कैसे संस्कृतियों का भेद गरीबी की परिभाषा बदल देता है – 14 जून 2013

बच्चे

पिछले दिनों मैंने यूनिसेफ के अनुसार पश्चिमी बच्चों की न्यूनतम जरूरतों और उनके साथ भारतीय बच्चों की जरूरतों की तुलना की थी। कुछ बिन्दु रह गए थे जिनका विवेचन नीचे प्रस्तुत है।

12. दो जोड़ी उनके पैरों के नाप के जूते (हर मौसम में पहनने योग्य जूतों सहित)

यह बहुत महत्वपूर्ण बात है और मुझे लगता है कि अभिभावकों पर इसका इतना बोझ होता है कि इसे कम आँकने की भूल नहीं की जानी चाहिए। बच्चों के पैर जल्दी-जल्दी बढ़ते हैं और उन्हें नियमित रूप से बीच-बीच में नए जूतों की आवश्यकता पड़ती रहती है जिससे वे ठीक तरह से चल सकें, दौड़ सकें और कूद-फांद कर सकें। सौभाग्य से भारत के इस भाग में, जहां हम रहते हैं, मौसम ऐसा होता है कि आप बिना जूतों के ही सारा साल दौड़-भाग कर सकते हैं। लेकिन सड़कों के बन जाने और आबादी के बढ़ जाने के कारण अब न तो यह इतना आसान रह गया है न ही स्वास्थ्य के लिए ही ठीक है। हम अपने स्कूल के बच्चों को काले स्कूल के जूते और स्कूल यूनिफ़ोर्म मुहैया कराते हैं और हम देखते हैं कि बच्चे उन्हीं जूतों को सारा दिन पहने रहते हैं क्योंकि उनके पास दूसरे जूते नहीं होते। गर्मी के मौसम में अवश्य वे उन्हें निकालकर रखना पसंद करते हैं। फिर रबर की हल्की और सस्ती चप्पलें होती हैं जिसका आकार इतना लचीला और मुलायम होता है कि आप बच्चों को बड़े या छोटे साइज़ की चप्पलों में घूमते देख सकते हैं। मैं तो जूतों की संख्या को एक ही रखना उचित समझता हूँ मगर भारत में अगर किसी के पास एक भी जूता नहीं है तो उसे गरीब की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

13. कभी कभार अपने घर में दोस्तों को न्योता देने, उनके साथ खेलने और भोजन करने की सुविधा

यह एक और बिन्दु है जिसके संदर्भ में, मेरे विचार में, अधिकांश भारतीय बच्चे अमीर देशों के उन बच्चों से ज़्यादा अमीर साबित होते है जिनके बारे में यह अध्ययन किया गया है। भारत में गरीब से गरीब बच्चा भी अपने दोस्तों को घर आमंत्रित करता है। हमारे स्कूल के बच्चे जब मर्ज़ी होती है, एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं और वहाँ नाश्ता करते हैं, खाना भी खाते हैं। यह अतिथि-सत्कार की भारतीय परंपरा के कारण भी हो सकता है जिसके अनुसार, जो भी थोड़ा-बहुत आपके पास है, दूसरों के साथ खुशी-खुशी साझा करना अच्छा माना जाता है। दूसरा कारण यह हो सकता है कि पश्चिमी गरीब अभिभावक अपनी गरीबी पर भारतीय गरीबों से ज़्यादा शर्मिंदा होते हों। भारत में गरीबों की संख्या इतनी ज़्यादा है कि भारतीय गरीबों में गरीबी की उतनी कुंठा नहीं पाई जाती।

14. विशेष अवसरों पर जैसे जन्मदिन, नेम डे और अन्य धार्मिक त्योहारों पर खुशी मनाने की सुविधा

मैं ऐसे कई लोगों से मिल चुका हूँ जो यह जानकार दंग रह गए कि हमारे स्कूल के अधिकांश बच्चे यह भी नहीं जानते कि उनका जन्मदिन किस दिन पड़ता है। यह उनके अभिभावक भी नहीं जानते क्योंकि जन्मदिन को इतना महत्वपूर्ण नहीं माना जाता। इसके पीछे हमारी अपनी सांस्कृतिक परंपरा का हाथ हो सकता है या फिर यह हो सकता है कि ऐसे अवसरों पर वे कोई विशेष आयोजन कर पाने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं।

लेकिन धार्मिक आयोजन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कितना भी गरीब हो, त्योहार, जैसे दीवाली आदि, ज़रूर मनाएगा। एक दिया ही जलाए, लक्ष्मीजी से अगले वर्ष कुछ बेहतर आर्थिक लाभ की प्रत्याशा करते हुए छोटी-मोटी पूजा ही कर पाए मगर दिवाली अवश्य मनाएगा।

उनके ऐसा करने को मैं अच्छा या बुरा नहीं कह रहा हूँ क्योंकि बहुत छोटे और साधारण आयोजन से लेकर विशाल और बहुत सारे, उपहार और पार्टियों से युक्त बहुत ख़र्चीले आयोजन तक इन त्योहारों पर किए जाते हैं। क्या इन आयोजनों में सिर्फ त्योहार की मौज-मस्ती ही होती है क्योंकि सारा वातावरण ही त्योहारमय नज़र आता है? या फिर सारा परिवार और दूसरे नाते-रिश्तेदार इकट्ठा हो जाते हैं, इसलिए यह महत्वपूर्ण है? क्या यह बिना पैसे के, बिना इतने दिखावे और तड़क-भड़क के नहीं किया जा सकता?

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