्यक’ हैं, यानी उनका आचरण समाज के आम, सामान्य लोगों जैसा ही है। अगर आप उनमें से एक हैं तो आपको इस बात के लिए आत्मग्लानि नहीं होनी चाहिए!

आपको यह मज़ाक लगेगा कि मैं सोचता हूँ कि यह कहना ज़रूरी है लेकिन मुझे समझाने दीजिए कि क्यों मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग ऐसे हैं, जो ऐसी धारणा रखते हैं। बहुत साल से लोग इस बारे में ‘जागृत’ हो रहे हैं और समझ रहे हैं कि वे समाज की परम्पराओं के अनुसार नहीं चलना चाहते और वही करना चाहते हैं जो उनका दिल कहता है। ऐसे कई आंदोलन भी चले हैं, जिन्हें आप ‘आध्यात्मिक आंदोलन’ कह सकते हैं, अगर आप एक शब्द में इसका आशय जानना चाहते हैं। वे सभी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वही कार्य करें जो आपको प्रसन्न करता है और मैं इस विचार की मूल भावना का पूरी तरह समर्थन करता हूँ। उनके अलग-अलग आग्रह (रास्ते) हो सकते हैं मगर ज़्यादातर लोग अपने अनुयायियों से यही एक बात कहते हैं कि आप विशिष्ट हैं!

जब कि मैं इस विचार की मूल भावना से सहमत हूँ कि हम सभी खास हैं, इस संदेश का एक और निहितार्थ है जिससे मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ: वह यह कि आप खास हैं क्योंकि आप कुछ अलग कर रहे हैं। आप खास हैं क्योंकि आपके आसपास के वे सब लोग, वे ‘बहुसंख्यक’, वह ‘विशाल जनसमूह’ उतने जागृत (सचेतन) नहीं हैं, जितना कि आप हैं। आप खास हैं क्योंकि वे उन्हीं पुरानी बातों से चिपके हुए हैं, समाज की मान्यताओं के अनुसार काम कर रहे हैं, जिन्हें अब आप पसंद नहीं करते। आप खास हैं क्योंकि आप वह सब पसंद नहीं करते, जो वे पसंद करते हैं। आपको ऐसे लोग भी मिलेंगे, जो लगभग वही बातें पसंद करते हैं, जो आप पसंद करते हैं लेकिन अंत में आप अकेले ही अपने ज्ञान (जागृति) के रास्ते पर चलेंगे क्योंकि आप इतने खास हैं।

खैर, मैं इस विचार का समर्थन नहीं करता कि वे सारे लोग ‘चुनिन्दा लोग’ हैं। मैं नहीं समझता कि यह कोई ठीक विचार है कि लोगों को बताया जाए कि आपको दूसरों से इतना अलग होना चाहिए कि आप उनके जैसे न लगें, उनके साथ आपकी संगति बिल्कुल न बैठे। हाँ, मैं स्वयं लोगों से यह कहता हूँ कि यह ज़रूरी नहीं है कि आपकी संगति उनके साथ बैठे ही, लेकिन यह उस बात से बिल्कुल भिन्न बात है कि आप उनसे कहें कि उन्हें संगति बिठानी ही नहीं चाहिए। वे खास नहीं माने जाएंगे अगर वे सामान्य लोगों के साथ सहज महसूस करते हैं। कि उन्हें अपने सामान्य परिवेश में अजनबी महसूस करना चाहिए, या उसमें उन्हें बुरा लगना चाहिए। कि उन्हें नए दोस्त या अल्पसंख्यक लोगों के समूह को खोजना चाहिए और उसमें शामिल हो जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उन्हें भेड़िये की तरह समाज के बाहर भटकते रहना चाहिए।

जब आप अपने शरीर, खान-पान, मस्तिष्क और अपने तनाव या विश्रांति की तीव्रता और कुल मिलाकर अपनी कार्यपद्धति और व्यवहार के बारे में ज़्यादा सोचने लगते हैं या उसके बारे में अधिक चेतन होते हैं, आप महसूस कर सकते हैं कि आप कुछ अलग हैं। आप महसूस करेंगे कि आप कुछ गतिविधियों को पसंद नहीं करते हैं, जैसे शाम को किसी शराबखाने में धुत्त पड़े रहना या कहीं सामिष भोजन करना क्योंकि अब आपने शराब पीना छोड़ दिया है या शाकाहार अपना लिया है। हो सकता है कि अब आप कई ऐसे मामलों पर कोई राय देना पसंद नहीं करते, जिन पर पहले आप खुलकर बातचीत किया करते थे। लेकिन भले ही आप फिल्म देखना पसंद करते हैं, डिस्को में जाकर नृत्य करना पसंद करते हैं, या दोस्तों के साथ फुटबाल मैच देखना पसंद करते हैं तो आप अब भी खास और अनूठे हैं! आप अब भी एक अलग अस्तित्व के मालिक हैं और कोई भी आप जैसा नहीं है!

इसका संदेश यह है: जैसे आप हैं उसी रूप में आप अनूठे हैं। इसलिए कि आप, आप हैं, इसलिए नहीं कि आप ऐसा या वैसा करते हैं या नहीं करते। भले ही आप बहुसंख्यक समाज का हिस्सा हों, हैं आप विशिष्ट ही!

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