आखिर आप बच्चे पैदा ही क्यों करते हैं? – 9 जुलाई 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

कल मैंने पूर्णकालिक स्कूलों के बारे में अपने विचारों को व्यक्त करने की शुरुआत की थी। मैंने आपको बताया था कि क्यों मैं इसे एक भयंकर बात समझता हूँ। जिस उम्र में बच्चों को स्वतंत्रतापूर्वक खेल-कूद और मौज-मस्ती में मगन होना चाहिए, तब उन पर व्यवस्था के अनुरूप चलने और उस व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए इतना दबाव डालना सर्वथा अवांछनीय है। इससे उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता। बच्चों को सिखाने की सारी ज़िम्मेदारी शिक्षकों पर डाल दी जाती है, जो यह ज़िम्मेदारी वहन करने में आनाकानी करते हैं। स्वाभाविक ही, इस सारी व्यवस्था में बच्चों का नुकसान होता है। लेकिन आज मैं इस शिक्षा पद्धति के अंतर्गत अभिभावकों से संबन्धित एक और पहलू के बारे में लिखना चाहता हूँ: आखिर आप बच्चे पैदा ही क्यों करते हैं?

मैं जानता हूँ कि यह साधारणीकरण बहुत कटु लग सकता है लेकिन जब आप इस मामले की गहराई में जाएंगे और बिना किसी पूर्वाग्रह और बिना किसी बौद्धिक वाग्जाल के इस विषय को समझने की कोशिश करेंगे तो यह प्रश्न स्वतः ही उपस्थित हो जाता है!

जर्मनी में अब यह नियम है कि जब भी कोई बच्चा तीन साल का हो जाता है, उसके अभिभावकों को उसके लिए तुरंत ही डेकेयर सेंटर में स्थान हासिल हो जाता है। लेकिन अधिकांश अभिभावक इसके पहले ही अपने बच्चों को, ऐसी ही किसी न किसी संस्था को सौंप चुके होते हैं। अक्सर देखा गया है कि बच्चे की उम्र साल भर या छह माह, यहाँ तक कि तीन माह भी हो सकती है। आप उसके साथ ऐसे में कितना समय बिता पाएंगे? मुझे तो यह बात बिलकुल समझ में नहीं आती कि कोई अपने बच्चे के साथ ऐसा कर सकता है। आप जब बच्चे को अपने साथ इतने कम समय के लिए रखना चाहते थे या कहें, कि रखना ही नहीं चाहते थे, तो फिर उसे पैदा ही क्यों करते हैं?

इस पर यथार्थवादी दृष्टिकोण से सोचना आवश्यक है: आप बच्चे के जन्म के बाद, तीन माह उसके साथ रहे। उसके बाद आप अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं और दफ्तर से वापस लौटते हुए उसे अपने साथ ले आते हैं, रात भर, जिसका अधिकांश हिस्सा बच्चा और आप भी, सोकर गुजारते हैं, अपने साथ रखते हैं और सुबह फिर उसे किसी संस्था को सौंप देते हैं। सप्ताहांत में हो सकता है कि आप उसके साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताना चाहें मगर आपके पास और भी बहुत से काम होते हैं; घर के ही लंबित काम निपटाने होते हैं, अपने अभिभावकों और परिवार के दूसरे सदस्यों से मिलना होता है। समय की आपके पास बेहद कमी होती है और आप बच्चे के साथ, वास्तव में देखा जाए तो, बहुत कम समय गुज़ार पाते हैं।

बच्चा बड़ा होता जाता है और डे-नर्सरी से केजी और केजी से स्कूल जाना शुरू कर देता है। और अब स्कूल भी पूर्णकालिक स्कूल हो चुके हैं तो बच्चा और आप, दोनों ही, उस पुराने ढर्रे से बंध जाते हैं जिसकी आपको पहले से आदत पड़ चुकी है। यह ढर्रा आपके लिए पहले से ही सुविधाजनक था और अब, जैसे जैसे आपका बच्चा बड़ा हो रहा है, उसके लिए भी यह सुविधाजनक होता जा रहा है। दरअसल आपको पता ही नहीं चल पाता और बच्चा किशोर हो जाता है और, जैसी कि पश्चिमी देशों में आम बात है, वह आपके साथ कम से कम समय बिताना चाहता है। आप बोरिंग हैं, अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं, कूल नहीं हैं। अगर उसके मन में आपकी कोई बेहतर छवि है भी, तब भी आपके साथ समय बिताने की उसकी कोई इच्छा नहीं होती क्योंकि वह भी अपने दोस्तों में व्यस्त हो चुका है, खेलने में, संगीत में, पार्टियों, नाच-गानों में! घर में आपके साथ बैठने में क्या रखा है, जीवन में कितनी कुछ करने लायक आकर्षक बातें हैं! अठारह साल का होते ही आपका “बच्चा” स्वयं अपना जीवन शुरू करना चाहता है, वह स्वतंत्र हो चुका है। आप सप्ताहांत में कभी कभार उसके यहाँ मिलने जाते हैं। आपके “बच्चे” ने अब अपना परिवार भी बसा लिया है और उसके पास आपके लिए और भी कम समय बचता है। आप स्वयं भी अधेड़ हो चुके हैं और अंततः अवकाश ग्रहण कर लेते हैं। आप वृद्धाश्रम में रहने लगते हैं और आशा करते हैं कि अपने व्यस्त जीवन में से, आपका बेटा, समय निकालकर कभी कभार आपको देखने आएगा।

इस जीवन को फिर से देखिये, और विचार कीजिए कि कितना समय आपने अपने बच्चे के साथ गुजारा? आपने बच्चा पैदा ही क्यों किया? बच्चा पैदा करके आपने क्या पाया? स्वाभाविक ही, प्रेम के कुछ पल अवश्य होंगे, जो आप हमेशा याद रखना चाहेंगे, लेकिन क्या आप यह अनुभव नहीं करते कि काश, आपके पास बच्चे के साथ बिताने के लिए कुछ ज़्यादा समय होता! अगर आपने अपने बच्चे के साथ कुछ ज़्यादा समय बिताया होता, और आपके साथ बच्चे के संबंध कुछ अधिक आत्मीय होते तो, क्या आपको नहीं लगता कि, आप अपने जीवन से ज़्यादा परितृप्त होते, आपको अपना जीवन कुछ ज़्यादा सार्थक लगता!

जब भी ऐसे सवाल सामने आते हैं, मुझे महसूस होता है कि पश्चिमी समाज में कोई न कोई बात है जो बहुत गलत हो गई है! मैं तो यही समझता हूँ कि समाज ही गलत दिशा में चल पड़ा है-क्योंकि अभिभावक अपने बच्चों से बहुत प्रेम करते हैं, उन्हें छोड़ना उनके लिए बहुत कठिन होता है! लेकिन वह दूसरी बात है जिस पर मैं कल चर्चा करूंगा।