रुपया, महत्वाकांक्षा और ऐशों-आराम या माँ-बच्चे का प्रेम? – 11 जुलाई 2013

बच्चे

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे पश्चिमी देशों की महिलाओं को धन की समस्या अपने बच्चों से दूर कर देती है और वे उन्हें जन्म के कुछ माह बाद ही डे-केयर सेंटर में रखने के लिए मजबूर हो जाती हैं। मुझे यह विश्वास करने में बड़ी परेशानी होती हैं कि इन सारे देशों में, जो अपने आपको विकसित देश कहते हैं, इसके अलावा ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे बच्चे अपने परिवार के सान्निध्य में रह सकें। यह बात मेरी इस मान्यता को दृढ़ करती है कि आज की दुनिया उस ओर तेज़ी के साथ कदम बढ़ा रही है जहां आगे एक दीवार होगी और जहां से वापस लौटने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं होगा। अभी हम जिस राह पर चल निकले हैं वह सही रास्ता नहीं है और अधिक दिन तक ऐसा नहीं चल सकता। इस रास्ते में प्रेम के लिए कोई स्थान ही नहीं है!

सभी को बच्चे पैदा करने का हक है। वैसे, बहुत से लोग बच्चे नहीं चाहते, मगर जो चाहते हैं उन्हें माँ या बाप बनने का हक हासिल है। यह जीवन का एक बहुत प्यारा अनुभव है और अपने बच्चों का लालन-पालन करते हुए हर अभिभावक उनकी भलाई के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार रहता है।

जब हम आश्रम के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से मिलते हैं तो हम पाते हैं कि वे अपने बच्चों को उनके पास उपलब्ध हर चीज़ दे देना चाहते हैं, मगर उनके पास ज़्यादा कुछ होता ही नहीं है। हमने ऐसी महिलाएं भी देखी हैं जो भवन-निर्माण की साइटों पर अपने दूध पीते और घुटनों के बल चलने वाले बच्चों को साथ लेकर आती हैं। उनके घर में बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता और जीवित रहने के लिए पैसे की सख्त दरकार होती है। ये नन्हें बच्चे वहाँ धूल और कूड़े–करकट में खेलते रहते हैं, जहां ईंट-पत्थरों और निर्माण कार्य के बीच कई तरह के दूसरे खतरे भी मौजूद होते हैं। इसके बावजूद आप देखेंगे कि इतनी परेशानी में भी उनकी माँएँ उन बच्चों पर अपना प्यार उंडेलने में कोई कसर नहीं रखतीं। यह उसका दुर्भाग्य है कि उसके परिवार में कोई भी ऐसा नहीं है जिसे काम पर जाना न पड़ता हो और घर बैठकर बच्चों की देखभाल कर सकता हो। इसलिए उसे अपनी परिस्थिति से समझौता करना पड़ता है, मगर बच्चों के प्रति उसके प्रेम में ज़रा भी कमी नहीं आती है।

धनी और विकसित मुल्कों की नौकरीपेशा माँएँ बच्चों की देखभाल करने वाली संस्थाओं के पास अपने बच्चों को छोड़ सकती हैं जहां के प्रशिक्षित कर्मचारी उनके बच्चों की अच्छी देखभाल करते हैं। भले ही वहाँ बच्चों को कोई खतरा नहीं होता, भले ही वहाँ बच्चे को विकसित होने के बेहतर अवसर प्राप्त होते हों, लेकिन फिर भी माँ अपने बच्चे से दूर रहकर कम दुखी नहीं रहती। बच्चे की अच्छी देखभाल होने के बावजूद, जैसे ही शाम को वह उसे गोद में लेती है उसके दिल में बच्चे के प्रति इस कदर प्रेम उमड़ने लगता है कि वह सोचती है कि भविष्य में वह कभी भी अपने बच्चे से दूर नहीं होगी….लेकिन…

आज की दुनिया पैसे की दुनिया है। आधुनिक विकास ऐसी अवस्था प्राप्त कर चुका है कि अब वह नहीं चाहता कि लोग बच्चे पैदा करें। इस प्राकृतिक काम को सीधे-सीधे रोक पाना संभव नहीं है इसलिए ऐसी व्यवस्था की गई है कि लोग पैसे को सब कुछ समझें और पैसे की इस व्यवस्था को ज़्यादा से ज़्यादा कारगर रूप से चलाने में अपना सब कुछ झोंक दें। इस व्यवस्था में लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे ज़्यादा से ज़्यादा काम करें, खूब कमाएं और तुरंत ही खर्च कर डालें। लोगों को इस व्यवस्था की ओर आकृष्ट करने के लिए वे उनमें महत्वाकांक्षाएँ भड़काती हैं, उन्हें चीजों की लालच और हवस का शिकार बनाती हैं और उसका मूलमंत्र होता है कभी संतुष्ट न हों या “दिल मांगे मोर”! बहुत सी अनावश्यक वस्तुओं के बारे में उनसे कहा जाता है वे चीज़ें आधुनिक जीवन में अनिवार्य आवश्यकताएँ बन गई हैं और उनमें यह भावना पैदा की जाती है कि उनके पास पर्याप्त साधन नहीं हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए उन्हें हर संभव प्रयास करना चाहिए।

