धन का राक्षस माँओं को उनके बच्चों से दूर रखता है – 10 जुलाई 2013

बच्चे

आज मैं किस विषय पर लिखने वाला हूँ, यह मैंने कल ही इंगित कर दिया था। बच्चों के लिए पूर्णकालिक स्कूलों के भयंकर और अनुपयोगी होने के कारणों पर मैंने प्रकाश डाला था और यह भी दर्शाया था कि कैसे इस विषय पर गहराई से विचार करने पर अंततः यही प्रश्न सामने आ खड़ा होता है कि आखिर बच्चे पैदा ही क्यों किए जाएँ! क्योंकि पैदा करने के बाद देखरेख और लालन-पालन के लिए दूध पीते बच्चों को अजनबियों को ही सौंपना पड़ता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हमें सभी बातों पर यथार्थवादी दृष्टिकोण से विचार करते हुए अभिभावकों की परिस्थिति पर भी गौर करना चाहिए। क्योंकि बच्चों को अपने से दूर रखकर वे बेचारे भी प्रसन्न नहीं होते बल्कि मजबूरी में उन्हें ऐसा करना पड़ता है।

मेरा अब भी यही मानना है कि तीन माह या छह माह की उम्र में अपने माँ-बाप से कई घंटों के लिए जुदा होना किसी बच्चे के लिए बड़े ही दुर्भाग्य की बात है। यह उम्र माँ-बाप से अलग होने के लिए बहुत छोटी उम्र है। इसके बावजूद यह कहना गलत होगा कि वे सभी महिलाएं जो अपने दूध पीते बच्चों को किसी अजनबी के हवाले कर देती हैं निष्ठुर होती हैं! उनसे भी यह पूछा जाना चाहिए कि वे ऐसा क्यों करती हैं और ऐसा करते हुए उन्हें कैसा महसूस होता है।

मेरे मुताबिक, आर्थिक समस्याओं के अतिरिक्त इसका कोई ठोस कारण नज़र नहीं आता। अगर कोई यह कहता है कि माँओं को भी अपना निजी समय मिलना चाहिए और यह कि माँ होना अपने आपमें इतना त्रासदायक होता है कि दिन के कुछ घंटे अगर वे अपने बच्चों से दूर रहें तो यह उनके लिए भी अच्छा ही सिद्ध होगा, तो मुझे उनकी संवेदनशीलता पर ही शक होने लगता है। क्या वे बच्चे के अस्तित्व को अनदेखा नहीं कर रहे हैं और क्या वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि एक तीन माह के बच्चे के लिए अपनी माँ के सीने से लगकर सोना किसी संस्था के बहुत आरामदेह पालने में सोने के मुक़ाबले हर हाल में बेहतर है। नहीं, मेरा विश्वास है कि इसका मुख्य और एकमात्र कारण धन ही है।

पुरुषों और महिलाओं का एक जैसे काम करना सामान्य बात है और जब माँएँ घर में रहती हैं तो सारे परिवार का गुज़ारा पुरुष की आमदनी से चलता है। बाप के लिए, जिसे अब दोहरी ज़िम्मेदारी वहन करनी पड़ती है, यह तनाव का कारण बन सकता है। उसे अब ज़्यादा देर तक काम करना पड़ता है जिससे वह घर का खर्च सुचारु रूप से चला सके। इसके कारण माँ पर तब और भी ज़्यादा तनाव हो जाता है जब वह अपने पति से घर के कामों में हाथ बटाने की अपेक्षा कर बैठती है। वह चाहती है कि पति घर के कामों में भी हाथ बंटाए, और घर में पैसों की तंगी भी न हो!

और इस तरह उनके घर में डे-केयर सेंटर का प्रवेश हो जाता है, कई बार वहाँ अपने बच्चे के प्रवेश को लेकर बहुत वाद-विवाद और संघर्ष भी करना पड़ता है। लेकिन उसके बाद औरतों के पास एक अतिरिक्त आय का जरिया बन जाता है और परिवार अब थोड़ा शांतचित्त और सुकून से भरा दिखाई देने लगता है, भले ही डॉक्टर के खर्चे और बच्चे की फीस और उसके नए-नए सामानों और कपड़ों के बिल बढ़ते जाते हैं।

समस्या का यह एक इलाज अवश्य है, मगर इस इलाज से वे प्रसन्न हैं ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि बच्चे के साथ खेलना छोडकर वे इतनी हड़बड़ी में ऑफिस पहुँचना चाहते हैं और दिन भर इतने तनाव और व्यस्त माहौल में रहना पसंद करते हैं! रोज़ी-रोटी कमाने के लिए अपने बच्चे को त्यागकर वे खुश नहीं हैं। जब वे कहीं भी मेरे पिछले दो ब्लोगों जैसी पंक्तियाँ पढ़ते होंगे, अपराधबोध और आत्मग्लानि से भर जाते होंगे, जबकि वे जानते हैं कि उनके पास इसके सिवा कोई विकल्प नहीं है।

ऐसे दुखद ख़यालों के बाद जब मैं अपनी परिस्थिति पर नज़र डालता हूँ तो अपने आपको और अपने परिवार को बहुत सौभाग्यशाली माने बगैर नहीं रह पाता क्योंकि हम अपने घर से ही अपना काम कर पाते हैं और जब मर्ज़ी होती है, अपनी बच्ची के साथ खेल पाते हैं। आश्रम के इतने बड़े सामूहिक परिवार में हमारा खुद का एक घरेलू डे-केयर सेंटर (स्कूल) है, जिसमें हम खुद भी बहुत सारे बच्चों की देखभाल का काम करते हैं। डे-केयर सेंटर (स्कूल) के इस विशाल प्रोजेक्ट का एक हिस्सा होना वाकई बहुत सौभाग्य की बात है।

प्रिय अभिभावकों, मैं आपके लिए दिली शुभकामनाएँ व्यक्त करना चाहता हूँ कि ज़्यादा से ज़्यादा समय अपने बच्चों के साथ गुज़ारने के आपको पर्याप्त मौके प्राप्त हों। अपनी दिनचर्या को आप इस तरह से व्यवस्थित कर सकें कि जीवन के ये बेशकीमती क्षण सदा-सदा के लिए सँजोकर रख पाएँ क्योंकि जीवन के ये पल अनमोल हैं!

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