तीन बार भोजन – क्या यह बच्चों के लिए विलासिता है? – 11 जून 2013

शहर:
ल्युनेबर्ग
देश:
जर्मनी

मैंने कल यूनिसेफ द्वारा अमीर मुल्कों, खासकर यूरोपीय देशों में मौजूद गरीब बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के बारे में चर्चा की थी। अध्ययन में 14 प्रकार के अभावों की एक तालिका दी गई है जिनमें से किन्हीं दो या अधिक की अनुपलब्धता उस बच्चे को गरीब मानने का पर्याप्त कारण हो सकती है। इस सूची को पढ़ते हुए मैं अपने देश, भारत के बच्चों के बारे में सोचे बगैर नहीं रह सका; आश्रम में रह रहे बच्चों के बारे में और उससे ज़्यादा उन बच्चों के बारे में जो आश्रम के स्कूल में पढ़ने आते हैं मगर अपने गरीब परिवार के साथ वहीं आसपास रहते हैं। स्पष्ट ही यूनिसेफ ने यह सूची विकसित देशों के गरीबों को ध्यान में रखकर बनाई है लेकिन उनकी आवश्यकताओं से युक्त इस सूची की तुलना भारत के गरीबों के लिए बनाई गई काल्पनिक सूची से करते हुए यह देखना कि उस सूची में कौन से बिन्दु होंगे और कौन से नहीं होंगे, बहुत रोचक हो सकता है। मैंने सोचा कि क्रमवार एक-एक बिन्दु को ध्यान में रखते हुए अपने विचार आज और कल की डायरियों में दर्ज करूँ।

1. तीन बार भोजन

2. कम से कम रोज़ एक वक्त मांस या मछली युक्त भोजन (या समतुल्य निरामिष आहार)

3. रोज़ ताज़ी सब्जियाँ और फल

अगर हम इन पहले तीन बिन्दुओं पर दृष्टिपात करें तो मैं कह सकता हूँ बहुत से भारतीय परिवार पहले बिन्दु पर ही संघर्ष करते नज़र आएंगे। दूसरे बिन्दु को पाना उनके लिए टेढ़ी खीर या लगभग असंभव होगा और तीसरे बिन्दु को तो भारत के संदर्भ में पूरी तरह छोड़ देना ही उपयुक्त है। भारत में ताज़े फल और सब्जियाँ बहुत महंगे होते हैं। आलू सबसे सस्ता होता हैं और अक्सर भोजन में पाया जाता है। भोजन की दूसरी वस्तुएँ कभी-कभार, विशेष आयोजनों पर थाली में दिखाई देती हैं। मौसमी सब्जियाँ और फल, जो सस्ते मिल जाते हैं सिर्फ अपने मौसमों में भोजन का हिस्सा बनते हैं।

फिर भी हर परिवार अपने बच्चों से प्रेम करता है और भरसक कोशिश करता है कि अपने बच्चों को अच्छे से अच्छा खाना खिलाए। हमारे स्कूल में जो बच्चे पढ़ने आते हैं उनके माता पिता भी इस आशा में ही अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि कम से कम यहाँ उन्हें भरपेट अच्छा भोजन प्राप्त होगा, जोकि स्कूल में उन्हें प्राप्त होता ही है। ऐसा होने पर उनकी कम से कम एक समस्या का समाधान हो जाता है। कम से कम उनके बच्चों का पेट भरा हुआ होता है!

4. उम्र के मुताबिक उपयुक्त पुस्तकें और जानकारियाँ (पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त)

गरीब भारतीय अभिभावकों की शिक्षा का स्तर यूरोप के अभिभावकों के मुक़ाबले बहुत नीचा होता है। शायद ही यूरोप में कोई अशिक्षित व्यक्ति होगा जब कि, उदाहरण के लिए, हमारे प्रदेश में हर दूसरा व्यक्ति अनपढ़ है। ऐसे लोग अपने बच्चों के लिए स्कूली किताबों के अलावा दूसरी किताबें क्यों खरीदेंगे? बच्चों को पढ़कर कौन सुनाएगा? वे स्कूली किताबें खरीद पाए यही उनके लिए पर्याप्त संतोष की बात होती है, और इतना भी कर पाना अधिकांश परिवारों के लिए काफी मुश्किल होता है। इसीलिए हमारे स्कूल में स्कूली किताबें मुफ्त मुहैया कराई जाती हैं, और कुछ कहानियों की किताबें भी होती हैं जिससे बच्चे कम से कम यहाँ पढ़ने में आनंद का अनुभव कर सकें।

5. खेलने के मैदान और उपकरण जैसे साइकिल, रोलर स्केट्स आदि

यह बिन्दु ‘विश्रांति’ के बारे है। हर व्यक्ति को विश्रांति की आवश्यकता होती है, अपने मन के मुताबिक खेलने की या थोड़ा-बहुत मौज-मस्ती करने की; लेकिन इसके उपकरण भारत में मूल आवश्यकता की सूची में नहीं आ सकते। इस देश में जहां भूख और बाल-मजदूरी के खिलाफ लड़ाई अभी जारी है आपके रोलर स्केट्स और साइकिलें भारत के संदर्भ में गरीबी का पैमाना नहीं बन सकते।

एक अप्रासंगिक बात और! मैं अभी उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब भारत की सड़कों पर पहला व्यक्ति रोलर स्केटिंग करेगा। गुड लक!