आपको इजाज़त है कि आप बच्चा पैदा कर लें मगर फिर आपको बताया जाएगा कि उस बच्चे के लिए आपको किन किन चीजों की आवश्यकता होगी और वे सभी चीज़ें बहुत महंगी होंगी। उन चीजों को खरीदने के लिए आपको धन चाहिए और वह अतिरिक्त धन कमाने के लिए आपको ज़्यादा से ज़्यादा वक्त ज़ाया करना होगा। इसलिए अपने नन्हें बच्चे को किसी अजनबी के पास छोड़कर, बल्कि उस वक्त की अच्छी ख़ासी कीमत अदा करके, आप खुद धन कमाने निकल जाइए। काम कीजिए, धन कमाइए और खर्च कर दीजिए। क्या यही तरक्की है? क्या यही आधुनिकता है? एक बच्चा जिसके पास एक अजनबी नैनी है और जिसके तीन-तीन कमरे खिलौनों से भरे पड़े हैं, लेकिन माँ-बाप के पास अपने बच्चे को पुचकारने का, खेलने का और गले लगाकर प्यार करने का समय नहीं है।

यह ज़्यादा दिन चल नहीं सकता। इसमें प्रेम कहीं नज़र नहीं आता और यह बच्चे और अभिभावकों के लिए भी बहुत बुरा है। वह समय जल्द ही आएगा जब मनुष्य को इस बारे में विचार करना ही होगा और समझना होगा कि प्रेम के बगैर मानवीय संबंध अधिक समय तक बने नहीं रह सकते। सिर्फ पैसा ही सब कुछ नहीं है। आपका बच्चा आपके प्रेम का भूखा है, इस व्यवस्था द्वारा ज़बरदस्ती लादी गई और पैसे देकर खरीदी गई बनावटी सुविधाएं उसे नहीं चाहिए। और तब उसे वापस पीछे लौटना होगा जहां स्वस्थ प्रेम की ऊष्मा होगी।

मैं पुनः सभी अभिभावकों से यह निवेदन करना चाहता हूँ कि अपने प्रेम पर ध्यान केन्द्रित करें। आपकी परिस्थिति आदर्श नहीं भी हो सकती है और आप इस दुविधा में हो सकते हैं कि बच्चे के साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताना उचित होगा या उस समय का उपयोग अतिरिक्त धन कमाने में खर्च किया जाना चाहिए जिससे अपने उसी बच्चे के लिए अधिक सुविधाएं जुटाई जा सकें या उसके लिए नए से नए खिलौने खरीदे जा सकें।

आराम से बैठकर, शांत मन से इन विकल्पों पर विचार करें। अपने परिवार के भरण पोषण के लिए आवश्यक धन कमाने के लिए कितना समय आप बच्चे से दूर रह सकते हैं? और उस भरण पोषण के लिए पर्याप्त धन से ज़्यादा धन कमाने में, जिससे आप कुछ अतिरिक्त सुविधाएं खरीदेंगे, आपका कितना समय ज़ाया हो रहा है? क्या आप उन अतिरिक्त सुविधाओं के बगैर नहीं रह सकते? बदले में आप अपने बच्चे के साथ प्रेम के कुछ अनमोल क्षण व्यतीत सकते हैं।

इस बात पर पुनर्विचार कीजिए: आप प्रेम और आत्मीयता से भरे कुछ घंटों के बदले अपने बच्चे को कौन सी और कितनी भौतिक सुविधाएं प्रदान कर सकते हैं? अपनी महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाइए और ज़्यादा से ज़्यादा पाने की लालसा के चक्रव्यूह से बचकर रहिए। जब आपका नन्हा मुन्ना आपकी तरफ देखकर मुसकुराता है, आपकी गोद में सो जाता है या भागता हुआ आकर आपके गले लग जाता है तब आपको समझ में आ जाना चाहिए कि आपके लिए क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण है: यह आत्मिक प्रेम या कुछ और!

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