कल और परसों मैंने अमीर देशों में मौजूद गरीब बच्चों के बारे में यूनिसेफ के विचारों पर बिन्दुवार जानकारी दी थी। ये विचार भारत जैसे देश के संदर्भ में कितने मौजूं हैं? आगे पढ़िये:
8. शालाओं द्वारा आयोजित यात्राओं में और दूसरे कार्यक्रमों में शामिल होने में लगने वाला खर्च
इसका तो छोटा सा जवाब है: भारत में एक तरफ कुछ परिवार ऐसे हैं जो अपने बच्चों को किसी निजी स्कूल में पढ़ाने में, किताबें और यूनीफ़ोर्म खरीदने में और फीस अदा करने में सक्षम हैं तो दूसरी तरफ ऐसे परिवार भी हैं जो इतना खर्च बर्दाश्त नहीं कर सकते। ऊपर से स्कूल ट्रिप वगैरह का खर्च अधिकांश गरीब परिवारों के लिए कुछ ज़्यादा ही कहा जाएगा।
यह बताते हुए हमें गर्व हो रहा है कि हमारे आश्रम के उत्सवों में कस्बे के सभी गरीब बच्चों को हम अच्छे से अच्छा भोजन उपलब्ध कराते हैं। उत्सवों के दौरान आसपास मिलने वाले बेहतरीन मिठाई आदि भी भोजन में शामिल किए जाते हैं।
9. होमवर्क करने के लिए प्रकाश युक्त, शांत और एकांत कमरे
इस मामले में भी अधिक आवश्यक जरूरतों का ध्यान हमें पहले रखना होगा और होम वर्क के लिए अलग कमरे का नंबर बहुत बाद में आएगा। चार, पाँच या और भी ज़्यादा सदस्यों वाले बहुत से भारतीय परिवार एक या दो कमरों वाले किराए के मकानों में रहते हैं। एक ही कमरा उनकी बैठक, रसोई, सोने का कमरा, ऑफिस, वर्कशॉप, बच्चों का कमरा, वार्डरोब, सब कुछ होता है। अगर हम वह स्तर प्राप्त कर लें जहां इन कामों के लिए अलग-अलग कमरे उपलब्ध हों तो ऐसे लोग गरीब ही नहीं माने जाएंगे।
10. इंटरनेट कनेक्शन
सूची में यह बिन्दु देखकर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ था लेकिन अब मैं समझता हूँ कि यह भी आज अध्ययन का और दुनिया भर की जानकारी से अद्यतन रहने का एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है। पश्चिम में बहुत सा होमवर्क आजकल इंटरनेट पर ही किया जाता है और सामाजिक जीवन भी बहुत हद तक ऑनलाइन स्थानांतरित हो गया है। जिसके पास इंटरनेट नहीं है उसे दुनिया से कटा हुआ ही माना जाएगा।
लेकिन ऐसी जगह जहां 48 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान के बावजूद अधिकांश लोगों के पास अभी फ्रिज या सीलिंग फ़ैन भी नहीं है, इंटरनेट का उपलब्ध न होंगा गरीबी का सटीक उदाहरण नहीं हो सकता।
11. कुछ नए कपड़े (अर्थात, सेकंड हैंड नहीं)
हमसे लोग अक्सर पूछते रहते हैं कि क्या वे आश्रम आते समय बच्चों के लिए कपड़े लेकर आएँ और हम हमेशा उनकी इस सहायता को कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं। थोड़ा-थोड़ा ही सही हम उन्हें तब तक इकट्ठा करते रहते हैं जब तक कि हमारे पास इतना न हो जाए कि हम अपने सभी बच्चों और उनके अभिभावकों को पर्याप्त कपड़े खुले हाथों न बाँट सकें। आप कल्पना नहीं कर सकते कि ये परिवार इन सेकंड हैंड कपड़ों को पाकर कितना प्रसन्न होते हैं। वैसे दूसरों के उतरे हुए कपड़े पहनने में क्या हर्ज हो सकता है? वे लगभग नए के नए होते हैं, फटे नहीं होते और गला देने वाली ठंड में उन्हें ऊष्मा और सुरक्षा प्रदान करते हैं।
पश्चिम के मानदंडों के अनुसार, जहां धनी परिवार के बच्चों का भी ब्रांडेड कपड़े न पहनने पर मज़ाक बनाया जाता है, मैं इसे समझ सकता हूँ। लेकिन मेरा विचार है कि वहाँ भी अपेक्षाओं और स्तर को थोड़ा नीचा करने की आवश्यकता है। बच्चों का ध्यान बाहरी तड़क-भड़क से हटाकर आंतरिक मूल्यों की तरफ मोड़ना उचित होगा!
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